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अंदर की कहानी: जब गांधी परिवार की सास-बहू में हुई गाली-गलौज

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मेनका गांधी. गांधी परिवार की बहू. संजय गांधी की पत्नी. लेकिन अब वो बीजेपी में हैं. बीजेपी के पुराने चावल बताते हैं कि अब उनकी एक ही राजनीतिक इच्छा शेष है, अपने बेटे वरुण को यूपी के मुख्यमंत्री के तौर पर देखने की.

नाइंटीज के बाद पैदा हुई पीढ़ी शायद वो कहानी न जानती हो, जिसकी पृष्ठभूमि में मेनका को गांधी परिवार से बेदखल किया गया. यह जगजाहिर है कि उनकी सास इंदिरा गांधी उन्हें पसंद नहीं करती थीं. लेकिन संजय गांधी के रहने तक उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर नहीं की. लेकिन संजय की प्लेन क्रैश में मौत के बाद ही मेनका के ‘बुरे दिन’ शुरू हो गए और अंतत: उन्हें  1, सफदरजंग रोड से निकाल बाहर कर दिया गया.

उस दिन सास-बहू में तीखी नोक-झोंक हुई थी. इसकी एक-एक घटना के बारे में लिखा है, कभी गांधी परिवार के करीबी रहे लेखक खुशवंत सिंह ने अपनी किताब ‘सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत’ में. किताब राजकमल प्रकाशन से छपी है. उसका एक हिस्सा आपको पढ़वाते हैं:

इस कहानी में कुछ नाम आएंगे. बस उन्हें जान लीजिए:

अमरतेश्वर कौर आनंद: मेनका की मां
अंबिका: मेनका की बहन
आरके धवन: इंदिरा के राजनीतिक सलाहकार और करीबी


उपलब्धियों का यह दौर बहुत छोटा था. 23 जून, 1980 की सुबह संजय (गांधी) का दो सीट वाला विमान दिल्ली की दक्षिणी पर्वत-श्रेणी पर गिरकर चकनाचूर हो गया और उसमें संजय और उसके साथी पायलट कैप्टेन सक्सेना की मौत हो गई. उस समय अमतेश्वर और उसकी बेटी अम्बिका इंग्लैंड में छुट्टियां मना रहे थे.

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उन्हें यह खबर स्वराज पॉल ने दी. पॉल एक व्यवसायी था जिसने अपने को गांधी-आनन्द परिवार का कृपापात्र बना लिया था. अमतेश्वर और अम्बिका को विशेष रूप से किराए पर लिए गए एअर इंडिया के विमान से वापस दिल्ली भेजा गया. विमान रोम में राजीव और सोनिया को लेने के लिए उतरा. वे वहां सोनिया के माता-पिता के पास ठहरे हुए थे. विमान पर दूसरे यात्री थे: एक जहाज-कम्पनी के मालिक सुमति मोरारजी और वीसी शुक्ल. वे प्रथम श्रेणी के निचले तल पर थे, बाकी लोग ऊपरी तल के प्रथम श्रेणी लाउंज में थे. बीच-बीच में सुमति , वीसी शुक्ल और स्वराज पॉल आनन्द परिवार का साथ देने के लिए उतरकर आ जाते थे. वे तीनों अमतेश को समझा रहे थे कि उसे दोनों परिवारों के बीच संबंध बनाए रखने की हर कोशिश करनी चाहिए. और अब चूंकि संजय नहीं रहा, उन्हें राजीव से बनाकर रखना चाहिए.

इंदिरा गांधी अपनी छोटी बहू को नीचा दिखाना चाहती थीं?

अगर श्रीमती (इंदिरा) गांधी ने अपने मन में मेनका के खिलाफ कोई नाराजगी पाल रखी थी, तो उन्होंने इसके बारे में तब तक कुछ न कहा, न किया, जब तक संजय जीवित था. इस विश्वास में कुछ सच्चाई हो सकती है कि वह अपने दूसरे बेटे से प्यार भी करती थीं और उससे डरती भी थीं. संजय अपनी मां के घर की अपेक्षा आनन्द परिवार के घर में ज्यादा सहज रहता था. आनन्द परिवार में नौकरों सहित सभी उसकी बहुत आवभगत करते थे. मां के घर में उसके बड़े भाई के रूप में एक प्रतिद्वन्द्वी मौजूद था.

श्रीमती गांधी इस बात को नापसन्द करती थीं कि संजय उनके घर की अपेक्षा आनन्द परिवार के घर को तरजीह देता है. संजय की दुःखद मृत्यु के बाद गांधी परिवार ने मेनका को यह जताने में बहुत समय नहीं लगाया कि वह प्रधानमंत्री के घर से मेल नहीं खातीं.

संजय की मौत के एक हफ्ते बाद श्रीमती गांधी ने खुद मेनका से कहा कि वह उनकी सेक्रेटरी का काम करे. कुछ दिनों के बाद धीरेन्द्र ब्रह्मचारी मेनका के कमरे में आए. उन्होंने उसे सूचना दी कि श्रीमती गांधी को खुद उसे यह बताने में संकोच हो रहा है, लेकिन सोनिया इस प्रस्ताव के विरोध में अड़ी है और उसने यह धमकी दी है कि अगर मेनका को दिया प्रस्ताव वापस नहीं लिया गया तो वह अपने परिवार के साथ इटली लौट जाएगी.

इस बात के बारे में मुझे बहुत शक नहीं था कि सोनिया उनकी ज्यादा प्रिय बहू है, वैसे ही जैसे संजय उनका ज्यादा प्रिय बेटा है. अब जब संजय ही नहीं रहा, तो श्रीमती गांधी के पास अपनी एकमात्र बची हुई संतान राजीव का सहारा लेने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था. उनके मन में मेनका के लिए कोई खास स्नेह नहीं था और अमतेश्वर का रौब जमाना उन्हें अखरता था. इस तरह की भावना के प्रकट विद्वेष में बदल जाने में बहुत देर नहीं लगती.

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इंदिरा को मेनका ने कहा ‘एक फटीचर बोरी’?

श्रीमती गांधी को मेनका की उपस्थिति से धीरे-धीरे चिढ़ बढ़ने लगी और वे उसके हर काम में नुक्स निकालने लगीं. उन्होंने मुझे बताया कि जो लोग उनके साथ संवेदना प्रकट करने आते हैं, मेनका उनसे बदतमीजी से पेश आती है. श्रीमती मार्गरेट थैचर के सम्मान में जो औपचारिक दावत दी गई, उसमें राजीव और सोनिया, मुख्य अतिथि के साथ प्रमुख मेज पर बैठे और मेनका को धवन और उषा जगत के साथ स्टाफ के लिए लगाई गई मेज पर बैठाया गया.

उससे कहा गया कि वह औरों का ध्यान बंटाती है और उसे मेज पर बैठने की तमीज नहीं है. एक दिन श्रीमती गांधी ने मुझे बुलवाया और मुझसे कहा कि मेनका को समझाऊं कि वह बेहतर व्यवहार करे.

जब मैंने मेनका से बात की तो उसने शिकायत की कि उसके साथ पैर की धूल की तरह बर्ताव किया जाता है और उसने श्रीमती गांधी को ‘एक फटीचर बोरी’ (वन ओल्ड बैग) कहा.

‘दोनों लड़के बहुत प्यासे हैं’

दोनों परिवार बेहद अंधविश्वासी थे. संजय की मौत के कुछ दिन बाद मैं जोरबाग में अमतेश्वर के घर गया. मैंने देखा कि एक पंडितजी धोती और खड़ाऊं पहने संस्कृत श्लोक गुनगुनाते हुए बाहर निकल रहे हैं. उनके पीछे अपने सिर पर पानी से भरा घड़ा रखे एक आदमी चल रहा था और उस आदमी के पीछे अमतेश्वर आनन्द थीं. ‘यह सब क्या है ?’ मैंने उससे पूछा.

मुझे बताते हुए वह अपनी मुस्कुराहट छिपा नहीं सकी. ‘वो जो मिसेज़ सक्सेना हैं, संजय के साथ मृत सह-पायलट की विधवा, उन्होंने मुझे फोन करके कहा कि दोनों लड़कों को उन्होंने सपने में देखा. वे शिकायत कर रहे थे कि वे बहुत प्यासे हैं, क्योंकि वे जहां हैं वहां बहुत गर्मी है. मैंने इन पंडितजी से राय ली और इन्होंने सलाह दी कि हम लोग श्रीमती गांधी के घर के बाहर एक प्याऊ लगवा दें. मैं वही करने जा रही हूं.’

कमला नेहरू की बहन ने मेनका को एक नेकलेस दिया. उसमें आधा चांद और सितारा बना हुआ था. विजयराजे सिंधिया ने उससे कहा कि यह लोगों को बीमार करने के लिए एक तान्त्रिक प्रतीक है. मेनका पहले से बीमार चल रही थी. उसने उस नेकलेस को उतार दिया और वह सहसा बेहतर महसूस करने लगी.

‘मेनका से कहा गया, तुम्हारी मां कुतिया है’

दोनों महिलाओं के बीच रिश्ते बड़ी तेजी से बिगड़ते चले गए. मेनका अपने मित्रों को यह विश्वास दिलाना चाहती थी कि वह ऐसा कुछ नहीं करती जिससे श्रीमती गांधी उत्तेजित हों और सारा दोष श्रीमती गांधी का है. हर बार जब वह श्रीमती गांधी से मिलती है, उससे कहा जाता है, ‘सब लोग तुमसे नफरत करते हैं- तुमने अपने पिता की हत्या की है, तुम्हारी मां कुतिया है.’

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सब लोग यह साफ जान गए थे कि 1, सफदरजंग रोड में मेनका के दिन अब गिने हुए हैं. अब अन्दाजा लगाने को सिर्फ यह रह गया था कि वह कब और कैसे वहां से निकलेगी. श्रीमती गांधी हर बात में निर्णय का अधिकार अपने सिवाय किसी दूसरे को नहीं देती थीं. पर इस बार एक अप्रिय आश्चर्यजनक घटना को झेलने की बारी उनकी थी.

एक बार अपनी सास से अलग होने का फैसला करने के बाद मेनका ने निर्णय कर लिया था कि इस बार अपने रुखसत होने के समय और शर्तों को वह खुद तय करेगी. उसने कई सप्ताह पहले मुझे वह निश्चित दिन बता दिया जब उसे ‘निकाल फेंका’ जाएगा.

मेनका ने बड़ी सावधानी से समय का चुनाव किया था. श्रीमती गांधी भारत उत्सव के लिए लन्दन गई थीं और सोनिया को अपने साथ ले गई थीं. राजीव अपनी स्थिति बनाने में बहुत व्यस्त था, और वह घर में रहने से कतराता था ताकि खाने के समय उसकी मुलाकात मेनका से न हो. मेनका और अकबर अहमद ने संजय विचार मंच की शुरुआत करने का फैसला किया. श्रीमती गांधी को समझ में नहीं आ रहा था कि जो संगठन उनके बेटे के आदर्शों को प्रचार करने का दावा कर रहा है, उसके बारे में अपनी गैररजामंदी कैसे व्यक्त करें. उद्घाटन समारोह (जिसकी मंजूरी मेनका के अनुसार श्रीमती गांधी ने दे दी थी) के अवसर पर मेनका के भाषण के ‘पाठ’ को राजीव गांधी ने तार से लन्दन भेजा. श्रीमती गांधी ने तय किया कि अपनी उपद्रवी बहू से छुटकारा पाने का वह मौका, जिसका उन्हें कई महीनों से इंतजार था, उनके हाथ आ गया है.

और फिर हुई सास-बहू में वो ऐतिहासिक कहासुनी

श्रीमती गांधी 28 मार्च 1982 की सुबह लन्दन से लौटीं. वे इस बार निशाना लगाने का निर्णय करके आई थीं. जब मेनका उन्हें नमस्कार करने आई, तो उन्होंने सख्ती से यह कहकर उसे दफा किया, ‘मैं तुमसे बाद में बात करूँगी.’ उससे कहला दिया गया कि वह परिवार के साथ दोपहर के खाने के लिए न आए और उसका खाना कमरे में भेज दिया जाएगा. लगभग एक बजे उसे एक संदेश और भेजा गया कि प्रधानमंत्री उससे मिलना चाहती हैं. मेनका इस स्थिति के लिए तैयार थी.

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वह बैठक में थी जब श्रीमती गांधी नंगे पैर वहां आईं. उन्होंने धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को वहां आने का आदेश पहले दे दिया था ताकि वे मेनका से जो कुछ कहें, वे लोग उसके साक्षी रहें. मेनका के अनुसार वे गुस्से से उबल रही थीं और उनकी बात मुश्किल से समझ में आ रही थी.

अपनी उंगली मेनका की तरफ दिखाते हुए वे चिल्लाईं, ‘तुम वाहियात टिन्नी-सी झूठी ! तुम धोखेबाज, तुम…! तुम इस घर से एकदम बाहर हो जाओ.’ मेनका ने मासूम बनते हुए पूछा, ‘क्यों ? मैंने किया क्या है ?’ श्रीमती गांधी वापस चिल्लाईं, ‘तुमने जो भाषण दिया है, मुझे उसका एक-एक शब्द मालूम है.’ ‘वह तो आपने देख लिया था,’ मेनका ने जवाब दिया. इस जवाब से एक बार फिर विस्फोट हुआ.

श्रीमती गांधी ने उस पर अभियोग लगाया कि जब वे लन्दन में थीं तो वह उनकी अनुपस्थिति में उनके शत्रुओं को घर में लाती रही. उन्होंने सकारण जोड़ा, ‘तुमने हरेक शब्द में जहर उगला था. इसी वक्त निकल जाओ. निकलो.’ उन्होंने चीखकर कहा, ‘तुम्हें तुम्हारी मां के घर ले जाने के लिए गाड़ी खड़ी है.’

इंदिरा गांधी नंगे पैर सड़क पर चलती हुई कह रही थीं, ‘गेट आउट, गेट आउट’

मेनका अड़ी रही कि वह अपनी मां के घर नहीं जाना चाहती और उसे सामान बांधने के लिए वक्त चाहिए. ‘तुम वहीं जाओगी जहां तुमसे कहा जाएगा. तुम्हारी चीजें तुम्हारे पास बाद में भेज दी जाएंगी.’

श्रीमती गांधी ने कहा और फिर अमतेश्वर के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया. मेनका ने सिसकना शुरू कर दिया और कमरे से यह चिल्लाती हुई निकली कि वह अपनी मां का अपमान नहीं होने देगी. श्रीमती गांधी नंगे पैर उसके पीछे-पीछे बजरी की सड़क पर कहती जा रही थीं, ‘गेट आउट ! गेट आउट ! यह संतरियों और स्टाफ के लोगों ने सुना.

इसी बीच फ़ीरोज़ वरुण को श्रीमती गांधी के कमरे में पहुँचा दिया गया. मेनका के मित्र इस घटना का समाचार प्रेस को देने में व्यस्त हो गए.प्रधानमंत्री के घर जाने से पहले अम्बिका ने मुझे बताया कि उसकी बहन के साथ क्या हो रहा है और कहा कि मैं इस सूचना को आगे फैला दूँ. रात को नौ बजे तक दरवाजे के बाहर फोटोग्राफरों और रिपोर्टरों की भीड़ जमा होने लगी. उनमें विदेशी संवाददाता भी थे. श्रीमती गांधी हमेशा विदेशी प्रेस से डरती और नफरत करती थीं. पुलिस, उनके घर की तरफ जानेवाले रास्तों पर जगह-जगह खड़ी कर दी गई थी. पर उन्हें पूरी तरह यह नहीं समझाया गया था कि उन्हें किसे रोकना और किसे जाने देना है.

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…और फिर हकलाने और रोने लगीं इंदिरा गांधी

दस मिनट के बाद अम्बिका और उसका भाई उनके घर पहुंच गए. आठ साल में पहली बार उन्हें रोका गया. उनके पहुँचने की खबर श्रीमती गांधी को पहुँचा दी गई. साथ ही उनसे यह भी कह दिया गया कि अम्बिका प्रेस के लोगों से बात कर रही है. उनकी गाड़ी को अन्दर आने की इजाजत मिल गई और वे दोनों मेनका के कमरे में चले गए. उन्होंने देखा मेनका रो रही है और जो कुछ भर सकती है वह अपने ट्रन्कों में भर रही है. श्रीमती गांधी अचानक कमरे में दाखिल हुईं और उन्होंने मेनका को बिना कुछ लिए चले जाने का हुक्म दिया. इस बार अम्बिका बोली, ‘वह नहीं जाएगी, यह उसका घर है.’ श्रीमती गांधी अम्बिका को पसन्द नहीं करती थीं जिसका एक हद तक कारण उस लड़की की तेज जबान का डर भी था.

‘यह उसका घर नहीं है,’ श्रीमती गांधी चिल्लाईं, ‘यह भारत की प्रधानमंत्री का घर है. वह यहाँ मेरी इजाजत के बगैर लोगों को नहीं ला सकती. जो हो, अम्बिका आनन्द, मैं तुमसे बात नहीं करना चाहती.’ अम्बिका रौब में आनेवाली नहीं थी, ‘श्रीमती गांधी, मेरी बहन से इस तरह बोलने का आपको अधिकार नहीं है. यह संजय का घर है और वह संजय की बीवी है. उसे यहां से कोई बाहर नहीं निकाल सकता.’

श्रीमती गांधी हकलाने और रोने लगीं. उन्होंने पहले कहा, ‘मैंने उससे जाने के लिए नहीं कहा, वह अपने आप जा रही है.’ ‘मैंने अपनी जिन्दगी में कभी झूठ नहीं बोला,’ उन्होंने दोबारा प्रतिवाद किया. ‘आपने अपनी जिन्दगी में कभी सच नहीं बोला,’ दोनों बहनों ने उलटकर जवाब दिया.

इंदिरा के वफादार धवन को मेनका के कुत्ते ने काट लिया

एक-दूसरे की मौजूदगी से उनकी हिम्मत बढ़ गई थी. लड़ाई श्रीमती गांधी के हाथ से बाहर हो गई; वे पागलों की तरह रोने लगीं और धीरेन्द्र ब्रह्मचारी को उन्हें कमरे से बाहर ले जाना पड़ा. उसके बाद सन्देश बेचारे धवन के मार्फत भेजे गए. इस क्रम में उसे दोनों बहनों की बदजबानी का शिकार तो होना ही पड़ा, उसे इस काम का यह इनाम और मिला कि मेनका के आइरिश वुल्फ हाउंड कुत्ते शेबा ने, जो उत्तेजना के कारण परेशान हो गया था, उसे काट लिया.

फिर एक दौर और चला गाली-गुफ्ता

बहनें जब अकेली रह गईं तो उन्होंने अपने जाने का समय और नीति तय की. उन्होंने लंच का ऑर्डर दिया और अपने वीडियो कैसेट पर अमिताभ बच्चन की फिल्म पूरे जोरशोर से लगा ली ताकि बराबर के कमरे में श्रीमती गांधी को यह पता चल जाए कि वे उनकी परवाह नहीं करतीं. हर बार जब धवन उनसे अनुरोध करने आता कि वे चली जाएँ, तो वे एक नई माँग पेश कर देतीं. कुत्तों को खाना खिलाना था सो खिलाया गया. जब धवन उन्हें सामान ले जाने से रोकने में नाकामयाब हो गया तो श्रीमती गांधी ब्रह्मचारी के साथ अन्दर आईं और उन्होंने जो सामान बाँधा था उसकी तलाशी का आदेश दिया.

मेनका ने आग्रह किया कि अगर उसके सामान की तलाशी ली जानी है तो वह सड़क पर ली जाएगी ताकि पूरा प्रेस इस दृश्य को देखे. कमरे के बाहर रखे ट्रंक जान-बूझकर खोल दिए गए ताकि प्रेसवाले उन्हें देखें और गेट के बाहर टेलिस्कोपिक लेंस लगे कैमरों से उनकी तस्वीरें खींच लें. दोनों ओर से गाली-गुफ्ता का एक दौर और चला.

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अब स्थिति श्रीमती गांधी के काबू के बाहर हो गई थी. राजीव और अरुण नेहरू ने उनकी जगह ली. उन्होंने सुरक्षा अफसर एन.के. सिंह को बुलवाया और उसे दोनों बहनों को बाहर निकालने का आदेश दिया. एन.के. सिंह चतुर आदमी था. उसने ऑर्डर को लिखित रूप में मांगा. न राजीव और न ही अरुण नेहरू कागज पर यह जिम्मेदारी लेने को तैयार हुए. एन.के. सिंह के मौखिक अनुरोध पर लड़कियों ने अमल करने से इंकार कर दिया. उन्होंने अपने सामान, कुत्ते और अब फ़िरोज़ वरुण को भी, जिसे बुखार था, अपने आगे भेजने की मांग की. श्रीमती गांधी को यह मालूम था कि वे हार चुकी हैं और उन्होंने हथियार डाल दिए.

इंदिरा ने मेनका के लिए लिखवाई जहरीली चिट्ठी, मेनका ने प्रेस को दिया जवाब

उन लड़कियों और उनके भाई ने पेट भरके आराम से खाना खाया. सामान और कुत्तों को टैक्सी से आगे भेज दिया गया. 11 बजे रात में नींद से भरे हुए फ़ीरोज़ वरुण को भी उनके हवाले कर दिया गया. टैक्सी के बजाय, प्रधानमंत्री की गाड़ी को यह आदेश दिया गया कि वह मेनका और उसके बेटे को जहाँ वह चाहे वहाँ ले जाए.

अपनी आदत के मुताबिक श्रीमती गांधी ने आखिरी काम यह किया कि उन्होंने मेनका के नाम एक खत लिखवाया जिसमें उसके उन सारे दुष्कर्मों का कच्चा चिट्ठा खोला गया था, जिनके कारण उसका घर से निकाला जाना जरूरी था. मेनका ने बैठकर अपना जवाब लिखा और उसे प्रेस में दे दिया. कुछ ही मिनट बाद, आँखों में ढेर सारे आँसू भरे, धुंधलाई नजर के साथ मेनका और भौचक्का फ़ीरोज़ वरुण कमरे से बाहर आए जहाँ उन्हें प्रेसवालों के कैमरों के फ्लैश बल्बों की चकाचौंध का सामना करना था. मेनका ने भारत की प्रधानमंत्री के खिलाफ यह पारी उन्हें पछाड़कर जीत ली थी.


खुशवंत सिंह की किताब ‘सच, प्यार और थोड़ी शरारत’ से साभार


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