उत्तर प्रदेश और बिहार की प्रजनन दर (Fertility Rate) को हटा दें तो भारत की फर्टिलिटी रेट बिल्कुल अमेरिका जैसी है. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की कुल प्रजनन दर 1.9 है. लेकिन अगर इसमें से यूपी और बिहार को हटा दिया जाए तो यह 1.6 हो जाती है. अमेरिका में भी प्रजनन दर यही (1.6) है जबकि उत्तरी योरप में फर्टिलिटी रेट 1.5 है. रिपोर्ट में परिषद ने भारत सरकार को जनसंख्या नियंत्रण के पुराने तरीके को बदलने की सलाह दी है.
जनसंख्या कम कराने वाली स्कीम बंद करें, सरकारी संस्था ने सरकार को ये सलाह क्यों दी?
भारत की Total Fertility Rate यानी TFR 1.9 पर पहुंच गई है और 2023 में सालाना जन्मों की संख्या करीब 2.32 करोड़ रही, जो 1974 के स्तर के बराबर है. EAC-PM के Working Paper में Sterilisation Incentives और Two-Child Rules से जुड़े प्रावधान खत्म करने की सिफारिश की गई है.

परिषद ने कहा है कि जनसंख्या विस्फोट के डर का अब कोई आधार नहीं है. इसलिए इसे कंट्रोल करने की नीतियां प्रासंगिक नहीं हैं. अगर सरकार जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को नहीं बदलती है तो देश के कई राज्य उम्रदराज समाज बनकर रह जाएंगे. पेपर में बताया गया कि दक्षिणी राज्यों आंध्र प्रदेश (1.4), तेलंगाना (1.5), कर्नाटक (1.5), केरल (1.3) और तमिलनाडु (1.3) के साथ-साथ पश्चिम बंगाल (1.3), पंजाब (1.4), गोवा (1.6), हिमाचल प्रदेश (1.5), सिक्किम (1.0), महाराष्ट्र (1.4) और दिल्ली (1.2) में प्रजनन दर चिंताजनक है. ये दर बीते दो दशकों से ज्यादा समय से रिप्लेसमेंट फर्टिलिटी के स्तर से नीचे (Below Replacement Fertility) बने हुए हैं.
Below Replacement क्या है?बिलो फर्टिलिटी रिप्लेसमेंट का मतलब किसी देश की आबादी के मौजूदा स्तर को बनाए रखने से जुड़ा है. जब किसी देश में बच्चे पैदा होने की कुल दर प्रति महिला 2.1 से कम होता है तो उसे बिलो रिप्लेसमेंट कहते हैं. इसमें अगली पीढ़ी में उतने बच्चे पैदा नहीं होते, जितनी मौजूदा पीढ़ी में आबादी होती है. जैसे- किसी महिला के दो बच्चे हैं. अगली पीढ़ी की आबादी में ये दो बच्चे मां और पिता की जगह लेते हैं, लेकिन अगर उनका एक ही बच्चा है तो मां और पिता में से एक की जगह तो भरती है लेकिन एक जगह खाली रह जाती है. यानी रिप्लेसमेंट पूरा नहीं हुआ. यानी मामला बिलो रिप्लेसमेंट का हो गया है.
EAC-PM ने अपने पेपर 'द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट: हाउ पॉपुलेशन कंट्रोल पर्सिस्ट्स इन इंडिया' में एक सिफारिश की है. इस सिफारिश में मुख्य रूप से दो बातें हैं. पहली राज्यों में नसबंदी से जुड़े इंसेंटिव पेमेंट (प्रोत्साहन राशि) को खत्म करना. दूसरी जनसंख्या नियंत्रण के नियमों को वापस लेना. पेपर को EAC-PM के सदस्य संजीव सान्याल ने तैयार किया है. साथ ही इसे लिखने में आकांक्षा अरोड़ा और विराट सिंह ने भी योगदान दिया है. पेपर में कहा गया कि परिवार नियोजन नीति को भारत की ‘नई डेमोग्राफी’ के अनुरूप होना चाहिए.
पेपर की सिफारिशेंइस पेपर में नसबंदी से जुड़ी एक सिफारिश की गई है. बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक पेपर में कहा गया है कि नसबंदी से जुड़े सभी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर पेमेंट को वापस लें. इसमें नसबंदी कराने वालों को भुगतान, सैलरी कटने का मुआवजा, और नसबंदी कराने वालों और सर्विस प्रोवाइडर्स को दिए जाने वाले बढ़े हुए इंसेंटिव शामिल हैं. इसमें आगे कहा गया,
उन राज्यों में इन्हें जारी रखने का कोई आर्थिक आधार नहीं है, जहां प्रजनन दर अब रिप्लेसमेंट फर्टिलिटी से नीचे आ गई है.
पेपर में गर्भनिरोधक उपायों के लिए मिलने वाली प्रोत्साहन राशि को खत्म करने की बात की गई है. दो बच्चों तक सीमित रखने से जुड़े आशा (ASHA) इंसेंटिव को खत्म करने की भी मांग की गई है. परिवार नियोजन से जुड़े सभी अवॉर्ड, विश्व जनसंख्या दिवस के कार्यक्रमों और जनसंख्या नियंत्रण के लिए मनाए जाने वाले 'नसबंदी पखवाड़े' (Vasectomy Fortnight) को बंद करने की भी सिफारिश पेपर में की गई. यह भी कहा गया कि सभी राज्यों में 'दो-बच्चे के नियम' के तहत अयोग्य ठहराने वाले प्रावधानों को खत्म किया जाए.
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पॉलिसी की भाषा बदलने की मांगEAC-PM का सुझाव है कि जिन राज्यों में फर्टिलिटी रेट 'रिप्लेसमेंट लेवल' या उससे कम है, वहां 'मिशन परिवार विकास' के दायरे में बदलाव किया जाए. राज्य की पॉलिसी के मकसद के तौर पर आबादी कंट्रोल करना अब जरूरी नहीं रहा. हमारी family planning पॉलिसी में आबादी से जुड़ी नई हकीकत दिखनी चाहिए.
इसमें आगे कहा गया कि सरकारी कामकाज में सुस्ती और सांस्कृतिक सोच की वजह से ऐसी पॉलिसी बनी रहीं, जबकि जन्म दर में कमी आई है. 2001 में जन्म की संख्या लगभग 2.93 करोड़ (29.3 मिलियन) के पीक पर थी, जो 2023 तक घटकर इसका पांचवां हिस्सा रह गई है.

अमेरिकी कारोबारी एलन मस्क भारत के बदलते डेमोग्राफिक ट्रेंड्स पर पहले भी टिप्पणी कर चुके हैं. उन्होंने कहा कि भारत में लोगों के जन्म लेने की दर (बर्थ रेट) इतनी नीचे गिर चुकी है कि आबादी का मौजूदा स्तर बनाए रखना मुश्किल हो गया है. हाल ही में ‘एक्स’ पर भारत की फर्टिलिटी रेट से जुड़ा एक डेटा शेयर किया गया था. इसी पर टिप्पणी करते हुए एलन मस्क ने कहा कि भारत में घटती प्रजनन दर दुनिया के कई देशों में दिख रहे एक ट्रेंड को दिखाती है. यानी भारत ही नहीं बीते कुछ सालों में कई ऐसे देश हैं जहां प्रजनन दर गिरी है.
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