The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Is the Rafale Deal a Losing Bet? ₹3.25 Lakh Crore Spent, Yet No Technology Transfer from France

राफेल घाटे का सौदा, अरबों देकर भी फ्रांस के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा, सरकार क्या मानती है?

Rafale fighter jets Deal 2.0: भारत सरकार, फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने की तैयारी में है, जिसकी कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये है. यह राफेल डील भारतीय वायुसेना की स्क्वाड्रन कमी और चीन-पाकिस्तान खतरे को देखते हुए अहम मानी जा रही है. हालांकि सीमित टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, कम स्वदेशीकरण और सोर्स कोड न मिलने से इस डील पर सवाल उठ रहे हैं. रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने इन आरोपों पर दूसरा पक्ष भी रखा है.

Advertisement
Rafale fighter jets
3.25 लाख करोड़ देने के बाद भी सोर्स कोड से दूर क्यों भारत
pic
दिग्विजय सिंह
15 जनवरी 2026 (अपडेटेड: 18 जनवरी 2026, 04:25 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

भारत और फ्रांस के बीच राफेल फाइटर जेट को लेकर एक बार फिर बड़ी डील की तैयारी की खबर आई है. न्यूज़ एजेंसी ANI के मुताबिक रक्षा मंत्रालय 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की डील पर बातचीत शुरू करने वाला है. डॉलर में देखें तो ये करीब 36 बिलियन डॉलर बैठता है.

खबर आते ही पुराने सवाल फिर जिंदा हो गए. इतनी महंगी डील क्यों. क्या इसमें भारत को फायदा है. क्या टेक्नोलॉजी मिल रही है. और क्या इससे बेहतर विकल्प मौजूद थे.

ये नई राफेल डील असल में है क्या

सरल भाषा में कहें तो भारत फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की तैयारी में है. ये वही राफेल हैं जो पहले 36 की संख्या में खरीदे गए थे. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार संख्या भी ज्यादा है और कीमत भी.

ANI की रिपोर्ट के मुताबिक इन विमानों में सिर्फ करीब 30 फीसदी ही स्वदेशी कंटेंट होगा. यानी 70 फीसदी हिस्सा फ्रांस से आएगा. इसके साथ ही कोई अतिरिक्त टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं होगा और सबसे अहम बात, सोर्स कोड पूरी तरह फ्रांस के पास रहेगा.

राफेल की जरूरत भारत को क्यों पड़ी

भारतीय वायुसेना इस वक्त गंभीर संकट से गुजर रही है. संकट का नाम है फाइटर जेट स्क्वाड्रन की भारी कमी.

भारत को दो मोर्चों पर लड़ने की तैयारी करनी होती है. एक तरफ पाकिस्तान और दूसरी तरफ चीन. इसके लिए वायुसेना को कम से कम 42 फाइटर स्क्वाड्रन चाहिए.
हकीकत ये है कि इस वक्त वायुसेना के पास सिर्फ 30 के आसपास स्क्वाड्रन बचे हैं. मिग-21 और मिग-27 जैसे पुराने विमान रिटायर हो चुके हैं या होने वाले हैं. नए विमान उतनी तेजी से नहीं आ पा रहे.

Image embed
राफेल की दूसरी खेप में 114 फाइटर जेट!
स्क्वाड्रन की कमी क्यों घातक मानी जा रही है

फाइटर स्क्वाड्रन की कमी सिर्फ कागजों की समस्या नहीं है. ये सीधा देश की सुरक्षा से जुड़ा मसला है. अगर एक साथ दो मोर्चों पर तनाव बढ़ता है तो वायुसेना के पास हर सेक्टर में पर्याप्त ताकत नहीं बचती. पायलट्स पर दबाव बढ़ता है. विमानों का ओवरयूज़ होता है. मेंटेनेंस साइकल बिगड़ती है.

चीन लगातार अपने एयरबेस और फाइटर फ्लीट को मजबूत कर रहा है. पाकिस्तान भी अपनी वायुसेना को अपग्रेड कर रहा है. ऐसे में स्क्वाड्रन की कमी भारत के लिए बड़ा रणनीतिक खतरा बन जाती है.

MMRCA डील क्या थी और उसका मकसद क्या था

वायुसेना की इसी कमी को पूरा करने के लिए MMRCA यानी मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम लाया गया था. इसका मकसद था 126 फाइटर जेट खरीदना. जिनमें से ज्यादातर भारत में बनाए जाने थे. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी इसका बड़ा हिस्सा था.

इस टेंडर में राफेल और यूरोफाइटर टाइफून फाइनल राउंड तक पहुंचे. आखिरकार राफेल को चुना गया.

ये भी पढ़ें: पाकिस्तान ने Tejas के बाद बनाना शुरू किया था JF-17, फिर एक्सपोर्ट भारत से पहले कैसे?

फिर MMRCA टेंडर क्यों नहीं हुआ और डायरेक्ट डील क्यों

MMRCA डील कागजों में अच्छी थी लेकिन जमीन पर बेहद जटिल साबित हुई. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर. HAL की जिम्मेदारी. लागत बढ़ने का खतरा. और डिलीवरी में देरी.
वायुसेना को तुरंत विमान चाहिए थे. सालों तक टेंडर और बातचीत का वक्त नहीं था.

इसी वजह से सरकार ने रास्ता बदला. 2016 में सीधे सरकार से सरकार के बीच 36 राफेल की डील की गई. ताकि जल्दी से जल्दी लड़ाकू ताकत बढ़ाई जा सके. अब 114 राफेल की बातचीत भी उसी डायरेक्ट गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट मॉडल पर होती दिख रही है.

पहले वाली 36 राफेल डील क्या थी

2016 में भारत ने फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदे थे. इस डील की कुल कीमत करीब 59000 करोड़ रुपये बताई गई थी. इन विमानों में भारत के लिए खास बदलाव किए गए थे. जैसे मेटियोर मिसाइल. स्कैल्प क्रूज मिसाइल. बेहतर रडार और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम.

वायुसेना ने इन विमानों को बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी. बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद राफेल की रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई.

Image embed
भारत-फ्रांस रक्षा सहयोग बढ़ रहा है (फोटो- इंडिया टुडे)
नई 114 राफेल डील में फर्क क्या है

इस बार सबसे बड़ा फर्क संख्या का है. 36 की जगह 114 विमान. दूसरा फर्क कीमत को लेकर बताया जा रहा है. समाचार एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक कुल डील करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की बताई जा रही है. तीसरा और सबसे अहम फर्क टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का बताया जा रहा है. आरोप लग रहे हैं कि इस बार कोई नई टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात नहीं है. रिपोर्ट्स की मानें तो सिर्फ 30 फीसदी स्वदेशी कंटेंट ही होंगे. समाचार एजेंसी ANI की ही एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक 114 में से 24 राफेल सीधा फ्रांस से आएंगे, जबकि बाकि के फाइटर जेट्स को भारत में ही असेंबल किया जाएगा. फ्रेंच डिफेंस पोर्टल Avions Legendarie ने भी एएनआई के ख़बर की पुष्टि की है.

सोर्स कोड का मामला इतना संवेदनशील क्यों है

सोर्स कोड फाइटर जेट का दिमाग होता है. उसी से तय होता है कि रडार कैसे काम करेगा. कौन सी मिसाइल लगेगी. और सॉफ्टवेयर में क्या बदलाव हो सकते हैं.
अगर सोर्स कोड आपके पास नहीं है तो आप निर्माता देश पर निर्भर रहते हैं. भविष्य में किसी देसी हथियार या सिस्टम को जोड़ने के लिए भी अनुमति लेनी पड़ती है.
यही वजह है कि एक्सपर्ट इस डील पर सवाल उठा रहे हैं.

वायुसेना राफेल से खुश क्यों है

ऑपरेशनल स्तर पर भारतीय वायुसेना राफेल को लेकर बेहद संतुष्ट नजर आती है. वायुसेना के पायलट्स और टेक्निकल स्टाफ का मानना है कि राफेल इस वक्त भारत के पास मौजूद सबसे भरोसेमंद और घातक फाइटर जेट है. इसकी उपलब्धता दर बेहतर है और उड़ान के दौरान इसकी परफॉर्मेंस ने पायलट्स का भरोसा जीता है.

मेंटेनेंस के मामले में भी राफेल को दूसरे पश्चिमी फाइटर जेट्स की तुलना में ज्यादा स्थिर और आसान बताया जाता है. इसके एवियोनिक्स सिस्टम काफी एडवांस हैं और मल्टी रोल क्षमता इसे एक ही मिशन में कई तरह की भूमिका निभाने लायक बनाती है. हालांकि यहां एक फर्क समझना जरूरी है. ऑपरेशनल खुशी यानी जेट उड़ाने और लड़ाई लड़ने की संतुष्टि अलग बात है, जबकि रणनीतिक सौदे की शर्तें, टेक्नोलॉजी कंट्रोल और भविष्य की निर्भरता एक अलग और ज्यादा बड़ा सवाल है.

Image embed
वायुसेना को पसंद हैं राफेल विमान! (फोटो- AP)
इस डील की आलोचना क्यों हो रही है

इस डील की आलोचना की सबसे बड़ी वजह इसकी कीमत है. सवाल उठाने वाले कह रहे हैं कि 3.25 लाख करोड़ रुपये जैसे भारी भरकम बजट के बाद भी भारत को सिर्फ तैयार फाइटर जेट मिल रहे हैं, न कि पूरी टेक्नोलॉजी. दूसरा बड़ा आरोप कम स्वदेशीकरण को लेकर उठ रहा है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन विमानों में सिर्फ करीब 30 फीसदी ही देसी कंटेंट होगा, जिससे भारतीय रक्षा उद्योग को सीमित फायदा मिलता है.

तीसरा और सबसे बड़ा आरोप टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर लगाया जा है. कहा जा रहा है कि सोर्स कोड और डिजाइन पर फ्रांस का कंट्रोल बना रहेगा. अगर ये सच है तोे इसका मतलब है कि भारत भविष्य में अपग्रेड, बदलाव और नए हथियार जोड़ने के लिए विदेशी मंजूरी पर निर्भर रहेगा. यही कारण है कि Make in India को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. लोग पूछ रहे हैं कि जब इतना बड़ा खर्च किया जा रहा है, तो भारत को डिजाइन, कंट्रोल और आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस फायदा क्यों नहीं मिल रहा.

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने क्या कहा?

सवाल उठेंगे तो जवाब भी आएंगे. आरोप लगेंगे तो सफाई भी होगी. फिर मामला चाहे अदालत का हो या राफेल डील का. राफेल को लेकर चल रही बहस के बीच सूत्रों के हवाले से सरकार का पक्ष भी सामने आया है. लल्लनटॉप से खास बातचीत में मंत्रालय के सूत्रों ने राफेल डील को लेकर लग रही अटकलों पर पक्ष रखा है.

सबसे पहले चर्चा 114 राफेल फाइटर जेट्स की कीमत को लेकर हुई. आरोप ये है कि भारत इस बार 2016 के मुकाबले ज्यादा पैसे चुका रहा है. इस पर डिफेंस सोर्सेस ने साफ कहा कि ये दावा सही नहीं है.

Image embed

यहां ये समझना भी जरूरी है कि रक्षा सौदों की सटीक कीमतें गोपनीयता की वजह से कभी सार्वजनिक नहीं की जातीं. ऐसे में राफेल के महंगे या सस्ते होने को लेकर जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वो महज कयास ही हैं.

राफेल डील पर दूसरा बड़ा सवाल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर उठाया जा रहा है. आरोप है कि भारत को जरूरी तकनीक नहीं मिल रही. इस पर भी रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने स्थिति साफ करते हुए कहा,

Image embed

रक्षा सूत्रों का ये भी कहना है कि इस डील के तहत ज्यादातर राफेल फाइटर जेट्स की असेंबली भारत में ही होगी. इसके लिए देश में असेंबली लाइन बनेगी, जिससे स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिलेगा. साथ ही बड़ी संख्या में कलपुर्जे भी भारत में ही तैयार किए जाएंगे.

ये भी पढ़ें: पाकिस्तान के ड्रोन कितने खतरनाक और भारत की तैयारी कितनी मजबूत? पूरा खेल समझिए

क्या ये घाटे का सौदा है

अगर कम वक्त के नजरिए से देखें तो राफेल की ये खरीद पूरी तरह घाटे का सौदा नहीं कही जा सकती. वायुसेना को तुरंत लड़ाकू ताकत मिलने जा रही है और फाइटर जेट स्क्वाड्रन की जो गंभीर कमी बनी हुई है, उसे कुछ हद तक संभाला जा सकेगा. चीन और पाकिस्तान, दोनों मोर्चों पर भारत की ऑपरेशनल क्षमता मजबूत होगी. पायलट्स को एक ऐसा प्लेटफॉर्म मिलेगा जो पहले से आजमाया हुआ है और जिस पर भरोसा किया जा सकता है.

साथ ही सरकार और रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का दावा है कि इस सौदे में कीमत को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, वो भ्रामक हैं. सूत्रों के मुताबिक महंगाई और अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार में आई बढ़ोतरी को देखें तो राफेल की लागत 2016 के आसपास ही बैठती है. इसके अलावा ज्यादातर फाइटर जेट्स की असेंबली भारत में होने की बात कही जा रही है, जिससे स्थानीय रोजगार बढ़ेगा और कुछ हद तक स्वदेशी कलपुर्जों का इस्तेमाल भी होगा.

हालांकि लंबी अवधि की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर डील अभी अंतिम चरण में है और सरकार का कहना है कि समझौता फाइनल होने पर ज्यादा सहूलियतें मिल सकती हैं. लेकिन जब तक ये साफ नहीं होता कि कौन सी तकनीक मिलेगी और कितनी मिलेगी, तब तक चिंता बनी रहेगी. अगर सोर्स कोड और अहम तकनीकों तक पहुंच सीमित रहती है, तो भविष्य में अपग्रेड, मेंटेनेंस और नए हथियार जोड़ने के लिए भारत को विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ सकता है.

यानी फिलहाल की जरूरतें तो पूरी होती दिखती हैं, लेकिन आत्मनिर्भर वायुसेना और स्वदेशी रक्षा उत्पादन के बड़े लक्ष्य इस डील के अंतिम स्वरूप पर ही टिके होंगे. डील में क्या मिलता है, उससे ज्यादा अहम ये होगा कि भारत को कितनी रणनीतिक आजादी मिल पाती है.

राफेल की खूबियां

राफेल को मल्टी रोल फाइटर इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह एक ही मिशन में कई तरह की भूमिकाएं निभा सकता है. यह दुश्मन के फाइटर जेट्स से हवा में लड़ाई भी कर सकता है और जमीन पर मौजूद टारगेट्स पर सटीक हमला भी. परमाणु हथियार ले जाने की क्षमता भी इसे रणनीतिक रूप से अहम बनाती है.

राफेल की सबसे बड़ी ताकत मेटियोर एयर-टू-एयर मिसाइल मानी जाती है, जो लंबी दूरी से दुश्मन के विमान को मार गिराने में सक्षम है. इसके अलावा इसमें लगा AESA रडार दूर से ही टारगेट पकड़ सकता है और एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकता है. इसका इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम दुश्मन के रडार और मिसाइल सिस्टम को चकमा देने में मदद करता है, जिससे युद्ध के मैदान में राफेल को बढ़त मिलती है.

राफेल की खामियां

राफेल की सबसे बड़ी खामी इसकी बेहद ऊंची कीमत मानी जाती है. विमान के साथ हथियार, मेंटेनेंस, ट्रेनिंग और लॉजिस्टिक सपोर्ट जोड़ने पर इसकी लागत और बढ़ जाती है, जिससे यह दुनिया के सबसे महंगे फाइटर जेट्स में गिना जाता है. इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद भी भारत को पूरी टेक्नोलॉजी एक्सेस नहीं मिलना कई सवाल खड़े करता है.

दूसरी बड़ी कमी सीमित टेक्नोलॉजी ट्रांसफर है. सोर्स कोड फ्रांस के पास रहने का मतलब है कि भारत भविष्य में किसी भी बड़े सॉफ्टवेयर बदलाव, देसी हथियार जोड़ने या सिस्टम अपग्रेड के लिए फ्रांस पर निर्भर रहेगा. इसके अलावा राफेल फुल स्टेल्थ विमान नहीं है, यानी आधुनिक रडार के सामने यह पूरी तरह अदृश्य नहीं रह सकता. ऐसे में आने वाले सालों में हर बड़े अपग्रेड और क्षमता बढ़ाने के लिए फ्रांस की सहमति और सहयोग जरूरी रहेगा, जो भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को सीमित करता है.

क्या इससे बेहतर विकल्प मौजूद थे

राफेल के अलावा भारत के सामने कई दूसरे विकल्प भी मौजूद थे. अमेरिकी F-15 और F-18 जैसे फाइटर जेट ताकतवर माने जाते हैं और उनकी मारक क्षमता भी काफी है, लेकिन इनके साथ राजनीतिक शर्तें और सप्लाई पर निर्भरता का जोखिम जुड़ा रहता है. अमेरिका के हथियार सौदों में रणनीतिक दबाव और भविष्य में स्पेयर या अपग्रेड रोक दिए जाने की आशंका हमेशा बनी रहती है.

यूरोफाइटर टाइफून तकनीकी रूप से उन्नत जरूर है, लेकिन इसकी लागत भी बहुत ज्यादा है और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर वही सीमाएं सामने आती हैं जो राफेल में दिखती हैं. वहीं देसी तेजस Mk2 भारत के लिए लंबी दौड़ का घोड़ा माना जाता है, लेकिन यह अभी विकास के दौर में है और वायुसेना की तुरंत जरूरतों को पूरा करने की स्थिति में नहीं है. यही वजह है कि हर विकल्प के अपने फायदे और कमजोरियां थीं और कोई भी ऐसा नहीं था जिसे पूरी तरह परफेक्ट कहा जा सके.

Image embed
कई विमानों के ऊपर राफेल को तहजीह (फोटो- IAF)
SU-57 क्यों नहीं लिया गया

SU-57 को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह अभी पूरी तरह परखा हुआ फाइटर प्लेटफॉर्म नहीं माना जाता. रूस खुद इसे सीमित संख्या में ही अपनी वायुसेना में शामिल कर पाया है और बड़े पैमाने पर इसका ऑपरेशनल इस्तेमाल अब तक नहीं दिखा है. इसके इंजन, स्टेल्थ क्षमता और मेंटेनेंस को लेकर भी समय समय पर सवाल उठते रहे हैं.

इसके अलावा यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की डिफेंस सप्लाई चेन दबाव में है, जिससे समय पर डिलीवरी, स्पेयर पार्ट्स और अपग्रेड को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है. भारत पहले ही रूस के साथ FGFA प्रोग्राम से बाहर निकल चुका है, क्योंकि उस परियोजना में लागत, तकनीक और भरोसे को लेकर मतभेद सामने आए थे. यही वजह है कि SU-57 को फिलहाल भारत के लिए एक जोखिम भरा विकल्प माना गया और राफेल जैसे परखे हुए प्लेटफॉर्म को तरजीह दी गई.

अमेरिका-चीन फैक्टर

भारत पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक रूप से अमेरिका के काफी करीब आया है, खासकर चीन को लेकर बढ़ती चुनौती के चलते. रक्षा, टेक्नोलॉजी और इंडो-पैसिफिक जैसे मुद्दों पर भारत और अमेरिका की साझेदारी मजबूत हुई है. लेकिन इसके बावजूद भारत किसी एक देश या गुट पर पूरी तरह निर्भर नहीं होना चाहता.

इसी संतुलन की राजनीति के तहत फ्रांस से राफेल जैसे फाइटर जेट खरीदना एक बैलेंसिंग एक्ट माना जाता है. इससे भारत यह संदेश देता है कि वह अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विकल्प खुले रखेगा और किसी एक ताकत के दबाव में नहीं आएगा. हालांकि इस रणनीतिक संतुलन की कीमत भारत को महंगे सौदों और सीमित टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के रूप में चुकानी पड़ रही है, जो इस नीति का दूसरा पहलू भी है.

आखिरी बात

राफेल एक शानदार फाइटर जेट है. इसमें कोई शक नहीं. लेकिन सवाल सिर्फ जेट का नहीं है. सवाल है आत्मनिर्भरता का. 114 राफेल भारत की ताकत बढ़ाएंगे. लेकिन ये आत्मनिर्भर भारत का जवाब नहीं हैं.

वीडियो: राफेल फाइटर जेट्स के खिलाफ चीन अब ये साज़िश रच रहा है

इस पोस्ट से जुड़े हुए हैशटैग्स

Advertisement

Advertisement

()