ये सोचिए. अगर कोई ताजमहल की टूटी दीवार पर सीमेंट का मोटा प्लास्टर चढ़ा दे और कहे कि "मरम्मत हो गई", तो आपका पहला रिएक्शन क्या होगा? कुछ ऐसा ही तक्षशिला के साथ हुआ है. वही तक्षशिला, जहां कभी दुनिया भर से छात्र पढ़ने आते थे. जहां चाणक्य ने राजनीति को नई दिशा दी, पाणिनी ने भाषा के नियम गढ़े और ज्ञान की ऐसी परंपरा बनी, जिसकी गूंज सदियों तक सुनाई देती रही.
यूनेस्को की चेतावनी: क्या सीमेंट की बोरियों तले दफन हो जाएगा वैदिक काल का तक्षशिला?
Destruction of Taxila: यूनेस्को ने तक्षशिला के संरक्षण को लेकर पाकिस्तान पर नाराजगी जताई है. यूनेस्को का कहना है कि रिपेयर वर्क के नाम पर पाकिस्तान इस ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट कर रहा है. सवाल है कि क्यों खतरे में है ये प्राचीन विश्वविद्यालय?


अब विडंबना देखिए. हजारों साल तक हमलों और वक्त की मार झेलने वाले इस ऐतिहासिक शहर को सबसे बड़ा नुकसान किसी आक्रमणकारी ने नहीं, बल्कि उसे "बचाने" के नाम पर की गई मरम्मत ने पहुंचाया है. पाकिस्तान के पुरातत्व विभाग ने प्राचीन पत्थरों पर आधुनिक सीमेंट चढ़ा दिया. नतीजा ये हुआ कि दुनिया भर के धरोहर विशेषज्ञ हैरान रह गए और यूनेस्को तक को खतरे की घंटी बजानी पड़ी.
इंडिया टुडे की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, तक्षशिला के प्राचीन अवशेषों की मरम्मत में आधुनिक सीमेंट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया. पुरातत्व संरक्षण की दुनिया में इसे गंभीर गलती माना जाता है, क्योंकि इससे स्मारक की ऐतिहासिक प्रामाणिकता और मूल संरचना दोनों पर खतरा पैदा हो सकता है. अब सवाल ये है कि आखिर तक्षशिला के साथ ऐसा हुआ कैसे, और क्या दुनिया की इस बेशकीमती विरासत की पहचान बचाई जा सकेगी?
ज्ञान की वो भूमि, जहां से दुनिया ने पढ़ना सीखा
आज के पाकिस्तान के रावलपिंडी के पास मौजूद तक्षशिला को इतिहासकार ईसा पूर्व छठी सदी का दुनिया का पहला विश्वविद्यालय मानते हैं. यहां सिर्फ हिंदू या बौद्ध शिक्षा नहीं दी जाती थी. राजनीति, युद्ध कौशल, खगोल विज्ञान और कई दूसरे विषयों की पढ़ाई भी होती थी. महान व्याकरणाचार्य पाणिनी ने अपनी कालजयी रचना 'अष्टाध्यायी' भी यहीं तैयार की थी. मौर्य काल में तो तक्षशिला ज्ञान और शोध का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका था. लेकिन विडंबना देखिए. जिस विरासत ने सदियों तक ज्ञान बचाकर रखा, आज उसे बचाने के नाम पर ही नुकसान पहुंचाया जा रहा है.
यूनेस्को के पुरातत्व विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता भी यही है. उनका कहना है कि किसी हजारों साल पुराने स्मारक पर सीमेंट की मोटी परत चढ़ाना इलाज नहीं, बल्कि उसकी उम्र घटाने जैसा है. वजह भी बेहद दिलचस्प है. सीमेंट नमी को बाहर निकलने नहीं देता. पानी दीवारों और ईंटों के भीतर ही फंस जाता है. धीरे धीरे वही नमी प्राचीन ईंटों को अंदर से खोखला करने लगती है. यानी बाहर से इमारत मजबूत दिख सकती है, लेकिन अंदर ही अंदर उसकी नींव कमजोर होती जाती है. इतिहास की भाषा में कहें तो ये संरक्षण नहीं, विरासत का धीमा दम घोंटना है.
सीमेंट वाला 'ब्लंडर': विज्ञान को क्यों नहीं समझ रहा पाकिस्तान?
इतिहास को बचाने के भी अपने नियम होते हैं. और सबसे दिलचस्प बात ये है कि कई बार किसी विरासत को बचाने के लिए सबसे जरूरी काम होता है, उसे आधुनिक तकनीक से दूर रखना. तक्षशिला जैसी हजारों साल पुरानी धरोहरों पर मरम्मत का मतलब नई दीवार खड़ी करना नहीं, बल्कि उसी दौर की तकनीक और सामग्री से उन्हें सहारा देना होता है. लेकिन अगर इस मूल सिद्धांत को ही नजरअंदाज कर दिया जाए, तो संरक्षण और विनाश के बीच की रेखा पल भर में मिट जाती है.
इसी वजह से दुनिया भर में ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए चूने और मिट्टी जैसी पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. ये पुरानी दीवारों के साथ तालमेल बिठाती हैं और उन्हें स्वाभाविक तरीके से सांस लेने देती हैं. सीमेंट आधुनिक इमारतों के लिए भले बेहतरीन विकल्प हो, लेकिन पुरातत्व की दुनिया में इसे बड़ी चूक माना जाता है.

समाचार पत्र 'डॉन' की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के पुरातत्व विभाग ने तक्षशिला में जिस तरह सीमेंट से फिलिंग की, उससे मूल संरचना को स्थायी नुकसान पहुंचा है. मामला सिर्फ दरार भरने का नहीं है. सवाल उस असली वास्तुकला को बचाने का है, जो करीब ढाई हजार साल से इतिहास की गवाही दे रही है. वैज्ञानिक भी बताते हैं कि सीमेंट और प्राचीन पत्थरों का तापमान के साथ फैलने और सिकुड़ने का तरीका अलग होता है. नतीजा ये होता है कि मौसम बदलने के साथ पुराने पत्थरों पर दबाव बढ़ता है और उनमें दरारें पड़ने लगती हैं. यानी जिसे मरम्मत समझा गया, वही आने वाले वक्त में सबसे बड़ा नुकसान साबित हो सकता है.
यूनेस्को की चेतावनी: अब डीलिस्टिंग की तलवार
अब सवाल सिर्फ टूटती ईंटों का नहीं रह गया है. मामला उस सम्मान का है, जिसे पाने के लिए दुनिया के देश दशकों तक इंतजार करते हैं. एक बार अगर किसी ऐतिहासिक धरोहर पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का भरोसा उठ जाए, तो उसकी भरपाई सिर्फ पैसों से नहीं हो सकती. तक्षशिला भी अब ठीक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां अगला कदम उसकी वैश्विक पहचान तय कर सकता है.
यूनेस्को का 'वर्ल्ड हेरिटेज' स्टेटस किसी भी देश के लिए सम्मान की सबसे बड़ी मुहर माना जाता है. इसका मतलब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय पहचान नहीं होता, बल्कि संरक्षण, विशेषज्ञों की मदद और वैश्विक सहयोग का रास्ता भी खुलता है. लेकिन इसके साथ कुछ सख्त नियम भी जुड़े होते हैं. अगर कोई देश उन नियमों की अनदेखी करता है और धरोहर की मूल संरचना से छेड़छाड़ करता है, तो उसे 'डेंजर लिस्ट' में डाला जा सकता है.
तक्षशिला को लेकर यूनेस्को ने भी कड़ी आपत्ति जताई है. संस्था का कहना है कि अगर प्राचीन संरचनाओं के साथ इसी तरह का हस्तक्षेप जारी रहा, तो तक्षशिला को 'वर्ल्ड हेरिटेज' सूची से बाहर किया जा सकता है. ऐसा हुआ तो नुकसान सिर्फ पाकिस्तान का नहीं होगा. दुनिया अपनी उन विरासतों में से एक को खोने के और करीब पहुंच जाएगी, जिसने कभी ज्ञान, शिक्षा और सभ्यता की दिशा तय की थी. यही वजह है कि अब नजरें इस पर टिकी हैं कि चेतावनी के बाद हालात बदलते हैं या इतिहास का एक और अनमोल अध्याय धीरे धीरे धुंधला पड़ जाता है.
सिर्फ तक्षशिला ही नहीं, मोहनजोदड़ो का हाल भी बुरा है
अगर आपको लग रहा है कि तक्षशिला के साथ जो हुआ, वो एक अलग घटना है, तो तस्वीर इससे कहीं बड़ी है. सवाल सिर्फ एक स्मारक का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो संरक्षण और निर्माण के फर्क को ही मिटा देती है. यही वजह है कि इतिहासकार इस पूरे विवाद को एक बड़ी चेतावनी की तरह देख रहे हैं.
ये पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान की विरासत संरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठे हों. ‘द गार्डियन’ के मुताबिक इससे पहले मोहनजोदड़ो में भी संरक्षण के नाम पर ऐसे फैसलों की आलोचना हुई थी, जिन्हें विशेषज्ञों ने ऐतिहासिक संरचनाओं के लिए नुकसानदेह बताया. उनका कहना था कि मरम्मत के दौरान पुरातत्व के बुनियादी सिद्धांतों का पूरा पालन नहीं किया गया, जिससे दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक की मौलिकता प्रभावित होने का खतरा बढ़ा.
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या सिर्फ तकनीक की नहीं, बल्कि नजरिए की भी है. उनका आरोप है कि पाकिस्तान में कई ऐतिहासिक स्थलों को विरासत के बजाय पर्यटन से कमाई के साधन की तरह देखा जाता है. ऐसे में संरक्षण की प्राथमिकता पीछे छूट जाती है. तक्षशिला के धर्मराजिका स्तूप और आसपास के प्राचीन मठों में जिस तरह का काम हुआ, उसने भी यही बहस तेज कर दी है कि अगर इतिहास को आधुनिक निर्माण की तरह 'ठीक' किया जाएगा, तो कहीं उसे हमेशा के लिए खो तो नहीं दिया जाएगा.

तक्षशिला सिर्फ पाकिस्तान का मामला नहीं है, ये पूरी मानव जाति की थाती है. अगर सीमेंट की इन बोरियों को तुरंत नहीं हटाया गया और सही पुरातत्व विशेषज्ञों की सलाह नहीं ली गई, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में ही तक्षशिला के बारे में पढ़ पाएंगी. असल में तो वहां बस सीमेंट का एक ढेर बचेगा.
बात अब पाकिस्तान मेें बर्बाद होते पुरातात्विक जगहों की चल ही निकली है तो ‘द लल्लनटॉप’ ने वहां गिराए जा रहे गुरुद्वारों पर भी एक स्टोरी की है. शीर्षक है- 1947 से अब तक सिखों पर कितना अत्याचार, पाकिस्तान में क्यों ढहाए जा रहे ऐतिहासिक गुरुद्वारे? दिलचस्पी हो तो लिंक पर क्लिक करके जरूर पढ़ें.
वीडियो: यूनेस्को वर्ल्ड हैरिटेज साइट का दर्जा छिन कैसे जाता है?















