आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI. एक ऐसी चीज है जो बड़े से बड़े टास्क को चुटकियों में पूरा कर देता है. लेकिन हर वो चीज जिसका अच्छा इस्तेमाल हो सकता है, उसका बुरा इस्तेमाल होने की गुंजाइश भी उतनी ही होती है. यही AI के साथ भी हो रहा है. एक नई स्टडी से पता चला है कि दुनिया के सबसे खूंखार आतंकी संगठन जैसे अलकायदा, इस्लामिक स्टेट (IS) और बोको हराम भी अटैक की प्लानिंग और बम बनाने के लिए AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.
'बम कैसे बनाऊं?' AI से पूछ रहे अलकायदा और बोको हराम के आतंकी, नई स्टडी में बड़ा खुलासा
आतंक की ट्रेनिंग से लेकर Explosives बनाने, हमले की प्लानिंग; हर चीज के लिए AI की ट्रेनिंग दी जा रही है. साथ ही आतंकियों को अपनी Online Activity और पहचान छुपाने के लिए VPN और Encrypted Software का इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी जा रही थी.


इस स्टडी के पब्लिश होने से पहले रिसर्चर डॉ जूलिच ने इसे 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' के साथ शेयर किया था. उनकी स्टडी के मुताबिक आतंकी संगठन AI टूल्स का इस्तेमाल करके विस्फोटक बनाने, हथियारों को अपग्रेड करने और दुश्मनों पर हमले के नए तरीके सोचने का काम कर रहे हैं. आतंकी संगठन बोको हराम के सबसे मेन ग्रुप 'इस्लामिक स्टेट वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस' के एक पूर्व कमांडर ने पिछले साल डॉ जूलिच को AI चैटबॉट के इस्तेमाल के बारे में बताया था. उसने डॉ जूलिस से एआई के बारे में बताते हुए कहा,
इसमें आप बस सवाल टाइप करते हैं या बोलकर पूछते हैं और यह आपको डिटेल में जवाब देता है. जैसे 'मैं बम कैसे बना सकता हूँ?' और फिर यह आपको तरीका बता देता है. यह बिल्कुल एक इंसानी रोबोट जैसा है! हमने इसका बहुत इस्तेमाल किया.
ऐसा नहीं है कि डॉ जूलिच यूं ही इस नतीजे पर पहुंच गए. उन्होंने अपनी स्टडी के लिए नाइजीरिया में बोको हराम के 27 पूर्व सदस्यों के साथ लगभग 60 इंटरव्यू किए. इसमें से कई लोगों ने बताया कि AI चैटबॉट्स का इस्तेमाल ऐसी टेक्निकल जानकारी पाने के लिए किया जा रहा था, जिससे हथियारों को बेहतर बनाने और हमलों की योजना बनाने में मदद मिल सके. बोको हराम के पूर्व सदस्यों ने बताया कि ग्रुप ने AI की ट्रेनिंग के लिए सेशन आयोजित किए थे. इन सेशंस को कथित तौर पर इस्लामिक स्टेट (ISIS) से जुड़े लोग चला रहे थे. इन सेशंस में AI चैटबॉट्स का ज्यादा असरदार तरीके से इस्तेमाल करना सिखाया जाता था.
VPN इस्तेमाल करना सिखाया गयाडॉ. जूलिच की स्टडी के मुताबिक, ट्रेनिंग सेशन के दौरान ये भी सिखाया जाता था कि अपनी ऑनलाइन एक्टिविटीज को कैसे छिपाया जाए. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि इंटरनेट पर सर्फिंग के दौरान आपका डेटा गुप्त रहे. स्टडी के मुताबिक अपनी गतिविधियों को छिपाने के लिए VPN और एन्क्रिप्टेड सॉफ्टवेयर वाले लैपटॉप का इस्तेमाल किया जाता था. ट्रेनिंग देने वाले ने उन्हें AI अकाउंट बनाना, काम के जवाब पाने के लिए सही तरीके से सवाल पूछना और चैटबॉट्स की सुरक्षा पाबंदियों (Security Restrictions) को बायपास करना भी सिखाया.
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रिपोर्ट में ट्यूनीशिया के एक 27 साल के व्यक्ति के मामले का जिक्र किया गया है. उस व्यक्ति को मई में पेरिस में एक म्यूजियम या यहूदी स्थल पर हमले की कथित साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. जांच करने वालों ने बताया कि इस हमले की योजना बनाने में AI का इस्तेमाल किया गया था. जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में आतंकवाद मामलों के एक्सपर्ट डैनियल बाइमैन कहते हैं कि आतंकवादी ग्रुप सिर्फ चैटबॉट पर निर्भर नहीं रहते. इसके बजाय वे ChatGPT, Claude, Gemini, Grok और DeepSeek जैसे अलग-अलग AI प्लेटफॉर्म पर जाते रहते हैं.
आतंकियों के हाथ AIइस मामले पर CIA डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ ने भी अपने विचार रखे थे. बीते दिनों ही उन्होंने कहा था कि आतंकवादी समूहों का AI इस्तेमाल करना डिजिटल परमाणु हथियारों के बराबर है. वहीं अमेरिकी खुफिया अधिकारियों का कहना है कि कुछ आतंकवादी समूह 3D-प्रिंटेड हथियार के पुर्जे बनाने में मदद के लिए भी AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, AI का इस्तेमाल ड्रोन के पुर्जे, हथियार के कंपोनेंट और गोला-बारूद की फिटिंग को डिजाइन और बनाने में भी किया जा रहा है.
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