छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व मंच तक पहुंचाने वालीं मशहूर पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन हो गया है. महाभारत की कथाओं को अपनी दमदार आवाज से घर-घर तक पहुंचाने के लिए उन्हें जाना जाता है. रविवार, 5 जुलाई 2026 को तड़के 3:15 बजे रायपुर स्थित अखिल ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) में तीजन बाई ने अंतिम सांस ली. उनकी उम्र 70 साल थी. पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित तीजन बाई के निधन से भारतीय लोक कला जगत ने अपनी सबसे चमकदार विभूतियों में से एक को खो दिया है.
मशहूर पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन, महाभारत की 'अमर' आवाज हुई 'मौन'
Teejan Bai को बचपन से ही Mahabharata की कथाओं में गहरी रुचि थी. उनके नाना बृजलाल पारधी उन्हें महाभारत की कहानियां सुनाया करते थे. यही कहानियां आगे चलकर उनके जिंदगी का मकसदबन गईं.


भारतीय लोक कला में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें दो बार पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया. 1988 में तीजन बाई को पद्मश्री और 2019 में पद्म विभूषण से नवाजा गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख जाहिर किया. उन्होंने X पर लिखा,
"सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है. उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान दिलाई. उनका जाना कला एवं संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है. शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं. ओम शांति!"

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्वितीय कला से छत्तीसगढ़ का नाम पूरे देश और दुनिया में रोशन किया. उनका निधन राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोक कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है.
13 साल की उम्र में पहली परफॉर्मेंसतीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में हुआ था. उनकी माता का नाम सुखवती देवी, और पिता का नाम हुनुकलाल पारधी था. बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं में गहरी रुचि थी. उनके नाना बृजलाल पारधी उन्हें महाभारत की कहानियां सुनाया करते थे. यही कहानियां आगे चलकर उनके जिंदगी का मकसदबन गईं.
तीजन बाई ने गुरु उमेद सिंह देशमुख से पंडवानी गायन की विधिवत शिक्षा ली. मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार पब्लिक प्लेटफॉर्म पर परफॉर्म किया. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
पंडवानी को दिलाई वैश्विक पहचानपंडवानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक गायन शैली है, जिसमें महाभारत के प्रसंगों को गायन, अभिनय और संगीत के जरिए जीवंत रूप में पेश किया जाता है. तीजन बाई इस कला की 'कापालिक शैली' की सबसे बड़ी आर्टिस्ट मानी जाती थीं. इस शैली में कलाकार हाथ में तंबूरा लेकर खड़े होकर एक्टिंग, डायलॉग और गाकर महाभारत की कथा पेश करता है.
अपनी बुलंद आवाज, मंच पर असरदार मौजदूगी और भावपूर्ण अभिनय के दम पर तीजन बाई ने पंडवानी को गांवों की चौपाल से निकालकर देश और दुनिया के मंचों तक पहुंचाया. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय लेवल पर अनेक देशों में प्रस्तुतियां देकर भारतीय लोक कला की ऐसी पहचान बनाई, जिस पर पूरे देश को गर्व है.
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