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100 दिनों में 17 मौत की सजा देने वाले जज रवि कुमार दिवाकर कौन हैं?

Muzaffarnagar trial court death sentences: मुजफ्फरनगर की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर ने 100 दिनों में 17 लोगों को मौत की सजा सुनाई. उन्होंने 6 अप्रैल से 17 जुलाई के बीच मामलों की सुनवाई करते हुए 22 आरोपियों में से 17 को डेथ सेंटस दिया है.

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जज रवि कुमार दिवाकर ने 100 दिन में 17 मौत की सजा सुनाई है. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर ने 6 अप्रैल से 17 जुलाई के बीच 22 आरोपियों में से 17 को मौत की सजा सुनाई है।
  • सुप्रीम कोर्ट के 'मनोज और अन्य बनाम मध्य प्रदेश' मामले में मौत की सजा से पहले आरोपी की मानसिक स्थिति और व्यवहार की रिपोर्ट की जांच करने का निर्देश दिया गया है, जिसका पालन जांच में जरूरी है।
  • जज रवि कुमार दिवाकर के द्वारा सुनाई गई मौत की सजा की मंजूरी इलाहाबाद हाई कोर्ट से ली जाएगी और दोषी इसके खिलाफ अपील कर सकते हैं, जिससे सजा अमल में आने से पहले अतिरिक्त जांच संभव है।

100 दिनों में 17 लोगों को मौत की सजा सुनाने वाले जज के बारे में पता है? वह मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज हैं. नाम है रवि कुमार दिवाकर. उन्होंने 6 अप्रैल से 17 जुलाई के बीच मामलों की सुनवाई करते हुए 22 आरोपियों में से 17 को डेथ सेंटेंस दिया है. पहले जानते हैं कि ये मामले क्या हैं, जिन पर मौत की सजा सुनाई गई है और क्या फास्ट ट्रैक कोर्ट किसी मौत की सजा खुद से दे सकता है? फिर जानेंगे कि ये जज रवि कुमार दिवाकर कौन हैं?

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किन मामलों में किसे मिली मौत की सजा?

6 अप्रैल: मुजफ्फरनगर फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने तीन लोगों को मौत की सजा सुनाई. उन पर एक युवा एडवोकेट और दोषियों में से एक के करीबी दोस्त के अपहरण और हत्या का आरोप था.  

28 अप्रैल: 70 हजार रुपये के कर्ज को लेकर एक व्यक्ति की ईंटों से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. मर्डर के आरोप में पिता और उसके तीन बेटों को दोषी ठहराया गया. कोर्ट ने इसे मॉब लिंचिंग जैसा माना.

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30 मई: एक महिला और उसके 6 साल के बेटे की हत्या के मामले में एक शख्स को मौत की सजा सुनाई गई. महिला के साथ वह रिलेशनशिप में था. उसके अपराध को और गंभीर माना गया क्योंकि वह पहले से ही अपनी पत्नी की दहेज के कारण हुई मौत के मामले में जेल में था.

20 जून: दो लोगों को एक व्यक्ति की हत्या करने और शव को जलाने का दोषी ठहराया गया.

2 जुलाई: एक व्यक्ति को होमगार्ड की जान लेने और दूसरे पर जानलेवा हमला करने के आरोप में सजा सुनाई गई.

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6 जुलाई: दो लोगों को पंचायत चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की हत्या करने का दोषी ठहराया गया. उन्होंने पुलिस कस्टडी से हथियार भी गायब किया था.

17 जुलाई: चार लोगों को हाईवे पर ‘गैंग-स्टाइल’ में लूट और हत्या की वारदात को अंजाम देने के लिए सजा सुनाई गई.

हाई कोर्ट की मंजूरी जरूरी

अब सवाल है कि क्या सेशन कोर्ट किसी को मौत की सजा सुना सकता है? जवाब है- ट्रायल कोर्ट किसी दोषी को मौत की सजा सुना तो सकता है लेकिन फैसले को लागू करने से पहले हाई कोर्ट की मंजूरी जरूरी है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मुजफ्फरनगर ट्रायल कोर्ट ने जिन्हें मौत की सजा सुनाई है, उनकी सजाओं को मंजूरी के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजा जाएगा. कोई दोषी खुद भी सेंटेंस के खिलाफ अपील दायर कर सकता है.

यहां पर दूसरी अहम बात है, नियमों का पालन करना. मौत की सजा सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के 2022 में 'मनोज और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले में तय किए गए नियमों का पालन करना जरूरी है. इन नियमों में सजा कम करने वाली परिस्थितियों और आरोपी के व्यवहार की रिपोर्ट जांच करना भी शामिल है.

मौत की सजा सुनाने से पहले ट्रायल कोर्ट के पास आरोपी की मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति, जेल में आचरण, व्यवहार और हिरासत में किए गए काम की रिपोर्ट होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने कहा था कि इसका मकसद यह देखना है कि क्या दोषी के सुधरने की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो चुकी है. क्योंकि मौत की सजा सिर्फ ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ में ही दी जानी चाहिए. एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जज दिवाकर के आदेशों में इन रिपोर्ट्स को रिकॉर्ड पर लेने या विचार करने का जिक्र नहीं मिलता.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जज ने दो मामलों में दोषियों के चेहरे के हाव-भाव और व्यवहार पर गौर किया. कोर्ट को नहीं लगा कि उन्हें अपने अपराध पर पछतावा है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 'मनोज सेफगार्ड्स' का पालन करना जरूरी है. अगर इनका पालन नहीं किया गया, तो पहले से अंतिम मानी गई मौत की सजा को भी संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत फिर से खोला जा सकता है. यानी चुनौती दी जा सकती है.

कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?

अब जानते हैं कि जज रवि दिवाकर कौन हैं? NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, 46 वर्षीय एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर अपने कड़े फैसलों के लिए जाने जाते हैं. वह लखनऊ के रहने वाले हैं. उन्होंने 2009 में आजमगढ़ में एडिशनल सिविल जज के तौर पर अपना करियर शुरू किया था. इसके बाद मई 2015 में उन्हें सुल्तानपुर में सिविल जज बनाया गया. लगभग पांच महीने बाद वह ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पद पर प्रमोट हुए.

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उनके पास BCom और LLM की डिग्री है. जज दिवाकर नवंबर 2025 से मुजफ्फरनगर में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के तौर पर काम कर रहे हैं.  

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