बुलेट ट्रेन का नाम सुनते ही दिमाग में तेज रफ्तार दौड़ती ट्रेन की तस्वीर आती है. लेकिन इस प्रोजेक्ट की असली कहानी पटरी पर नहीं, बल्कि समंदर के नीचे, विशाल पुलों के ऊपर और हजारों इंजीनियरों की मेहनत के बीच लिखी जा रही है. मुंबई अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट (MAHSR) सिर्फ भारत का पहला हाई स्पीड रेल कॉरिडोर नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग, तकनीक और भारत-जापान की दोस्ती का ऐसा नमूना है, जो हर मोड़ पर चौंकाता है.
समंदर के नीचे 21 किलोमीटर की सुरंग, भारत की पहली बुलेट ट्रेन के चौंका देने वाली फैक्ट
Bullet Train Project: भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना सिर्फ रफ्तार का खेल नहीं है. जानिए समंदर के नीचे बन रही देश की पहली टनल, महाराष्ट्र-गुजरात का जमीन विवाद, जापानी 'शिनकानसेन' टेक्नोलॉजी और भारत-जापान के सांस्कृतिक तालमेल के सबसे रोचक और अनसुने किस्से.


'नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड' (NHSRCL) के मुताबिक गुजरात के हिस्से में पुलों और स्टेशनों का काम लगभग पूरा हो चुका है, जबकि महाराष्ट्र के हिस्से में समंदर के नीचे बनने वाली टनल पर दुनिया की सबसे आधुनिक मशीनें दिन-रात काम कर रही हैं. ये प्रोजेक्ट सिर्फ रेल की पटरी बिछाने जैसा नहीं है. इसके पीछे कई बेहद दिलचस्प कहानियां हैं.
समंदर के नीचे 21 किलोमीटर का 'ब्लाइंड स्पॉट'
इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे रोमांचक और चुनौतीपूर्ण हिस्सा है ठाणे क्रीक (Thane Creek) के नीचे बनने वाली टनल. भारत के इतिहास में पहली बार कोई ट्रेन समंदर के नीचे से गुजरेगी. इस टनल की कुल लंबाई 21 किलोमीटर है, जिसमें से करीब 7 किलोमीटर का हिस्सा समंदर के नीचे रहेगा. जब बुलेट ट्रेन इस हिस्से से गुजरेगी, तो उसकी रफ्तार 320 किलोमीटर प्रति घंटा होगी.
इस दलदली और समुद्री हिस्से में जमीन से करीब 114 मीटर नीचे खुदाई करना कोई मामूली बात नहीं थी. पानी के भारी दबाव और कमजोर चट्टानों के बीच रास्ता बनाना इंजीनियरों के लिए एक बड़ा 'ब्लाइंड स्पॉट' था. इसके लिए जापान की सबसे आधुनिक टनल बोरिंग मशीनों (TBM) का इस्तेमाल किया जा रहा है. इन विशालकाय मशीनों को देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ी शार्क जमीन के अंदर रास्ता बना रही हो. नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) के मुताबिक, इस टनल के बनने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना ट्रेन को सुरक्षित रास्ता मिल सकेगा.
जापानी 'समय के पाबंद' इंजीनियर बनाम भारतीय 'जुगाड़'
जापान की बुलेट ट्रेन यानी 'शिनकानसेन' (Shinkansen) का अपना एक शानदार इतिहास है. जापान में ये ट्रेनें आज तक कभी एक मिनट भी लेट नहीं हुई हैं. वहां के लोगों के लिए समय के पाबंद होना उनके खून में शामिल है. जब जापानी इंजीनियर इस प्रोजेक्ट के लिए भारत आए, तो उनका सामना भारत के 'जुगाड़' और 'चलता है' वाले रवैये से हुआ.
शुरुआत में दोनों देशों के इंजीनियरों के बीच वर्किंग स्टाइल को लेकर काफी अंतर देखने को मिला. जापानी इंजीनियर हर काम को एक तय प्रोटोकॉल और कड़े अनुशासन के साथ करने के आदी थे. उनके लिए सेफ्टी रूल्स और शिफ्ट का समय पत्थर की लकीर था. दूसरी तरफ, भारतीय इंजीनियर मुश्किल हालातों में ऑन-द-स्पॉट समाधान यानी जुगाड़ निकालने में माहिर थे. धीरे-धीरे दोनों ने एक-दूसरे की खूबियों को अपनाया.
रेल मंत्रालय के ‘भारत-जापान द्विपक्षीय सहयोग और रेलवे सहयोग दस्तावेज’ के मुताबिक जापानी इंजीनियरों ने भारतीय टीम की लचीली सोच की तारीफ की, तो भारतीयों ने जापानियों से समय का कड़ाई से पालन करना और बारीकियों पर ध्यान देना सीखा. लंच टाइम से लेकर काम की शिफ्ट्स तक, दोनों संस्कृतियों का ये मिलन इस प्रोजेक्ट की सफलता की असली बुनियाद बना.

मैंग्रोव, कोर्ट केस और फ्लेमिंगो को बचाने की जंग
बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के सामने सिर्फ तकनीकी चुनौतियां नहीं थीं, बल्कि एक बड़ी कानूनी और पर्यावरणीय लड़ाई भी थी. प्रोजेक्ट के रूट में हजारों मैंग्रोव (समुद्री पेड़) आ रहे थे, जो मुंबई के तटीय पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी हैं. पर्यावरणविदों और गोदरेज कंपनी ने इन पेड़ों को बचाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) के मुताबिक इस कानूनी विवाद की वजह से प्रोजेक्ट के रूट और डिजाइन में कई बदलाव करने पड़े. वन्यजीवों, खासकर ठाणे क्रीक में आने वाले प्रवासी फ्लेमिंगो (हंसराज) पक्षियों और स्थानीय तोतों के रास्तों को सुरक्षित रखने के लिए कड़े कदम उठाए गए. यही वजह है कि सरकार ने समंदर के नीचे टनल बनाने का फैसला किया, ताकि ऊपर मौजूद मैंग्रोव और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को कोई नुकसान न पहुंचे. एनएचएसआरसीएल ने कोर्ट को भरोसा दिया कि जितने पेड़ों को नुकसान पहुंचेगा, उससे कई गुना ज्यादा नए पौधे लगाए जाएंगे और पर्यावरण का पूरा ख्याल रखा जाएगा.
रफ्तार का अर्थशास्त्र: क्या बदल जाएगा ट्रैवल कल्चर?
मुंबई और अहमदाबाद के बीच हर दिन हजारों लोग सफर करते हैं. दोनों शहरों के बीच दर्जनों फ्लाइट्स चलती हैं और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी बेहतरीन ट्रेनें भी मौजूद हैं. लेकिन जब बुलेट ट्रेन शुरू होगी, तो ये पूरा गणित बदलने वाला है. बुलेट ट्रेन दोनों शहरों के बीच की दूरी को घटाकर सिर्फ 2 घंटे कर देगी.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (IIM) अहमदाबाद की ‘बुलेट ट्रेन सोशियो-इकोनॉमिक इम्पैक्ट असेसमेंट स्टडी’ के मुताबिक, बुलेट ट्रेन के आने से बिजनेस क्लास की उड़ानों को कड़ी टक्कर मिलेगी. फ्लाइट में बोर्डिंग और सिक्योरिटी चेक-इन में लगने वाले समय को जोड़कर देखें, तो बुलेट ट्रेन का सफर ज्यादा किफायती और समय बचाने वाला साबित होगा. इससे न सिर्फ पारंपरिक ट्रेनों के वीआईपी पैसेंजर्स शिफ्ट होंगे, बल्कि अंतर-राज्यीय व्यापार को भी एक नई रफ्तार मिलेगी. टैक्सी ड्राइवरों और छोटे कारोबारियों के लिए भी कनेक्टिविटी के नए रास्ते खुलेंगे, जो भारत के ट्रैवल कल्चर को हमेशा के लिए बदल कर रख देगा.
बुलेट ट्रेन की इतनी सारी कहानियों को जान चुके हैं, अब चलते-चलते आपको बता दें कि बुलेट ट्रेन के निर्माण का काम तेज बरसात में भी ना रुके, इसके लिए खास तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. क्या है वो तकनीक जानने के लिए आप लल्लनटॉप के इस आर्टिकल लिंक पर क्लिक कर सकते हैं, जिसका शीर्षक है- “भारी बारिश में भी नहीं रुकेगा बुलेट ट्रेन का काम, हाईटेक तकनीक से जमीन के अंदर तैयार होगा ट्रैक.”
वीडियो: रेल मंत्रालय ने बताया कहां तक पहुंचा है 'बुलेट ट्रेन' का काम















