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एथेनॉल पर ब्राज़ील ने 50 साल लगाए, भारत को इतनी जल्दी किस बात की है?

ब्राजील और भारत में एथेनॉल पॉलिसी का फर्क कुछ-कुछ कछुए और खरगोश वाली कहानी जैसा है. ब्राज़ील ने कछुए की चाल चुनी लेकिन एक-एक बिंदु को दुरुस्त रखा. इकोसिस्टम बनाया, जनमानस को तैयार किया. और सबसे महत्वपूर्ण, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को समय दिया, ताकि वो ब्लेंडेड फ्यूल के हिसाब से गाड़ियां बना सके.

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सरकार ने क्लियर कर दिया है कि एथेनॉल कोई प्रयोग नहीं बल्कि पॉलिसी है (PHOTO-AI Generated)

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  • भारत सरकार ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) को पॉलिसी बना दिया है और इसे देश में लागू करना शुरू किया है, जिससे एथेनॉल को पेट्रोल में मिक्स कर चलाना अनिवार्य हो गया है।
  • ब्राजील ने एथेनॉल ब्लेंडिंग को पांच दशकों में धीरे-धीरे लागू किया, जबकि भारत ने तीन वर्षों में E20 ब्लेंडिंग का लक्ष्य पूरा किया, जिससे पुराने कार मालिकों और इंफ्रास्ट्रक्चर में कमी की वजह से समस्याएं उत्पन्न हुईं।
  • सरकार ने E25 फ्यूल की टेस्टिंग ARAI को आदेश दी है और फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल्स के लिए E85 फ्यूल की उपलब्धता बढ़ाने की योजना बना रही है, साथ ही पेट्रोल पंपों पर शुद्ध पेट्रोल विकल्प सीमित रखा गया है।

एथेनॉल पर तमाम वाद-विवाद होने के साथ अब सरकार ने साफ कर दिया है कि भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रयोग नहीं है. पॉलिसी है. लेकिन इस पॉलिसी के असर क्या हैं? इसे लागू किस तरह से किया जा रहा है? तीन साल पहले भारत ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग का काम शुरू किया. देश में चालीस करोड़ से ज्यादा गाड़ियां हैं, जिनमें से ज्यादातर E20 compliant नहीं हैं. ब्लेंडिंग के पक्ष में सरकार की तीन दलीलें हैं.

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  • एनर्जी के मामले में गल्फ देशों से निर्भरता कम होगी. हमारे डॉलर बचेंगे. 
  • एयर पॉल्यूशन कम होगा.
  • किसानों की आमदनी बढ़ेगी. वो अन्नदाता से ऊर्जादाता बनेंगे.
     
दिक्कत कहां आ रही है?

सरकार का तर्क सुनने में तो सही लगता है. लेकिन जिस तरह से ये पॉलिसी इम्प्लीमेंट की जा रही है, उसमें इतनी गफ़लत क्यों है? दुनिया में कई जगह ये काम हुआ है. पर इतना कन्फ्यूज़न कहीं नहीं रहा. इतनी जल्दबाज़ी भी कहीं नहीं रही. क़ौन सी आफ़त आ गई कि अचानक ये एक्सलरेटर बहुत ज़ोर से दबाया जा रहा है? पुरानी गाड़ियों के मालिकों से नाइंसाफी की शिकायतें. माइलेज और इंजन की लाइफ कम होने के आरोप. पर ये ज़िम्मेदारी किसकी है कि वो इन चिंताओं को अड्रेस करे?

यहां तो हालत ये है कि आदमी E10, E20 और E85 में ही इतना कन्फ्यूज़्ड है कि पूछ रहा है, ‘भइया फुल स्टॉप कहां लगेगा? पहले ही बता दो, अपन तैयार रहेंगे.’ सरकार ने कैसे इस मुद्दे पर गोल पोस्ट चेंज किया है और कैसे मामला अभी और बिगड़ सकता है. एक-एक करके समझते हैं. पहले ये समझते हैं कि एथेनॉल में E10 या E20 होता क्या है?

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– E10 का मतलब 10% एथेनॉल, 90% पेट्रोल
– E20 का मतलब 20% एथेनॉल, 80% पेट्रोल
– ऐसे ही E30, 35, 40…के केस में ब्लेंडिंग बढ़ती जाएगी. E के आगे जितना नंबर, उतना परसेंट एथेनॉल. 

किस गाड़ी में कौन सा फ्यूल?

एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के दो हिस्से हैं. एक, मोनो-फ्यूल व्हीकल और दूसरा फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल यानी FFV. मोनो-फ्यूल वेहिकल, यानी ऐसी गाड़ी जो एक ही तरह के फ्यूल पर चलने के लिए बनाई जाती हैं. जैसे कि अभी जो ज़्यादातर गाड़ियां हैं वो मोनेफ्यूल हैं. जैसे E20 की गाड़ी है तो उसमें E20 का ही पेट्रोल पड़ेगा. ये गाड़ियां बनाई ही इस तरह गई हैं कि वो पेट्रोल में मैक्सिमम 20 परसेंट ब्लेंडिंग झेल सकें. ज़्यादा ब्लेडिंग वाला पेट्रोल डाल दिया तो इंजन की हेल्थ बिगड़ सकती है. अभी भारत में E20 मोनोफ्यूल है. सब गाड़ियों में वही जाता है.

दूसरा है फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल यानी FFV. वो स्पेशल इंजन वाली गाड़ियां, जो एक से ज़्यादा तरह के फ्यूल पर चल सकती हैं. अलग इंजन ट्यूनिंग, ज़ंग न लगने वाले पुर्ज़े, बड़े फ्यूल इंजेक्टर और अलग सेंसर. जैसे कि आपको याद होगा जून में मारुति सुज़ुकी ने देश की पहली FFV गाड़ी निकाली. एक नई वैगनआर जो E20 से लेकर E85 तक के फ़्यूल पर चल सकती है. यानी इसके लिए गाड़ी ही अलग टाइप की चाहिए.

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गाड़ियों पर लिखा होता है कि वो कौन से फ्यूल को सपोर्ट करती हैं (PHOTO-Team BHP)

अब एक बार को E85, E65, E100, इसको किनारे रख देते हैं. यानी कि फ्लेक्स फ़्यूल व्हीकल को किनारे रखते हैं क्योंकि वो अभी अपने शुरुआती दिनों में है. यंग जेनरेशन की भाषा में कहें तो वो तो अभी बेबी स्टेप्स ले रहा है. पहले ‘Let’s eat the frog first’ करते हैं. यानी कठिन चीज़ को पहले समझ लेते हैं. औऱ वो है मोनोफ्यूल, जिससे हम प्रभावित हो रहे हैं. 

मोनोफ्यूल क्या है?

मोनोफ्यूल का स्टैंडर्ड अभी E20 है. यही पेट्रोल की नई डेफिनिशन है. इसका एक नुक़सान 2023 से पहले की गाड़ियां ऑलरेडी झेल रही हैं. लेकिन सवाल है कि सरकार क्या मोनोफ्यूल की डेफ़िनिशन फिर से बदलने की तैयारी कर रही है? क्या E20 बड़ा होकर E25 बनने वाला है? इसकी एक टाइमलाइन समझ लेते हैं.

2018 में सरकार नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स लाई. सरकार ने कहा कि हम ब्लेंडिंग के लिए गन्ना, मक्का और सड़े हुए अनाज से एथेनॉल बनाएंगे. एथेनॉल ब्लेंडिंग का टारगेट सेट हुआ. 2030 तक 20% ब्लेंडिंग यानी E20 हासिल करने का लक्ष्य रखा गया. चार साल बाद, यानी 2022 में E10 ब्लेंडिंग का लक्ष्य पूरा कर लिया गया और अगले ही साल फरवरी 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने E20 लॉन्च कर दिया. यानी अपनी ट्रेन तो बिफोर टाइम चल रही है. 2030 तक जो करना था वो 2025 में हो लिया. 

ब्राज़ील ने 50 साल लगाए, इंडिया जल्दी में

ये टाइमलाइन इसलिए बताई गई, क्योंकि सामने ब्राज़ील का मॉडल है. इसी मॉ़डल की दुहाई सरकार का हर मंत्री, हर दूसरी प्रेस रिलीज़ देती है. तो समझते हैं कि ब्राज़ील ने एथेनॉल ब्लेंडिंग कैसे लागू की और भारत कैसे उससे एकदम उल्टा काम कर रहा है.

1970s तक ब्राज़ील भी हमारी तरह अपना 80% तेल विदेश से मंगाता था. फिर इजरायल और अरब देशों की जंग के बाद तेल महंगा हो गया. ब्राज़ील ने उपाय पर काम शुरु किया. 1975 में, जो अपने यहां आपातकाल का साल है, ब्राज़ील नेशनल एल्कोहल प्रोग्राम ले आया. इसे 'प्रोआल्कोल' कहते हैं. सब्सिडी दी. एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया. प्रोडक्शन से लेकर खपत तक पूरा इकोसिस्टम तैयार किया. यहीं से ब्राज़ील में एथेनॉल ब्लेंडिंग की नींव पड़ी. 

फिर 1979 में इसका स्टेज 2 आया. E100 माने पूरी तरह एथेनॉल पर चलने वाली गाड़ियां लॉन्च की गईं. ऐसी गाड़ियों पर टैक्स रिबेट, सस्ते लोन दिए गए. लोगों ने अपनी मर्ज़ी से ये गाड़ियां ख़रीदीं. नतीजा ये हुआ कि 1980 के दशक में ब्राज़ील में बिकने वाली हर 10 में से 9 गाड़ियां E100 पर चलने वाली थीं.

इसके बाद आया स्टेज 3. साल 1993 में एक कानून के ज़रिए पेट्रोल में 22% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य कर दिया गया. इससे एथेनॉल ब्लेंडिंग परमानेंट पॉलिसी बन गई. फिर स्टेप 4, यानी साल 2003 आया. इस साल को ब्राज़ील की फ्लेक्स-फ्यूल क्रांति का साल कहा जाता है. इस साल ऑटो कंपनियों ने फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां लॉन्च की, जो E20 से लेकर E100 तक किसी भी फ्यूल पर चल सकती थीं. यानी लोग तय कर सकते थे कि आज मन करा तो E30 डलवा लिया. किसी दिन पैसे कम हैं तो E70 डलवा लिया. लोगों को फ्यूल चुनने की आजादी थी. 2007 में E25 नेशनल स्टैंडर्ड बना दिया गया. मतलब अनिवार्य ब्लेंडिंग बढ़ाकर 25% कर दी गई. 

साल 2024 आते-आते ब्राजील एथेनॉल ब्लेंडिंग मामले में एक अलग लेवल पर पहुंच गया. देश में "फ्यूल्स ऑफ द फ्यूचर लॉ" नाम से एक कानून लागू किया गया. इसने E30 तक ब्लेंडिंग का रास्ता खोला. इसके साथ ही ब्राजील दुनिया के सबसे ज्यादा एथेनॉल ब्लेंडिंग वाले देशों में शामिल हो गया. पेट्रोल से E30 का सफर पूरा करने में ब्राज़ील ने 50 साल का वक़्त लिया. उसने पहले इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर काम किया. कम्पैटिबल गाड़ियां उपलब्ध कराईं. इसके बाद वहां ब्लेंडेड पेट्रोल आया.

इंडिया क्या कर रहा है?

ब्राजील और भारत में एथेनॉल पॉलिसी का फर्क कुछ-कुछ कछुए और खरगोश वाली कहानी जैसा है. ब्राज़ील ने कछुए की चाल चुनी लेकिन एक-एक बिंदु को दुरुस्त रखा. इकोसिस्टम बनाया. जनमानस को तैयार किया. और सबसे महत्वपूर्ण, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को समय दिया, ताकि वो ब्लेंडेड फ्यूल के हिसाब से गाड़ियां बना सके. पेट्रोल पंप पर लोगों को ऑप्शन दिया कि वो गाड़ी के हिसाब से फ्यूल चुन सकें. ताकि कोई ये न कहे कि हमारी गाड़ी इस वाले पेट्रोल के लिए बनी ही नहीं है.

E25 आ रहा है?

दूसरी तरफ़ भारत है जहां E20 आया तो 2023 से पहले वाले कार मालिकों के होश फाख़्ता हो गए. और अब पिछले तीन-चार साल में कार ख़रीदने वाले भी शंका में हैं. एक सर्वे के मुताबिक़, 43% लोग तय कर चुके हैं कि वो अगले एक साल तक नई गाड़ी नहीं खरीदेंगे. ये शंका बेवजह नहीं है. इसका इशारा मिलता है एक सरकारी आदेश से. कुछ दिन पहले ही सरकार ने 22% से 30% एथेनॉल वाले पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी ज़ीरो कर दी है. अब इसका मतलब क्या है? क्या सरकार मोनोफ्यूल को, यानी पेट्रोल की नई परिभाषा को E20 से आगे ले जाने की जल्दबाज़ी में है? पर देश में तो E20 के बियॉन्ड गाड़ियां है नहीं.

सरकार कभी भी ब्लेंडिंग बढ़ाती है तो उसे पहले टेस्ट किया जाता है. जो एजेंसी ये काम करती है, उसका नाम है Automotive Research Association of India, शॉर्ट में कहें तो ARAI. मई 2026 में सरकार ने ARAI को E25 फ्यूल की टेस्टिंग का आदेश दे दिया. लेकिन ये टेस्टिंग कौन सी गाड़ियों पर हो रही है? E10 और E20 पर? क्यों? क्योंकि E25 गाड़ियां है ही नहीं. 

देश में अब E20 ही न्यू नॉर्मल है, पेट्रोल पंप पर कभी E10 या शुद्ध पेट्रोल मांगकर देखिएगा. मिनिस्ट्री ऑफ़ रोड ट्रांसपोर्ट के हिसाब से 2025 तक देश में लगभग 40 करोड़ रजिस्टर्ड मोटर व्हीकल्स हैं. मतलब 2023 के पहले की करोड़ों गाड़ियां, इस समय जबरन E20 फ्यूल पर चल रही हैं, जिसके लिए वो कम्पैटिबल नहीं हैं. अब आते हैं दूसरी शिकायत यानी माइलेज पर.

माइलेज लॉस हो रहा है?

दूसरी शिकायत ये है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से माइलेज लॉस हो रहा है. सरकार कहती है कि इन दावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. लेकिन सरकारी थिंक टैंक, नीति आयोग क्या कहता है? नीति आयोग ने जून 2021 में “Roadmap for Ethanol Blending in India 2020–25” नाम से एक डॉक्यूमेंट पब्लिश किया. इसके हिसाब से E20 फ्यूल की वजह से गाड़ियों के माइलेज में 6% की एवरेज गिरावट देखी गई. ये कम भी हो सकती है, ज्यादा भी. अब इसे अपनी जेब से जोड़कर समझते हैं. 

मान लीजिए, आपकी गाड़ी नॉर्मल पेट्रोल यानी बिना एथेनॉल वाले तेल से एक लीटर में 20 किलोमीटर चलती है. तो माइलेज हुआ 20 का. अब अगर आप 1000 किलोमीटर चलते हैं तो 50 लीटर तेल लगेगा. आपके शहर में अगर एक लीटर पेट्रोल की कीमत 100 रुपये है. तो महीने का खर्च हुआ 5000. साल भर का जोड़ें तो ये पहुंच जाता है 60 हज़ार. 

अब एथेनॉल के केस में ये खर्च बढ़ेगा. वजह है माइलेज में गिरावट. नीति आयोग का कहना है 6% एवरेज गिरावट होगी. लेकिन समझने के लिए 5% ही लेते हैं. मतलब अगर आप E20 फ्यूल डलवाते हैं, तो आपकी गाड़ी की माइलेज गिर कर हो जाएगी 19 किलोमीटर पर लीटर. और 1000 किलोमीटर चलने में लगेगा लगभग 52.6 लीटर तेल. गणित कहता है कि ऐसे में तेल का खर्च बढ़ेगा. यानी उतनी ही दूरी तय करने के लिए आपको लगभग 250 रुपये ज्यादा देने होंगे. यही खर्च अगर आप 6% या ज़्यादा की एवरेज पर लेंगे तो वो बढ़ेगा. अगर आपकी गाड़ी 10 साल चलती है. तो खर्च और ज्यादा हो सकता है. E20 के मामले में इतना नुकसान होता है. तो E35 और E85 के केस में कितना होगा? इसका जवाब देती है इंडिया टुडे पर पब्लिश हुई एक रिपोर्ट. 

क्यों गिर रही है माइलेज?

माइलेज ड्रॉप के दावों के पीछे साइंस है. जब कोई भी कोई फ्यूल जलता है, तो उससे कुछ एनर्जी निकलती है. इसे ही ‘कैलोरिफिक वैल्यू’ कहा जाता है. अब जितनी ज़्यादा कैलोरिफिक वैल्यू होगी, उतनी ज़्यादा एनर्जी उस फ्यूल से मिलेगी. एथेनॉल से बने फ्यूल की कैलोरिफिक वैल्यू पेट्रोल से कम होती है. माइलेज में गिरावट भी इसी वजह से देखने को मिलती है. नीति आयोग का डॉक्यूमेंट भी इसी बात पर मोहर लगाता है.

दूसरी समस्या है जंग. अरे जंग नहीं ज़ंग. जंग तो ख़ुद ही एक मसला है, जंग क्या मसलों का हल देगी. पर हम यहां ज़ंग यानी कोरोज़न की बात कर रहे हैं. नीति आयोग की रिपोर्ट खुद मानती है कि पुरानी गाड़ियां जो एथेनॉल के लिए नहीं बनी, उनमें एथेनॉल जाएगा तो उसके पुर्ज़ों में जंग लग सकता है. गाड़ी ख़राब भी हो सकती है. इसके लिए गाड़ी के कुछ हिस्सों को बदलवाना ही सॉल्यूशन है. अब यहां फिर वही सवाल कि सरकार पेट्रोल पंपों पर कुछ समय के लिए शुद्ध पेट्रोल, non blended petrol का ऑप्शन क्यों नहीं देना चाहती? 

कोई ज़्यादा पैसे देकर शुद्ध पेट्रोल लेना चाहता है तो दे दो? क्या वजह आर्थिक है? ताकि विदेशों से पेट्रोल कम मंगाना पड़े. हमारे देश का डॉलर बचे? या फिर वजह पॉल्यूशन है? कि कोई ये कहे कि मैं ज़्यादा पैसा देकर ज़्यादा प्रदूषण फैलाना चाहता हूं तो मुझे फैलाने दें. पर इसका एक और जवाब मिलता है नितिन गडकरी के एक बयान से. 25 दिसंबर 2023. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक कार्यक्रम में पूर्व RSS सरसंघचालक के. एस. सुदर्शन के साथ हुई बातचीत का जिक्र किया. गडकरी ने बताया कि के एस सुदर्शन का मानना था,

जब तक पेट्रोल, डीजल और दूसरे ईंधनों का आयात बंद नहीं होगा, तब तक दुनिया से आतंकवाद भी खत्म नहीं होगा.

यानी संघ परिवार और भाजपा के लिए ये एक वैचारिक प्रश्न भी है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जाकर जुड़ता है कि हमारा पैसा खाड़ी देशों को क्यों जा रहा है और क्या उसे कम किया जा सकता है? 

E85 के क्या हाल हैं?

जून 2026 को PIB ने एक प्रेस रिलीज़ निकाली जिसमें कहा गया कि सरकार देश में फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों का इकोसिस्टम बनाने के लिए काम कर रही है. E85 यानी यानी 85% इथेनॉल और सिर्फ 15% पेट्रोल वाला फ्यूल भी लाया जा रहा है. इस मामले पर पेट्रोलियम मिनिस्टर हरदीप पुरी का बयान भी आया. वो कहते हैं कि शुरुआत में दिल्ली-NCR और मुंबई-पुणे-नागपुर कॉरिडोर में 50 से 100 ऐसे पेट्रोल पंप शुरू किए जाएंगे, जहां E85 मिलेगा. दिसंबर 2026 तक ऐसे पेट्रोल पंप का नंबर बढ़ाकर 500 आउटलेट्स कर दिया जाएगा. 

लेकिन E85 के साथ भी माइलेज की चिंता भी रहेगी. 23 जून 2026 को इंडिया टुडे में सौम्य शुभम झा की एक रिपोर्ट पब्लिश हुई. इसमें Suzuki Gixxer SF Flex Fuel पर माइलेज टेस्ट किया गया. नतीजों में 43% माइलेज गिर गया. पर फ्लेक्स फ़्यूल सस्ता भी तो है. भारत में अभी E85, E20 के मुक़ाबले 20 परसेंट सस्ता है. पर ब्राज़ील में 30 परसेंट का फर्क है. यानी प्राइस में अभी गुंजाइश है. आदमी अपना माइलेज क़ुर्बान कर रहा है तो उसे सस्ता फ़्यूल मिलना चाहिए.

माइलेज पर अपने यहां कुछ भले लोग सुप्रीम कोर्ट चले गए थे. 1 सितंबर 2025 को एक PIL डाली गई. कहा गया कि हम एथेनॉल ब्लेंडिंग के ख़िलाफ़ नहीं हैं. हम बस चाहते हैं कि लोगों को ऑप्शन मिलना चाहिए. सरकारी वकील ने कहा कि इस याचिका के पीछे एक बड़ी लॉबी है, जो देश की क्लीन फ्यूल पॉलिसी को रोकना चाहती है. सुप्रीम कोर्ट ने दखल से इनकार कर दिया. याचिका खारिज.

यह भी पढ़ें: 'E20 पेट्रोल कोई प्रयोग नहीं, ये लागू हो चुकी पॉलिसी', केंद्र सरकार ने अपना इरादा स्पष्ट कर दिया

सरकार में ही अलग-अलग स्वर क्यों?

एथेनॉल प्रयोग नहीं पॉलिसी है तो मंत्रालयों के बीच भी एक समवेत स्वर दिखना चाहिए. हम मंत्रियों के नाम नहीं लेंगे, आप गूगल कर लेना, लेकिन पब्लिक में उपलब्ध अलग-अलग बयानों में इस पॉलिसी को लागू करने के तरीके और उसकी गति पर एकराय नहीं दिखती है. इसकी सबसे बड़ी मिसाल GST है. ब्लेंडिंग के लिए सप्लाई किए जाने वाले E20 एथेनॉल पर पर 5% GST लगता है. लेकिन E85 पर यही टैक्स बढ़कर 18% हो जाता है.

ये बात समझ में आती है, ये रैशनल, लॉजिकल, वैज्ञानिक बात है कि क्लीन फ़्यूल समय की मांग है. ये बात भी सही है कि एनर्जी सेक्टर में हमें दूसरे देशों पर निर्भरता कम करनी चाहिए. डॉलर बचाना ज़रूरी है. लेकिन जिस तरह से इसे किया जा रहा है, ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए बिना, कारमेकर्स कंपनियों को ज़रूरी समय दिए बिना, ज़रूरी जनमानस बनाए बिना और सबसे अहम, जनता की चिंताओं को अड्रेस किए बिना; वो ख़ुशनुमा लोकतंत्र की निशानी नहीं है.

इसका कोई कारण तो है ना कि ब्राज़ील फ़ुटबॉल को रूल करता रहा और हम एक बार भी क्वॉलिफ़ाई नहीं कर पाए. तो इसका भी कोई कारण है कि ब्राज़ील की एथेनॉल पॉलिसी सफल मानी गई और हमारी कनफ्यूज्ड और चिंताओं से लदी हुई. दोनों का जवाब है ज़रूरी इकोसिस्टम.

वीडियो: खर्चा पानी: हरदीप सिंह पुरी ने एथेनॉल पर क्या बता दिया?

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