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40 साल बाद न्यूजीलैंड में कोई भारतीय पीएम, मोदी के इस दौरे से क्यों टेंशन में है ड्रैगन?

India New Zealand relations: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन देशों के दौरे ने पैसिफिक ओशिन की कूटनीति बदल दी है. न्यूजीलैंड में 40 साल बाद किसी भारतीय पीएम की एंट्री से चीन क्यों परेशान है? जानिए एक्ट ईस्ट पॉलिसी और रणनीतिक घेराबंदी का पूरा गणित.

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पीएम मोदी का तीन देशों का दौरा (फाइल फोटो- ANI)

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  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 40 साल बाद न्यूजीलैंड का दौरा किया, जो भारत और न्यूजीलैंड के बीच कूटनीतिक संबंधों को पुनः स्थापित करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • भारत और न्यूजीलैंड के बीच दूरी का कारण मुख्य रूप से कोल्ड वॉर के दौरान उनकी भिन्न रणनीतिक प्राथमिकताएं और न्यूजीलैंड की परमाणु नीति रही, जिसने द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित किया।
  • इस दौरे से भारत की प्रशांत और हिंद महासागरों में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी, जिससे चीन की क्षेत्रीय विस्तारवादी नीति पर काबू पाने में सहायता मिलने की संभावना है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बिसात पर कब कौन सा मोहरा कहां फिट हो जाए, ये समझना बड़ा दिलचस्प है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वक्त तीन देशों के बेहद अहम दौरे पर हैं. इस दौरे की सबसे ज्यादा चर्चा न्यूजीलैंड को लेकर हो रही है. वजह? पूरे 40 साल का एक लंबा सूखा. आखिरी बार साल 1986 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी न्यूजीलैंड गए थे. उसके बाद से साल 2026 तक, यानी पूरे चार दशक बीत गए लेकिन किसी भी भारतीय पीएम ने न्यूजीलैंड का रुख नहीं किया.

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ये बात जितनी हैरान करने वाली है, उतनी ही सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर दोनों देशों के रिश्तों में ऐसा क्या ठंडापन आ गया था कि दूरी इतनी बढ़ गई. ‘रक्षा अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान’ (Institute for Defence Studies & Analyses) यानी IDSA के मुताबिक कोल्ड वॉर के दौर में दोनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग थीं. परमाणु नीति को लेकर भी न्यूजीलैंड का अपना एक कड़ा रुख था. जिससे भारत थोड़ा दूर ही रहा. लेकिन अब वक्त बदल चुका है. पीएम मोदी के इस दौरे ने उस पुराने गतिरोध को पूरी तरह से तोड़ दिया है.

चीन परेशान क्यों हैं?

अब बात करते हैं उस असली वजह की, जिसके चलते बीजिंग में बैठे चीनी हुक्मरानों की नींद उड़ी हुई है. अगर आप दुनिया के नक्शे को ध्यान से देखें, तो ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और न्यूजीलैंड की भौगोलिक स्थिति बेहद रणनीतिक है. ये तीनों देश प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) और हिंद महासागर के उस मुहाने पर बैठे हैं, जहां से दुनिया का एक बड़ा व्यापार गुजरता है. 

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ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉसिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) की रिपोर्ट 'प्रशांत और हिंद महासागर में चीन' (China in the Pacific and Indian oceans) के मुताबिक चीन पिछले कई सालों से इस पूरे इलाके में अपनी दादागीरी दिखा रहा है. वो छोटे-छोटे द्वीपीय देशों को कर्ज के जाल में फंसाकर वहां अपने सैन्य ठिकाने बनाने की फिराक में रहता है.

रक्षा विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार आलोक रंजन, पीएम मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा को चीन पर लगाम कसने की एक कड़ी के तौरपर देखते हैं. लल्लनटॉप से फोन पर बात करते हुए आलोक कहते हैं,

इधर मल्लका जल डमरूमध्य में इंडोनेशिया और उधर प्रशांत महासागर में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड. ऐसा लगता है कि भारत पूरी तैयारी कर चुका है कि संकट के वक्त कैसे ड्रैगन की आग को बर्फ बनाना है. जापान की प्रधानमंत्री ने हाल ही में भारत दौरा किया. जिसके बाद भारतीय प्रधानमंत्री की न्यूजीलैंड यात्रा और महत्वपूर्ण हो जाती है.

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भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' इसी चीनी विस्तारवाद का करारा जवाब है. पीएम मोदी का ये दौरा सीधे तौर पर चीन की इस घेराबंदी को मजबूत करने की एक सोची-समझी कूटनीति का हिस्सा है. भारत इन तीनों देशों के साथ मिलकर एक ऐसा सुरक्षा चक्र तैयार कर रहा है, जिससे ड्रैगन चाहकर भी इस इलाके में एकतरफा मनमानी नहीं कर पाएगा.

‘टेल एंड फ्रांसिस’ (Taylor & Francis) की रिपोर्ट के मुताबिक इस रणनीतिक घेराबंदी में 'क्वाड' (Quad) और खुफिया जानकारियों का लेन-देन भी एक बड़ा रोल निभा रहा है. ऑस्ट्रेलिया और भारत पहले से ही क्वाड के जरिए एक-दूसरे के बेहद करीब हैं, और अब न्यूजीलैंड के साथ भी मैरीटाइम सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने के मोर्चे पर बातचीत आगे बढ़ रही है.

'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' को मजबूती

चीन की सबसे बड़ी टेंशन यही है कि अगर भारत ने हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक इन देशों के साथ मिलकर अपनी पकड़ मजबूत कर ली, तो उसकी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' वाली रणनीति पूरी तरह फेल हो जाएगी. भारत का इरादा किसी पर हमला करना नहीं है, बल्कि वो इस पूरे समुद्री इलाके में शांति और स्थिरता चाहता है, ताकि कोई भी एक देश दादागीरी न कर सके.

क्रिकेट डिप्लोमेसी

क्रिकेट के मैदान पर भारत और न्यूजीलैंड का मुकाबला हमेशा से ही सांसें रोक देने वाला होता है. केन विलियमसन की कप्तानी वाली टीम हो या फिर रचिन रवींद्र जैसे उभरते सितारे, भारतीय फैंस के दिल में कीवी खिलाड़ियों के लिए एक अलग ही सम्मान रहता है. लेकिन कूटनीति सिर्फ खेल के मैदान तक सीमित नहीं रह सकती. पीएम मोदी के इस दौरे का एक बड़ा मकसद क्रिकेट के इस तगड़े कनेक्शन को ट्रेड (व्यापार) और डिफेंस (रक्षा) के मजबूत रिश्तों में बदलना है.

अभी तक दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते उतने बड़े नहीं रहे हैं जितने होने चाहिए. इस दौरे में दोनों देशों के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) की संभावनाओं और डिफेंस कोऑपरेशन को लेकर गंभीर चर्चाएं हो रही हैं, ताकि खेल की ये दोस्ती आर्थिक और सैन्य मोर्चे पर भी उतनी ही भरोसेमंद नजर आए.

40 साल बाद पीएम का दौरा

कुल मिलाकर देखा जाए तो पीएम मोदी का ये तीन देशों का दौरा सिर्फ एक औपचारिक विदेश यात्रा नहीं है. ये बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की उस मजबूत होती साख का प्रतीक है, जहां भारत अपने पुराने सहयोगियों को याद कर रहा है और नए रणनीतिक समीकरण बना रहा है.

40 साल बाद न्यूजीलैंड की धरती पर किसी भारतीय प्रधानमंत्री का कदम रखना इस बात का साफ संकेत है कि भारत अब ग्लोबल स्टेज पर किसी भी मोर्चे को खाली नहीं छोड़ने वाला है. चीन की टेंशन जायज है, क्योंकि भारत ने अब पैसिफिक से लेकर हिंद महासागर तक अपनी कूटनीति के ऐसे जाल बिछा दिए हैं, जिन्हें काटना ड्रैगन के लिए आसान नहीं होने वाला.

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