2022 में मध्यप्रदेश के खरगोन जिले में रामनवमी शोभायात्रा के दौरान हिंसा भड़क गई थी. 27 जुलाई 2026 को इस मामले में सेशन कोर्ट का फैसला आया. कोर्ट ने 11 आरोपों को बरी कर दिया है. 11 में से 8 चश्मदीद हिंसा में शामिल किसी भी आरोपी को पहचान नहीं सके. इसके अलावा लैबोरेटरी रिपोर्ट में भी कथित तौर पर पेट्रोल बम या किसी विस्फोटक के इस्तेमाल के साक्ष्य साबित नहीं हो सके.
MP रामनवमी हिंसा: जिनके घरों पर चला था बुलडोजर, कोर्ट ने उन 11 आरोपियों को किया बरी
Khargone Ram Navami Violence: खरगोन में रामनवमी के दौरान भड़की हिंसा मामले में कोर्ट ने 11 आरोपियों को बरी कर दिया है. इन आरोपियों को 462 से 827 दिनों तक जेल में भी रहना पड़ा था.

कानूनी मामलों की वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, खरगोन (मंडलेश्वर) के फोर्थ एडिशनल सेशन जज मुकेश नाथ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के जुर्म को संदेह के दायरे से परे साबित नहीं कर सका है. कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में आरोपियों को 462 से 827 दिनों तक लंबी कैद का सामना करना पड़ा. कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए आरोपियों का बरी कर दिया है.
क्या है पूरा मामला?अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि 10 अप्रैल 2022 को पत्थर, तलवार और पेट्रोल बम से लैस भीड़ ने खरगोन के भाटवाड़ी मोहल्ले में शाम 6 बजे से रात के 9 बजे तक हिंसा की. आरोप लगा कि उन्होंने फरियादियों के घरों, गाड़ियों और सामान को आग के हवाले कर दिया और तोड़फोड़ की.
खरगोन हिंसा में इदरीस खान नामक शख्स की मौत हो गई थी. पुलिस ने 11 लोगों- इबादत, सादिक, अब्दुल्ला, साहेब उर्फ शाहिब, शेरयार, फैजल, आजम, शब्बीर, इमरान, मुस्ताक और राजिक को आरोपी बनाया. इन पर दंगा करने, आगजनी, घर में जबरदस्ती घुसने और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत आरोप लगे.
नरोत्तम मिश्रा ने क्या कहा था?हिंसा के अगले दिन प्रशासन ने बुलडोजर के जरिए कई घरों को ढहा दिया. कहा गया कि ये हिंसा आरोपियों के घर हैं. मध्यप्रदेश के तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने चेतावनी देते हुए कहा था कि जिस घर से पत्थर आए हैं, उस घर को ही पत्थरों का ढेर बनाएंगे. इंडिया टुडे से बातचीत के दौरान नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि घरों और दुकानों को अतिक्रमण के कारण ढहाया गया है और ये कानूनी दायरे में हो रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, 13 में से 8 चश्मदीद कोर्ट के सामने आरोपियों को पहचानने में नाकाम रहे. कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि अभियोजन की दलीलें केवल एक चश्मदीद की गवाही पर टिकी थीं, जिसे घटना के 51 दिन बात रिकॉर्ड किया गया. इस बारे में कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया.
इसके अलावा, उस चश्मदीद का FIR या असल शिकायत में नाम नहीं था. कोर्ट ने यह भी देखा कि आरोपियों की पहचान करने के लिए परेड भी नहीं हुई. लैबोरेटरी रिपोर्ट में कोई पेट्रोलियम पदार्थ नहीं निकला, जिससे साबित हो कि पेट्रोल बम का इस्तेमाल किया गया.
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इसी घटना को लेकर एक शख्स ने एक रिट याचिका दायर की थी. उसने आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय से होने के कारण बदले की भावना से राज्य सरकार ने उनकी संपत्ति को ढहा दिया. यह याचिका अभी हाई कोर्ट में लंबित है.
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