पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड में आरोपी सिया गोयल का पॉलीग्राफ टेस्ट होगा. पुणे पुलिस ने इसी हफ्ते अदालत से झूठ पकड़ने वाला लाई डिटेक्टर टेस्ट करने की इजाजत ली है. उसने दूसरे आरोपी चेतन चौधरी का भी लाई डिटेक्टर टेस्ट करने की अनुमति मांगी है.
सिया गोयल का जो लाई डिटेक्टर टेस्ट होगा उस पर वैज्ञानिक यकीन क्यों नहीं करते?
Ketan Agarwal murder case: पुणे के केतन अग्रवाल हत्याकांड में आरोपी सिया गोयल के पॉलीग्राफ टेस्ट यानी लाई डिटेक्टर टेस्ट का फैसला लिया गया है. पुलिस ने इस मामले में सह-आरोपी चेतन चौधरी का भी टेस्ट करने की अनुमति मांगी है. लेकिन ‘पॉलीग्राफ टेस्ट’ को लेकर कई लोगों को मत बंटा हुआ है.


पुलिस को अब तक इस घटना का कोई आई विटनेस नहीं मिला है. ऐसे में सिया और चेतन की कथित साजिश को साबित करने का कोई ठोस सबूत नहीं है. इसी के चलते सिया का लाई डिटेक्टर टेस्ट यानी ‘पॉलीग्राफ टेस्ट’ कराने का फैसला लिया गया है.
हालांकि कई वैज्ञानिक पॉलीग्राफ टेस्ट को आज भी भरोसेमंद तरीका नहीं मानते है. उनके मुताबिक, लोग पॉलीग्राफ में भी झूठ बोल सकते हैं और किसी को पता नहीं लगेगा.
पॉली का मतलब होता है अनेक (एक से ज्यादा). पॉलीग्राफ में कई सिग्नल दर्ज किए जाते हैं. ये एक डिवाइस है, जो शरीर में आने वाले कई बदलावों को रिकॉर्ड करता है. किसी भी पॉलीग्राफ टेस्ट में बेसिकली तीन-चार सिग्नल्स को देखा जाता है. 1. हार्ट रेट/ब्लड प्रेशर 2. रेस्पिरेशन (सांस लेने और छोड़ने वाली प्रक्रिया) 3. पर्सपिरेशन (पसीना आना). इस टेस्ट के पीछे धारणा ये है कि अगर कोई व्यक्ति झूठ बोल रहा है, तो उसमें ये शारीरिक बदलाव देखने को मिलेंगे. ये टेस्ट डायरेक्टली झूठ को नहीं पकड़ता. झूठ बोलने से पैदा होने वाले डर, घबराहट या नर्वसनेस को पकड़ता है.
टेस्ट से पहले प्री-टेस्ट, डेमो भीजिस व्यक्ति का टेस्ट लिया जाता है, उससे तुरंत कमरे में आते ही सवाल नहीं पूछे जाते, बल्कि एक प्री-टेस्ट होता है. इसमें एग्जामिनर उस व्यक्ति को पूरी टेक्निक समझाते हैं. पहले ही उसको टेस्ट के सारे सवाल बता देते हैं. ताकि कोई सरप्राइज एलिमेंट न रहे. क्योंकि अचानक कोई सवाल पूछे जाने पर सामने वाला घबरा सकता है. इससे पॉलीग्राफ की रीडिंग गड़बड़ा सकती है. आमतौर पर एग्जामिनर टेस्ट से पहले पॉलीग्राफ मशीन का एक डेमो भी देते हैं. जिसमें ये दिखाया जाता है कि पॉलीग्राफ मशीन कितने अच्छे से झूठ पकड़ लेती है. इस टेस्ट में सिर्फ ऑब्जेक्टिव क्वेश्चन ही पूछे जाते हैं. जिनका जवाब सिर्फ हां या ना में दिया जा सकता है.
झूठ को झूठ, पानी को पानी करता है टेस्ट?पॉलीग्राफ टेस्ट में असल में डर, घबराहट और नर्वसनेस के लक्षण पकड़े जाते हैं. कई बार सच बोलने वाला व्यक्ति भी घबरा सकता है और झूठा व्यक्ति कूल रहकर सफेद झूठ बोल सकता है. इसलिए इसे झूठ पकड़ने वाली मशीन कहना कितना सही है, इस पर मत बंटे हुए हैं. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि प्रॉपर ट्रेनिंग के साथ इस टेस्ट को मात दी जा सकती है.
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वहीं, टेस्ट में बैठा व्यक्ति पॉलीग्राफ को कन्फ्यूज भी कर सकता है. उदाहरण के लिए, जूते में कील फंसाने वाली ट्रिक. कुछ लोग टेस्ट के दौरान जूते में कील फंसाकर ले जाते हैं. जब उनसे सवाल पूछे जाते हैं, तो वो अपना पैर उस कील पर दबा देते हैं. इससे उनके शरीर में बदलाव होते हैं और पॉलीग्राफ की रीडिंग डगमगा जाती है. जैसे ‘हसीन दिलरुबा’ फिल्म में दिखाया गया है.
नार्को टेस्ट में दी जाती है दवाइयांझूठ पकड़ने वाली प्रणाली में एक नार्को टेस्ट भी है. इस टेस्ट में किसी इंसान को नींद या बेहोशी की स्थिति में लाया जाता है. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक इस टेस्ट के लिए कुछ दवाएं इंजेक्ट की जाती हैं. जैसे, सोडियम पेंटोथल, स्कोपोलामाइन और सोडियम अमायटल. इससे इंसान की सोचने की क्षमता या कल्पना बेअसर हो सकती है और उससे सही जानकारी निकाली जा सकती है. मगर आरोपी को कोई भी मेंटल या फिजिकल दिक्कत है, उसकी बॉडी कांपती है या दिल तेज धड़कता है, तो मशीन गलत डेटा भी बता सकती है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अगर किसी शख्स का लाई डिटेक्टर टेस्ट किया जाता है, तो उसके लिए उसकी परमिशन चाहिए होती है. फिर ये क्रिमिनल केस क्यों ना हो. टेस्ट करवाने से इनकार करने पर आरोपी के खिलाफ कोई नकारात्मक निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता.
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