कश्मीर इन दिनों एक ऐसे संकट से जूझ रहा है, जिसका असर सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है. घाटी में मटन की भारी कमी ने लोगों की थाली से लेकर शादी ब्याह, कारोबार और सरकार तक सबको मुश्किल में डाल दिया है. हालात ऐसे हैं कि जिस मटन के बिना कश्मीरी दावत की कल्पना भी नहीं की जाती, वही अब बाजार से गायब होता जा रहा है. सवाल उठ रहा है कि आखिर कश्मीर में मटन संकट क्यों गहराया, इसके पीछे कौन है और इसका असर आम लोगों की जिंदगी पर कितना बड़ा पड़ने वाला है. आइए, इस पूरे मटन क्राइसिस की परत दर परत पड़ताल करते हैं.
सिर्फ थाली की बात नहीं है साहब! जानिए कश्मीर में मटन की किल्लत के पीछे की असली 'क्राइसिस'
Kashmir Mutton Shortage: कश्मीर में मटन की भारी किल्लत हो गई है. जानिए कैसे ये संकट सिर्फ खाने-पीने का मुद्दा नहीं, बल्कि वाजवान संस्कृति, सप्लाई चेन और सरकार-व्यापारियों के बीच छिड़े प्राइस कंट्रोल विवाद से जुड़ा है.


कश्मीर और मटन का रिश्ता सिर्फ खाने का नहीं
कश्मीर में मटन महज एक नॉन वेज डिश नहीं, बल्कि वहां की पहचान, परंपरा और सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा है. किसी भी कश्मीरी शादी की शान माने जाने वाले 'वाजवान' की जान ही मटन है. इस पारंपरिक दावत में 15 से 30 तक व्यंजन परोसे जाते हैं और इनमें ज्यादातर मटन से तैयार किए जाते हैं. शादी का मौसम आते ही मटन की मांग कई गुना बढ़ जाती है. ईद समेत दूसरे त्योहारों पर भी घाटी में इसकी खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचती है. यही वजह है कि जब बाजार में मटन की कमी होती है, तो असर सिर्फ दुकानों तक नहीं रहता. शादियों की तैयारियां, खानपान का कारोबार और हजारों परिवारों की रोजी रोटी तक इसकी चपेट में आ जाती है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक कश्मीर का मौजूदा मटन संकट केवल सप्लाई की दिक्कत नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक मसला बन चुका है.
बाहरी राज्यों पर निर्भरता और सप्लाई चेन की मुश्किलें
कश्मीर में मटन की कमी की सबसे बड़ी वजह इसकी सप्लाई चेन है. घाटी अपनी जरूरत का पूरा मटन खुद नहीं पैदा करती. बड़ी मात्रा में भेड़ें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और दूसरे राज्यों से लाई जाती हैं. यानी कश्मीर का मटन बाजार काफी हद तक बाहरी सप्लाई पर टिका है. लेकिन जैसे ही जम्मू श्रीनगर नेशनल हाईवे (NH 44) पर भूस्खलन, खराब मौसम या लंबा ट्रैफिक जाम होता है, पूरी सप्लाई व्यवस्था लड़खड़ा जाती है.
कई बार भेड़ों से भरे ट्रक दिनों तक रास्ते में फंसे रहते हैं. इससे ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ता है, जानवरों की मौत का खतरा भी बढ़ जाता है और आखिरकार इसका सीधा असर मटन की उपलब्धता और कीमत दोनों पर पड़ता है. हाल के महीनों में बाहरी मंडियों में भेड़ों के दाम पहले ही बढ़ चुके हैं. ऊपर से बढ़ती ढुलाई लागत ने कश्मीर तक मटन पहुंचाना कारोबारियों के लिए पहले से कहीं ज्यादा महंगा बना दिया है.
मटन की कीमत पर टकराव, सरकार और व्यापारियों में क्यों छिड़ी खींचतान?
कश्मीर का मौजूदा मटन संकट सिर्फ सप्लाई का मामला नहीं है. इसके केंद्र में सरकार और मटन व्यापारियों के बीच कीमत को लेकर चल रहा विवाद भी है. प्रशासन चाहता है कि आम लोगों को तय रेट पर मटन मिले, इसलिए रिटेल कीमत निर्धारित की जाती है. दूसरी तरफ व्यापारियों का कहना है कि सरकारी रेट पर मटन बेचना घाटे का सौदा है. उनका दावा है कि बाहरी राज्यों से महंगी भेड़ें खरीदने, उन्हें घाटी तक पहुंचाने, ट्रांसपोर्ट, टैक्स और दूसरे खर्च जोड़ने के बाद लागत ही सरकार के तय दाम से ऊपर पहुंच जाती है.
ऐसे में कई कसाइयों ने दुकानें बंद कर दी हैं, जबकि कुछ व्यापारी ऊंचे दाम पर मटन बेचने को मजबूर हैं. यही वजह है कि बाजार में मटन की किल्लत लगातार बढ़ रही है और सबसे ज्यादा परेशानी आम उपभोक्ताओं को झेलनी पड़ रही है.

कश्मीर खुद मटन में आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पाया?
सवाल यही है कि जब कश्मीर में सदियों पुरानी पशुपालन की परंपरा है, तो फिर हर साल मटन के लिए बाहरी राज्यों पर निर्भरता क्यों बनी रहती है? घाटी में बकरवाल और गद्दी जैसे चरवाहा समुदाय पीढ़ियों से भेड़ बकरियां पालते आ रहे हैं. इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर Sheep Farming इतनी मजबूत नहीं बन पाई कि बढ़ती मांग पूरी कर सके. इसकी कई वजहें हैं.
श्रीनगर में कैटरिंग का काम करने वाले निसार इन वजहों को विस्तार से बताते हुए ‘लल्लनटॉप’ से कहते हैं,
पहले जहां चरागाहों की भरमार थी, अब उनका दायरा लगातार सिमट रहा है. दूसरी ओर अच्छी नस्ल की भेड़ों, आधुनिक पशुपालन तकनीक, बेहतर पशु चिकित्सा सुविधाओं और बड़े निवेश की भी कमी बनी हुई है. सबसे बड़ी बात, नई पीढ़ी अब इस पारंपरिक पेशे से दूर होती जा रही है. सरकारी योजनाएं और सब्सिडी जरूर हैं, लेकिन उनका असर इतना नहीं दिखा कि स्थानीय उत्पादन में बड़ा उछाल आ सके. नतीजा ये है कि कश्मीर का मटन बाजार आज भी बाहरी राज्यों की सप्लाई पर टिका हुआ है.
आखिर कश्मीर के मटन संकट का हल क्या है?
कश्मीर में मटन की किल्लत सिर्फ मांग और सप्लाई का मामला नहीं है. इसके पीछे सरकारी प्राइस कंट्रोल, कमजोर सप्लाई चेन, महंगा ट्रांसपोर्ट और स्थानीय भेड़ पालन की अनदेखी जैसी कई समस्याएं एक साथ जुड़ी हुई हैं. जब तक सरकार और मटन व्यापारी कीमतों को लेकर कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं निकालते और घाटी में Sheep Farming को बड़े पैमाने पर बढ़ावा नहीं दिया जाता, तब तक ये संकट बार बार लौटता रहेगा. अगर लोकल उत्पादन बढ़ता है, चरवाहा समुदायों को बेहतर सुविधाएं मिलती हैं और सप्लाई सिस्टम मजबूत होता है, तभी कश्मीर बाहरी राज्यों पर अपनी निर्भरता कम कर पाएगा. वरना वाजवान से लेकर आम लोगों की थाली तक, मटन की कमी का असर लंबे समय तक महसूस होता रहेगा.
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