The Lallantop

पाकिस्तान का आतंकवाद मिटा नहीं, अच्छे रिश्ते की मांग होने लगी, बैक डोर चल क्या रहा?

भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधारने की वकालत 117 लोगों ने की है. India-Pakistan के बीच पहले भी ऐसी कई कोशिशें हुईं. भारत के तमाम नेता, प्रधानमंत्री तक पाकिस्तान गए और रिश्ते सुधारने की कवायद की. लेकिन बदले में भारत को हमेशा धोखा मिलता आया है. फिलहाल इस समय ये मांग क्यों उठ रही? क्या दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे भी कुछ पक रहा है? सब जानिए.

Advertisement
post-main-image
भारत में अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी तक ने सुलह की कोशिश की (PHOTO-ITG File)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • भारत और पाकिस्तान के 117 बुद्धिजीवियों ने पीएमों को चिट्ठी लिखकर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध बहाल करने, वीज़ा सेवाओं को पुनः शुरू करने, सीमा पार धार्मिक एवं सांस्कृतिक दौरों को आसान बनाने की मांग की है।
  • दो देशों के बीच दशकों से तनाव, आतंकवादी हमलों और विवादित विरासत के चलते कूटनीतिक संबंध और संवाद बार-बार टूटे हैं, जिससे दोनों पक्षों में विश्वासहीनता बनी हुई है।
  • हाल में ट्रैक-2 संवाद के तीन दौर हो चुके हैं जो तनाव को कम करने पर केंद्रित हैं, लेकिन कश्मीर जैसे मुख्य मुद्दे अब चर्चा में नहीं हैं और दोनों सरकारें सीधे तौर पर बातचीत में शामिल नहीं हैं।

क्या भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की बर्फ फिर पिघल सकती है? क्या संवाद से आतंकवाद रुकेगा, या आतंकवाद खत्म होने के बाद ही संवाद संभव है? रक्त पिपासु पड़ोसी से अमन की आशा रखना समझदारी है, या भूल? या फिर समझ लें कि फिलहाल नेम-प्रेम कोक स्टूडियो के कॉमेंट सेक्शन तक ही सीमित है. आप कह सकते हैं, लल्लनटॉप को आज पाकिस्तान से अमन की सुध क्यों आई. भूल गए पहलगाम, पुलवामा, करगिल? न भूले हैं, न भूलेंगे. लेकिन दोनों मुल्कों के 117 लोग शायद पीछे का सबकुछ भुला देना चाहते हैं. उन्हें अब भी यक़ीन है कि सबकुछ ठीक हो जाएगा. तो कौन हैं ये 117 लोग जिन्हें उनसे वफ़ा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है? 

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
कौन हैं जिन्हें अमन की आशा है?

तो कौन हैं वो 117 लोग? एक लाइन में कहें तो ये 117 लोग बुद्धिजीवी हैं. जिनके मन-मस्तिष्क में चाह उठी है. चाह है भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की. इनमें सांसदों से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री तक, पूर्व राजनायिकों से लेकर वकील, पत्रकार, स्कॉलर सब हैं. अपने यहां से 61 हैं, उनके यहां से 56. जो अपने वाले हैं वो भली-भांति पाकिस्तान के कामकाज से परिचित हैं. ज्यादातर इनमें कश्मीरी नेता हैं या ऐसे लोग, जिनका सरहद पर कामकाज का लंबा अनुभव है. मिलकर दोनों देशों के पीएम को चिट्ठी लिखी गई है. चिट्ठी का लुब्बे-लुबाब जान लेते हैं.

इन्हें युवाओं के भविष्य की चिंता है. कह रहे हैं कि भारत और पाकिस्तान दुनिया की लगभग 20% आबादी को रिप्रजेंट करते हैं. ऐसे में दोनों देशों के बीच लगातार जारी तनाव यहां की बड़ी युवा आबादी के रोजगार, विकास और बेहतर भविष्य में रोड़ा डाल रहा है. दोनों सरकारों से नई दिल्ली और इस्लामाबाद में फिर से उच्चायुक्तों की नियुक्ति करने और पूरी तरह कूटनीतिक संबंध बहाल करने की मांग की गई है. आम नागरिकों के लिए वीजा सेवाएं दोबारा शुरू करने और सीमा पार धार्मिक व सांस्कृतिक दौरों को आसान बनाने की अपील की गई है. कश्मीरी पंडितों के पवित्र धार्मिक स्थल 'शारदा पीठ' को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोलने की स्पेशल रिक्वेस्ट की गई है. दोनों देशों में एक-दूसरे के मीडिया पर लगे बैन को खत्म करने और पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने की परमिशन देने की मांग की गई है.

Advertisement
"पीपल-टू-पीपल कॉन्टैक्ट" शुरू करने की मांग

चिट्ठी पर अपनी मुहर लगाने वालों में RJD सांसद मनोज झा भी हैं. वो कह रहे हैं कि मांग केवल "पीपल-टू-पीपल कॉन्टैक्ट" शुरू करने की है. सरकार चाहे तो संधि और सुरक्षा पर अपने लेवल पर फैसला ले, लेकिन कला, संगीत और आम लोगों के रिश्ते राजनीतिक तनाव की भेंट न चढ़ जाएं. 

एक लॉजिक चिट्ठी पर दस्तख्त करने वाले कश्मीर के नेता मीरवाइज उमर फारूक की तरफ से भी आया. उन्होंने अमेरिका-ईरान का उदाहरण दिया कि अमेरिका और ईरान जब बातचीत के टेबल पर लौट रहे हैं, तो भारत और पाकिस्तान को भी पीस टॉक करना चाहिए. 

Advertisement

कितनी अच्छी बात हैं न? सुनकर फील गुड हो रहा होगा. शांति और सौहार्द हम में से ज्यादातर लोग चाहते हैं. हम अमन पसंद लोगों को सरहद पर तनाव नहीं अच्छा लगता. लेकिन बात वही है, हम वफ़ा की उम्मीद कर किससे रहे हैं. ले-देकर साल ही तो बीता है, पहलगाम और उसके जवाब में ऑपरेशन सिंदूर हुआ. बैसरन घाटी में छुट्टियां मना रहे हमारे 26 पर्यटकों की क्या गलती थी? निहत्थे लोगों को मारना किस अमन की दुनिया में मंजूर है? किसकी कारस्तानी थी ये? द रेजिस्टेंस फ्रंट यानी TRF की. किसका छोटा भाई है ये? लश्कर-ए-तैयबा का. लश्कर-ए-तैयबा सात समंदर पार से नहीं चल रहा. वही, पड़ोसी उसे पनाह दे रहा जिससे हम भलाई की उम्मीद कर रहे हैं. 

कई बार कोशिशें हुईं, लेकिन हर बार धोखा मिला

हम यानी भारत के लोग दूध के जले हैं, इसलिए मठ्ठा भी फूंक-फूंक कर पी रहे हैं. 2014 में आई मोदी सरकार ने क्या कोशिशें नहीं कीं. याद करिए 2015 का क्रिसमस. नवाज़ शरीफ को हैप्पी बड्डे बोलने और उनके पोती की शादी अटेंड करने पीएम मोदी लाहौर पहुंच गए. दोनों नेताओं की गलबहियां करती सुखद तस्वीर सबने देखी. 11 साल बाद कोई प्रधानमंत्री पाकिस्तान गया था. ये उम्मीद लेकर कि पुराने गिले-शिकवे दूर होंगे. लेकिन उसके बाद क्या हुआ? और डिप्लोमैसी के टर्म्स पर राजनायिकों के बीच मुलाकातें तो होती ही रही हैं. 

कई दफा बस सूत्रों के जरिए खबर आई, कई बार मुलाकात की फोटो आई, खुली खबर आई. पीएम मोदी की लाहौर यात्रा से चंद हफ्ते पहले दोनों देशों के NSA और विदेश सचिव बैंकॉक में मिले थे. दोनों देशों के NSA 2017 में क्रिसमस के अगले रोज़ बैंकॉक में भी मिले थे. लेकिन इन मेल-मुलाकातों के बाद हुआ क्या? 

modi in pakistan
लाहौर में पीएम मोदी (PHOTO- narendramodi.in)
हर सरकार ने की कोशिश

पीएम मोदी के पाकिस्तान से लौटने के बाद पठानकोट में हमला हुआ. हमारे 7 जवान शहीद हो गए. फिर उरी में हमला हुआ और हमारे 19 जवान शहीद हो गए. पुलवामा में हमला हुआ और हमारे CRPF के 39 जवान शहीद हो गए. इन सबकी जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली. कहां से चल रहा है इसका नेटवर्क? जवाब आपको पता है. 

पुलवामा हमले की दूसरी बरसी: आत्मघाती हमले में शहीद हुए थे 40 जवान, 12 दिनों  में भारत ने लिया बदला - pulwama attack 2 years of terror attack India lost  40 CRPF Personnel - AajTak
पुलवामा हमले में 39 जवान शहीद हो गए थे (PHOTO-ITG)

पाकिस्तान से बातचीत की कोशिशें वाजपेयी सरकार में क्या कम हुईं? क्या मनमोहन सिंह नहीं चाहते थे कि दोनों मुल्क सुख चैन शांति से रहे? क्या दोनों पीएम ने कोशिशें नहीं की? अटल बिहारी वाजपेयी संसद में कहते थे हम मित्र बदल सकते हैं पड़ोसी नहीं. वाजपेयी ने हमेशा बड़ा दिल दिखाया और पाकिस्तान ने हर बार उनकी पीठ में छुरा घोंपा. 1999 की फरवरी में दिल्ली से लाहौर तक बस यात्रा शुरू की जानी थी, नाम रखा गया था सदा-ए-सरहद.

When Vajpayee took a bus ride and it seemed peace with Pakistan was possible
बस से लाहौर के लिए रवाना होते तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी (PHOTO-PTI)

वाजपेयी अमृतसर से खुद इस बस में सवार हुए. साथ में उनके थे देव आनंद, सतीश गुजराल, जावेद अख्तर, कुलदीप नैयर, कपिल देव, शत्रुघ्न सिन्हा और मल्लिका साराभाई जैसी हस्तियां. बस लाहौर पहुंची तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ खुद वाजपेयी को रिसीव करने पहुंचे. 21 तारीख को दोनों नेताओं ने लाहौर डिक्लेयरेशन पर साइन किए. जश्न का इंतजाम किया गया था, जहां वाजपेयी ने नवाज के सामने अपनी कविता सुनाई- हम जंग न होने देंगे.

लेकिन पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल मुर्शरफ इन कार्यक्रमों में नजर नहीं आ रहे थे, वो जंग की तैयारी कर रहे थे. इस यात्रा के करीब ढाई महीने बाद मई में करगिल की जंग हुई. लड़ाई की शुरुआत तब हुई थी जब पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर घुसपैठ करके अपने ठिकाने बना लिए थे. भारत ने ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन सफेद सागर चलाकर घुसपैठियों और पाकिस्तानी सैनिकों को मारा और खदेड़ दिया.  

Kargil Vijay Diwas 20th Anniversary: The battle that won the war | India  News
कारगिल की पहाड़ियों पर जंग जीतने के बाद तिरंगा फहराते भारतीय जवान

करगिल की घुसपैठ के बाद गुस्से से भरे पीएम वाजपेयी ने नवाज़ शरीफ को फोन कर दोहरे रवैये के लिए सुनाया भी था और पास बैठे सज्जन से बात कराई, वो सज्जन एक्टर दिलीप कुमार थे, दिलीप कुमार ने बड़े ही तल्ख लहजे में उनसे कहा,

‘मियां साहब, आप तो हमेशा से हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच अमन के पैरोकार रहे हैं, आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी.’

लेकिन पीठ में खंजर के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी पड़ोसी से रिश्ते सुधारने की कोशिश करते रहे. करगिल की प्लानिंग करने वाले परवेज़ मुशर्रफ, पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन चुके थे, वो 2001 में भारत आए, आगरा में 14 से 16 जुलाई तक शिखर सम्मेलन रखा गया, तमाम कोशिशों के बावजूद कोई नतीजा नहीं निकला, बात नहीं बनी. इस कोशिश के 5 महीने बाद 13 दिसंबर को भारत की संसद पर हमला किया गया. हमले के पीछे पाकिस्तान से ऑपरेट करने वाले जैश-ए-मोहम्मद का हाथ था.

Pervez Musharraf Agra
भारत यात्रा के दौरान आगरा के ताजमहल परिसर मे अपनी पत्नी के साथ जनरल परवेज मुशर्रफ (PHOTO- India Today File)

मनमोहन सिंह ने भी कम कोशिशें नहीं कीं. पूरी कोशिश थी अमन-शांति बहाल करने की. मनमोहन सिंह ने आतंकवाद, कश्मीर, सियाचिन, व्यापार और पानी जैसे मुद्दों पर बातचीत शुरू की. 2005 से 2008 के बीच विदेश मंत्री स्तर की कई बैठकें हुईं. 2005 में श्रीनगर-मुज़फ्फराबाद बस सेवा को हरी झंडी दिखाना हो या 2006 में अमृतसर-लाहौर बस सेवा शुरू करना. क्या ये दोनों मुल्कों के बीच मेल-जोल बढ़ाने की कवायद नहीं थी? 

लेकिन मिला क्या? मुंबई में हमारे देश के नामी-गिरामी होटल निशाने पर आ गए. आतंकी हमला हुआ 161 लोग मारे गए, 300 से ज्यादा घायल हो गए. जो कोहराम ताज होटल में चला, कई दिनों तक दुनिया ने उसे लाइव देखा. दुनिया ने देखा कि कैसे अजमल कसाब बंदूक लिए निहत्थे मासूमों को निशाना बना रहा. कहां से आया था कसाब? कौन था इसके पीछे? सबका जवाब एक ही है. वहीं से, जहां से लश्कर-ए-तैयबा को खाद-पानी मिल रहा था.  

Mumbai attack mastermind, Lashkar-e-Taiba (LeT), commander Zaki-ur-Rehman Lakhvi, Mumbai attack, Counter-Terrorism Department (CTD), Pakistan, case of terrorism financing, UN designated individual
ताज होटल पर हमले के दौरान पोजिशन लिए हुए सुरक्षाबल के जवान

अतीत की काफी बातें कर लीं, वर्तमान में लौटते हैं. आखिर पाकिस्तान से बातचीत की वकालत की इतनी बात क्यों हो रही है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच कूटनीतिक संबंध, जो पहले से ही ठंडे पड़े थे, पूरी तरह गिर गए थे. अब दोनों देशों के बीच केवल मिलिट्री ऑपरेशंस के महानिदेशकों यानी DGMOs की हॉटलाइन ही चालू है. लेकिन पर्दे के पीछे बहुत कुछ है जो पक रहा है.

ये भी पढ़ें: पीएम मोदी-शहबाज शरीफ के नाम लिखी 'अमन की चिट्ठी' पर बवाल, BJP बोली- ‘नहीं होगी बातचीत’

इस मांग के पीछे की कहानी?

इस सबसे इतर—जब हम ये रिपोर्ट लिख रहे थे, तभी एक खबर फ़्लैश हुई. भारत और पाकिस्तान ने अपनी-अपनी जेलों में बंद आम कैदियों और मछुआरों की लिस्ट एक-दूसरे को सौंप दी है. साल 2008 में दोनों देशों के बीच हुए एक समझौते के तहत, ऐसी लिस्ट हर साल 1 जनवरी और 1 जुलाई को एक-दूसरे के साथ शेयर की जाती है. ​भारत ने 386 आम कैदियों और 53 मछुआरों की लिस्ट पाकिस्तान को दी है. पाकिस्तान ने 52 आम कैदियों और 198 मछुआरों की लिस्ट भारत को दी है, जो भारतीय हैं या जिनके भारतीय होने का अनुमान है.

ज्यादा दिन नहीं बीते जब सूत्रों की गली से एक खबर आई. श्रीलंका के कोलंबो में दोनों मुल्कों के लोगों के बीच बातचीत की. कहा गया कि जुटान ब्रिटिश थिंक-टैंक 'इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटिजिक स्टडीज(IISS) के एक कार्यक्रम का था. वहां डेढ़ दिन तक अनौपचारिक बातचीत हुई. किनका नाम आया इसमें? बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव, पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे और पूर्व राजनयिक रुचि घनश्याम का. पाकिस्तान की तरफ से वहां के विदेश मंत्रालय के महानिदेशक सज्जाद हैदर खान और पीपीपी नेता शेरी रहमान और रिटायर्ड मेजर जनरल पटौदी भी थे. फिर क्या हुआ? जो होता आया है और होना भी चाहिए. विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने साफ़ कह दिया कि “ये प्राइवेट इवेंट्स हैं, सरकार का इनसे कोई लेना-देना नहीं.”

मिसरी की बातें, सरकार का ऑफिशियल स्टैंड बताती हैं. लेकिन इस तरह के जुटान को बैक-चैनल बातचीत कहा जाता है. दावे हैं कि बात दोनों देशों के बीच तनाव कम करने पर हुई. इसे डिप्लोमैसी की भाषा में ट्रैक-2 बातचीत कहा जा रहा. बड़ा सीधा स गणित है, 2 के पहले 1 आता है और बीच में डेढ़. तो तीनों को समझ लेते हैं.

ट्रैक 1 कूटनीति: ये डिप्लोमैसी का ऑफिशियल चैनल है जो सीधे सरकारों के बीच मौजूदा नेताओं, मंत्रियों, राजनयिकों और अन्य अधिकृत अधिकारियों के ज़रिए संचालित होता है. इस बातचीत में औपचारिक समझौते, संधियां और नीतिगत फैसले होते हैं.

ट्रैक 1.5 कूटनीति: यह बातचीत का एक हाइब्रिड मॉडल है. यानी मौजूदा सरकारी अधिकारियों और गैर-सरकारी विशेषज्ञों, दोनों की मौजूदगी होती है. अक्सर किसी तटस्थ थिंक टैंक या संगठन की देखरेख में होता है. सरकारों को संवेदनशील मुद्दों पर अधिक लचीले और अनौपचारिक माहौल में चर्चा करने की सुविधा देता है.

ट्रैक 2 कूटनीति: अनऑफिशियल बातचीत का मंच. जिसमें रिटायर्ड राजनयिक, सेना के पूर्व अधिकारी, शिक्षाविद, थिंक टैंक एक्सपर्ट होते हैं. मिलने वाले सरकार की तरफ से नहीं अपनी व्यक्तिगत या व्यावसायिक क्षमता में भाग लेते हैं. मकसद बिना किसी मानने-मनवाने वाले समझौते के विश्वास कायम करना, संभावित समाधान तलाशना और तनाव को कम करना होता है.

बातचीत में शामिल हुए राम माधव का भी पक्ष आया. इसे ट्रैक 1.5 या ट्रैक 2 कहने वालों को लताड़ा. बोले, कार्यक्रम का ट्रैक-2 बातचीत से कोई लेना-देना नहीं था. सालाना होने वाली इस बातचीत में कई देशों के विद्वान, विशेषज्ञ और अधिकारी शामिल हुए थे.

इसी क्रम में कॉल्मनिस्ट सोनम महाजन ने X पर एक वाक्या शेयर किया है. उन्होंने अपने पाकिस्तान के ही एक रिसर्चर साथी के हवाले से बताया,

“सिंधु जल संधि के लगातार स्थगित रहने की वजह से पाकिस्तानी सेना और वहां की हाइब्रिड सरकार के भीतर हताशा और गुस्सा लगातार बढ़ रहा है. इस बढ़ते गुस्से की मुख्य वजह इस संधि को लेकर हो रही बातचीत में आया गतिरोध है. कहा जा रहा है कि पाकिस्तान इस मामले में किसी भी तरह का कोई समाधान या बड़ी सफलता चाहता है, लेकिन भारतीय पक्ष ने अपना रुख बेहद कड़ा कर रखा है, जिससे बातचीत आगे बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम बची है. हालांकि, पाकिस्तानी पक्ष लगातार यह दावा कर रहा है कि बातचीत अभी चल रही है और वे इसे 'ट्रैक 1.5' संवाद कह रहे हैं.”

वो आगे लिखती हैं कि यदि इतिहास को देखा जाए, तो पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र को संभालने वालों के भीतर जब भी इस तरह की हताशा या छटपटाहट बढ़ी है, उसके बाद भारत के खिलाफ आतंकवादी एक्टिविटी में तेज़ी देखी गई है. इसलिए, आने वाले हफ्तों में इन घटनाक्रमों पर करीब से नज़र रखना बेहद समझदारी का काम होगा.

इन तमाम ख़बरों पर पूछा सरकार से भी गया था. जैसा कि पहले ही बताया, सरकार की तरफ से विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने तो कह दिया कि ऐसे दर्जनों निजी इवेंट होते रहते हैं. इसमें कुछ भी नया, असामान्य और सबसे बड़ी बात कुछ भी आधिकारिक नहीं है. न सरकार की कोई भागीदारी है और न ही कोई आधिकारिक समर्थन.

सीधे-सीधे भले कुछ कहा न जाए. लेकिन छन-छनकर जो खबरें आ रही हैं, वो कुछ और तस्वीर बता रही हैं. कहा जा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ट्रैक-2 बातचीत का तरीका बदल गया है. अब पूरा ध्यान सालों से चले आ रहे विवादों को सुलझाने की बजाय केवल हालिया टकराव को संभालने का है. द प्रिंट में केशव पद्मानाभन ने लिखा है कि बीते एक साल में दोनों देशों के बीच ट्रैक-2 संवाद के कम से कम तीन दौर हो चुके हैं. और साल के अंत में ऐसे कम से कम दो और दौर होने तय हैं. बातचीत में तनाव को बढ़ने से रोकने पर ज्यादा फोकस है. कश्मीर, सिंधु जल संधि जैसे दशकों से चल रहे मुद्दे एजेंडे में काफी नीचे खिसक गए हैं. रिपोर्ट बताती है कि ये व्यवस्था भारत के लिए एक माध्यम और कूरियर दोनों तरह से काम करती है. जिससे पड़ोसी मुल्क की सोच का पता चलता रहता है. सरकार को इन मुलाकातों की पूरी जानकारी रहती है, लेकिन वह सीधे तौर पर इनमें शामिल नहीं होती है.

फिलवक्त पाकिस्तान की आवाम से बातचीत की वकालत करने वालों में RSS की टॉप लीडरशिप भी है. मई में RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का एक इंटरव्यू आया. जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखने की ज़रूरत पर बात की थी. इस बयान पर हो-हल्ला मचा तो पक्ष में खड़े हुए सरसंघचालक मोहन भागवत. तिरुवनंतपुरम में होसबाले के विचारों का समर्थन किया.

लेकिन घुमा-फिराकर वही बात. किनसे वफ़ा की उम्मीद हो रही है. आप अतीत भूलते रहिए, वो अतीतनुमा वर्तमान बनाते रहेंगे. उनकी खुरपेंच जारी है. सिंधु जल संधि की मिसाल देखिए. पहलगाम हमले के बाद अप्रैल 2025 में भारत ने सिंधु जल समझौते यानी इंडस वाटर्स ट्रीटी को सस्पेंड कर दिया था. इस फ़ैसले से बौखलाए पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अब एक नया पैंतरा चला है. वो दुनिया के सामने ये साबित करने में जुट गए हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता उनकी विरासत है.

ये भी पढ़ें: उद्धव ठाकरे की शिवसेना टूटी तो दर्द देवेंद्र फडणवीस को भी होगा? एकनाथ शिंदे का असली खेल

दशकों से जिस मोहन-जोदड़ो की किसी ने सुध नहीं ली थी, मई 2025 में 40 साल बाद वहां फिर से खुदाई की इजाज़त दे दी गई. अप्रैल 2026 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने कहा कि पाकिस्तान सिंधु घाटी और गांधार का संगम है. जून 2026 में पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने कहा कि पाकिस्तान ही सिंधु घाटी का असली रखवाला है, और इसी नाते इस नदी पर उनका ऐतिहासिक हक़ है.

यानी जो पाकिस्तान दशकों से अपनी जनता को ये घुट्टी पिलाता रहा कि उनकी पैदाइश आठवीं सदी में हुई थी, जो पाकिस्तान सीना ठोककर कहता था कि अरब हमलावर मुहम्मद बिन क़ासिम से उसका इतिहास शुरू होता है, वो पाकिस्तान अचानक अपनी सहूलियत के लिए पांच हज़ार साल पीछे मुड़कर देख रहा है. पाकिस्तानी लीडर्स सिंधु जल संधि पर भड़काऊ बयान दे रहे हैं. वहां के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक ने कहा है कि जो भी पाकिस्तान के हिस्से का पानी छुएगा, उसके हाथ काट दिए जाएंगे.

इधर पीएम नरेंद्र मोदी कई दफा दोहरा चुके हैं कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते. बहना भी नहीं चाहिए. पहले लगाम खून बहाने वालों पर लगे तभी बातचीत की कोई पहल होनी चाहिए. देखना है कि इस मांग पर दोनों देशों की सरकारें कितना ध्यान देती हैं, ध्यान देती भी हैं या नहीं? या किसी और ध्यान के पहले कोई गहरा विवाद ही तो नहीं रास्ते में आ पड़ता .  

वीडियो: भारत-पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों को पत्र लिख कर बातचीत की मांग

Advertisement