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झारखंड HC ने 'टू फिंगर टेस्ट' पर रोक लगाई, डॉक्टरों-अस्पतालों को चेताया

झारखंड हाई कोर्ट ने रेप मामलों में इस्तेमाल होने वाले टू-फिंगर टेस्ट पर सख्ती से रोक लगाने और सभी अस्पतालों को इस संबंध में सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि यह तरीका अवैज्ञानिक है और इसे करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.

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रेप की जांच के लिए टू फिंगर टेस्ट पर रोक. (फोटो- India today)

रेप के आरोपों की जांच के लिए ‘टू फिंगर टेस्ट’ पर झारखंड हाई कोर्ट ने सख्ती से रोक लगाने का आदेश दिया है. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि झारखंड सरकार प्राइवेट अस्पतालों को इसे लेकर एक सर्कुलर जारी करे. अगर कोई भी इस सर्कुलर का उल्लंघन करे तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए.

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झारखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनाक और जस्टिस राजेश शंकर की पीठ ने ये आदेश जारी किया है. इस दौरान रेप सर्वाइवर्स को लेकर पुलिस की कार्यशैली को लेकर भी हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है.

कोर्ट ने कहा कि जिस महिला के साथ बलात्कार हुआ है, उसके साथ पुलिस को संवेदनशीलता के साथ पेश आना चाहिए. यही उनकी जिम्मेदारी है. सर्वाइवर का बयान सब इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के रैंक की महिला पुलिस अधिकारी को ही दर्ज करना चाहिए. ऐसे मामलों को निपटाने के लिए पुलिस को स्पेशल ट्रेनिंग दी जानी चाहिए. जिस समय रेप सर्वाइवर के बयान दर्ज किए जा रहे हों, तब उन्हें ऐसा माहौल देना चाहिए कि वो बेझिझक सब कुछ बता सकें. इस दौरान उन पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं डाला जाना चाहिए.

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इसके अलावा कोर्ट ने रेप के आरोपों की जांच के लिए ‘टू- फिंगर टेस्ट’ को लेकर भी ऐतिहासिक आदेश दिया. कोर्ट ने राज्य सरकार से इस पर पूरी तरह से रोक लगाने को कहा. साथ ही झारखंड के सभी अस्पतालों को इस संबंध में एक सर्कुलर जारी करने के भी निर्देश दिए. जो इस सर्कुलर के दिशानिर्देशों को नहीं मानते हैं, उन पर सख्त कार्रवाई करने का भी आदेश कोर्ट ने दिया है. कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) माना जाएगा. 

क्या होता है 'टू फिंगर टेस्ट'?

‘टू फिंगर टेस्ट’ रेप के आरोपों की जांच के लिए यूज होने वाला पुराना तरीका है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर केंद्र सरकार तक ने अब रोक लगा दी है. इस टेस्ट में रेप का आरोप लगाने वाली महिला के प्राइवेट पार्ट में दो अंगुलियों को प्रवेश कराकर डॉक्टर ये जानने की कोशिश करते हैं कि वो सेक्शुअली एक्टिव है या नहीं. इसका मकसद ये साबित करना होता है कि महिला के प्राइवेट पार्ट में ‘पेनिट्रेशन’ हुआ था या नहीं? इसमें प्राइवेट पार्ट के मसल्स के लचीलेपन और हाइमन की जांच की जाती है.

लड़कियों की योनि में एक झिल्ली होती है, जिसे हाइमन कहते हैं. अगर ये हाइमन उनकी योनि में मौजूद होता है तो माना जाता है कि सेक्स नहीं हुआ है. लेकिन अगर इस मेंब्रेन को नुकसान पहुंचा है तो इससे कथित तौर पर साबित होता है कि पेनिट्रेशन किया गया है. हालांकि, कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि हाइमन डैमेज होने की सेक्स के अलावा भी कई वजहें होती हैं. ऐसे में टू फिंगर टेस्ट से हाइमन की स्थिति जानना शारीरिक संबंध बनाने की जांच का भरोसेमंद तरीका नहीं है. 

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‘टू फिंगर टेस्ट’ पर पहले भी लगी है रोक

टू-फिंगर टेस्ट पर रोक का झारखंड हाई कोर्ट का आदेश नया नहीं है. इसकी ‘अवैज्ञानिकता’ पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले दो बार टिप्पणी की है और रोक लगाने का आदेश भी दिया है.

सबसे पहले साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रेप पीड़िता पर किया जाने वाला ‘टू-फिंगर टेस्ट’ उसकी प्राइवेसी और गरिमा का उल्लंघन है. जस्टिस बीएस चौहान और एफएम कलीफुल्ला की पीठ ने आगे कहा कि रेप के केस में अगर ‘टू-फिंगर टेस्ट’ की रिपोर्ट पॉजिटिव भी आती है, तब भी इससे यह नहीं माना जा सकता कि पीड़िता ने सेक्स के लिए सहमति दी थी. कोर्ट ने सरकार से कहा कि यौन उत्पीड़न का पता लगाने के लिए ज्यादा बेहतर मेडिकल तरीके अपनाए जाएं.

इसके बाद साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने भी ऐसा ही आदेश दिया था. उन्होंने टू फिंगर टेस्ट को मेडिकल की पढ़ाई से निकालने का भी आदेश दिया था. बेंच ने इसे ‘पितृसत्तात्मक’ और ‘अवैज्ञानिक’ बताया और कहा कि मेडिकल की पढ़ाई की सामग्री में इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए. रेप पीड़िता की जांच के लिए अपनाया जाने वाला ये तरीका उसे फिर से प्रताड़ित करने जैसा है. कोर्ट ने चेतावनी भी दी थी कि यह टेस्ट करने वाले डॉक्टरों को दोषी ठहराया जाएगा और उन पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी. 

कमिटी की सिफारिश

आउटलुक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इन सबसे पहले साल 2012 में बहुचर्चित निर्भया कांड के बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक कमिटी बनी थी. इस कमिटी ने भी सिफारिश की थी कि ‘टू फिंगर टेस्ट’ पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाए. वर्मा कमिटी ने कहा था कि योनि के आकार का यौन उत्पीड़न से कोई लेना-देना नहीं है. योनि की मांसपेशियों के लचीलेपन के आधार पर यौन संबंध बनाने की आदत जैसे नतीजे नहीं निकाले जाने चाहिए. इस सिफारिश के बाद साल 2013 में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम- 2013 के तहत टू फिंगर टेस्ट को अवैध घोषित कर दिया गया.

इस सिफारिश और सुप्रीम कोर्ट की पहली टिप्पणी के बाद साल 2014 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी एक दस्तावेज जारी कर ‘दो अंगुली परीक्षण’ पर रोक लगाई थी. 'यौन हिंसा के पीड़ितों, सर्वाइवर्स के लिए चिकित्सा-कानूनी देखभाल संबंधी दिशानिर्देश और प्रोटोकॉल' नाम के अपने डॉक्युमेंट में सरकार ने कहा कि आम बोलचाल में ‘टू फिंगर टेस्ट’ के रूप में जाने जाने वाले योनि परीक्षण का प्रयोग रेप के आरोप को साबित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. योनि के प्रवेश द्वार के आकार का यौन हिंसा के मामले से कोई संबंध नहीं है. मंत्रालय ने साफ किया कि जरूरी मेडिकल कंडीशन होने पर ही योनि की जांच केवल बालिग महिलाओं की होनी चाहिए.

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