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20,804 करोड़ रुपये का रेलवे मिशन, 9 राज्यों में 1196 किमी मल्टी ट्रैकिंग, आपकी ट्रेन को क्या फायदा होगा?

Indian Railways: केंद्र सरकार ने 9 राज्यों में 20,804 करोड़ रुपये की आठ रेलवे मल्टी ट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी है. करीब 1,196 किलोमीटर नेटवर्क की क्षमता बढ़ने से यात्री और मालगाड़ियों की आवाजाही बेहतर होने की उम्मीद है. समझिए तीसरी और चौथी रेल लाइन आपकी ट्रेन के सफर को कैसे प्रभावित करेगी.

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एक ही ट्रैक पर जब ट्रेनें बढ़ती जाती हैं, तो समस्या सिर्फ रफ्तार की नहीं रहती (फोटो-AI)

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  • केंद्र सरकार ने 9 सितंबर 2026 को 20,804 करोड़ रुपये की लागत से आठ मल्टी ट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी, जिनसे 1,196 किलोमीटर लंबी रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ेगी और परियोजनाएं 2029-30 तक पूरी होंगी।
  • भारतीय रेलवे के व्यस्त नेटवर्क पर ट्रेनों को बार-बार रोकना पड़ता है क्योंकि दो लाइनें भी बढ़ते यातायात को संभालने में असमर्थ हैं, जिससे ट्रेनों के बीच टकराव और देरी होती है।
  • इन परियोजनाओं से मल्टी ट्रैकिंग के कारण ट्रेनों को अलग-अलग रास्ते मिलने से प्रतीक्षा समय घटेगा, जिससे 6,911 गांवों की कनेक्टिविटी बेहतर होगी और माल ढुलाई में सालाना 7.4 करोड़ टन की वृद्धि संभव होगी।

मान लीजिए आप किसी ऐसी ट्रेन में बैठे हैं, जिसे अपने रास्ते में बार बार सिग्नल पर रुकना पड़ रहा है. आपके सामने कोई मालगाड़ी चल रही है, दूसरी तरफ से यात्री ट्रेन आने वाली है और आगे किसी स्टेशन पर एक और ट्रेन को रास्ता देना है. ऐसे में ट्रेन की अपनी क्षमता भले ही ज्यादा हो, लेकिन पूरा रेल नेटवर्क उसे उतनी तेजी से आगे बढ़ने नहीं देता.

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भारतीय रेलवे की कई व्यस्त लाइनों पर कुछ ऐसा ही दबाव है. इसी समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 9 सितंबर 2026 को 20,804 करोड़ रुपये की आठ मल्टी ट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी है. ये परियोजनाएं नौ राज्यों के 31 जिलों से गुजरेंगी और करीब 1,196 किलोमीटर रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ाएंगी. इनका लक्ष्य 2029-30 तक काम पूरा करना है.

अब सवाल है कि रेलवे की तीसरी या चौथी लाइन बिछाने से आम यात्री को आखिर क्या फायदा मिलेगा?

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पहले समझिए तीसरी और चौथी लाइन होती क्या है

किसी रेल मार्ग पर अगर एक ही लाइन है, तो उस पर दोनों दिशाओं में ट्रेनें चलती हैं. ऐसे में सामने से ट्रेन आने पर दूसरी ट्रेन को क्रॉसिंग के लिए स्टेशन या किसी दूसरी जगह रुकना पड़ सकता है.

दो लाइन होने पर एक लाइन आने वाली और दूसरी जाने वाली ट्रेनों के लिए इस्तेमाल की जा सकती है. लेकिन जैसे जैसे यात्री और मालगाड़ियों की संख्या बढ़ती है, दो लाइनें भी कम पड़ने लगती हैं.

यहीं से तीसरी और चौथी लाइन की जरूरत आती है. अतिरिक्त लाइनें बनने का मतलब है कि एक ही रेल गलियारे पर ज्यादा ट्रेनों को एक साथ चलाने की गुंजाइश पैदा हो जाती है. रेलवे के लिए इसे क्षमता बढ़ाना कहा जाता है.

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यानी तीसरी या चौथी लाइन का असली फायदा ये नहीं कि ट्रेन अचानक 100 की जगह 150 किलोमीटर प्रति घंटे चलने लगेगी. बड़ा फायदा ये है कि उसे किसी दूसरी ट्रेन के लिए बार बार रास्ता खाली करने की जरूरत कम पड़ेगी.

20,804 करोड़ रुपये कहां खर्च होंगे?

सरकार ने आठ परियोजनाओं को दो बड़े हिस्सों में मंजूरी दी है. इनमें पांच परियोजनाएं दक्षिण भारत के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में हैं. इनकी लागत करीब 10,021 करोड़ रुपये है और इनसे लगभग 540 किलोमीटर नेटवर्क की क्षमता बढ़ेगी.

इनमें अरक्कोनम से रेणिगुंटा के बीच तीसरी और चौथी लाइन के 77 किलोमीटर, व्हाइटफील्ड से बेंगलुरु के पास बांगारपेट के बीच 47 किलोमीटर की तीसरी और चौथी लाइन, होसुर से ओमलूर के बीच 147 किलोमीटर लाइन दोहरीकरण, सेलम से करूर होते हुए डिंडीगुल तक 159 किलोमीटर दोहरीकरण और सिकंदराबाद के घाटकेसर से काजीपेट तक 110 किलोमीटर मल्टी ट्रैकिंग शामिल है.

दूसरे हिस्से में पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ शामिल हैं. यहां तीन परियोजनाओं पर 10,783 करोड़ रुपये खर्च होंगे और करीब 656 किलोमीटर नेटवर्क की क्षमता बढ़ेगी.

इनमें खड़गपुर से झारसुगुड़ा के बीच चौथी लाइन, कटनी से पेंड्रा रोड के बीच चौथी लाइन और बिलासपुर के उसलापुर से पेंड्रा रोड के बीच तीसरी लाइन शामिल है.

आपकी ट्रेन के लिए सबसे बड़ा फायदा क्या होगा?

सबसे बड़ा फायदा होगा ट्रेनों के बीच रास्ते को लेकर कम टकराव. अभी अगर किसी व्यस्त सेक्शन पर मालगाड़ी को निकालना है, तो उसके कारण यात्री ट्रेन को कुछ देर रोकना पड़ सकता है. इसी तरह तेज यात्री ट्रेन को रास्ता देने के लिए दूसरी ट्रेन को धीमा किया जा सकता है.

अतिरिक्त लाइनें बनने के बाद रेलवे के पास ट्रेनों को अलग अलग रास्तों पर चलाने की ज्यादा गुंजाइश होगी. इसका मतलब है कम प्रतीक्षा, बेहतर संचालन और समय की पाबंदी में सुधार.

इसका असर सिर्फ यात्री ट्रेन पर नहीं पड़ेगा. मालगाड़ियां भी ज्यादा संख्या में और ज्यादा भरोसे के साथ चल सकेंगी. सरकार के मुताबिक इन आठ परियोजनाओं से हर साल करीब 7.4 करोड़ टन अतिरिक्त माल ढुलाई की क्षमता पैदा होगी. इसमें कोयला, सीमेंट, लोहा और इस्पात, कंटेनर, ऑटोमोबाइल, खाद्यान्न, पेट्रोलियम उत्पाद और उर्वरक जैसी चीजें शामिल हैं.

तो क्या ट्रेनें तेज चलेंगी?

इस सवाल का जवाब थोड़ा सावधानी से समझना जरूरी है.

मल्टी ट्रैकिंग का मतलब सीधे तौर पर ट्रेन की अधिकतम रफ्तार बढ़ाना नहीं है. ट्रेन की अधिकतम गति ट्रैक की स्थिति, सिग्नलिंग, मोड़, पुल, सुरक्षा व्यवस्था और दूसरे तकनीकी मानकों पर भी निर्भर करती है.

लेकिन अतिरिक्त लाइनें बनने से ट्रेन को रास्ते में कम बार रोकने या धीमा करने की जरूरत पड़ सकती है. यानी आपकी यात्रा की कुल अवधि और सबसे ज्यादा समय की अनिश्चितता कम हो सकती है.

इसे ऐसे समझिए. अगर कार के लिए सड़क पर ज्यादा लेन बना दी जाएं, तो हर कार की इंजन क्षमता नहीं बढ़ती. लेकिन जाम कम हो सकता है और सफर ज्यादा लगातार हो सकता है. रेलवे में मल्टी ट्रैकिंग का तर्क भी काफी हद तक ऐसा ही है.

मालगाड़ी को फायदा यानी यात्री को भी फायदा

रेलवे की लाइन पर यात्री और माल दोनों तरह की ट्रेनें चलती हैं. माल ढुलाई बढ़ाने के लिए रेलवे को पर्याप्त क्षमता चाहिए. अगर मालगाड़ियों की संख्या बढ़ती है लेकिन लाइनें वही रहती हैं, तो यात्री ट्रेनों की आवाजाही पर भी दबाव पड़ सकता है.

नई लाइनें इस दबाव को कम करने में मदद करती हैं. सरकार के अनुसार दक्षिण भारत की पांच परियोजनाओं से करीब 4.7 करोड़ टन अतिरिक्त माल ढुलाई क्षमता और पश्चिम तथा मध्य भारत की तीन परियोजनाओं से करीब 2.7 करोड़ टन अतिरिक्त माल ढुलाई क्षमता जुड़ सकती है.

यानी कुल मिलाकर करीब 7.4 करोड़ टन अतिरिक्त माल सालाना ले जाने की क्षमता तैयार करने का लक्ष्य है.

6,911 गांव और करीब 1.08 करोड़ लोगों पर असर

इस परियोजना का फायदा सिर्फ रेलवे स्टेशन तक सीमित नहीं रहेगा. सरकार के मुताबिक आठों परियोजनाओं से करीब 6,911 गांवों की कनेक्टिविटी बेहतर होगी और इन इलाकों में रहने वाली करीब 1.08 करोड़ आबादी को इसका लाभ मिल सकता है.

इसके अलावा पर्यटन और धार्मिक स्थलों तक पहुंच भी बेहतर होने की उम्मीद है. इनमें तिरुपति, कोडाइकनाल क्षेत्र, बांधवगढ़, अमरकंटक और कई दूसरे पर्यटन या धार्मिक स्थल शामिल हैं.

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असली परीक्षा 2029-30 के बाद होगी

सरकार ने इन परियोजनाओं को 2029-30 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है. इसलिए इसका पूरा असर आज से कल ही आपकी ट्रेन के समय पर नहीं दिखेगा.

लेकिन रेलवे के लिए ये निवेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समस्या सिर्फ नई ट्रेन चलाने की नहीं है. अगर पटरियों की क्षमता सीमित है, तो नई ट्रेनें जोड़ने की गुंजाइश भी सीमित रहती है.

इसलिए तीसरी और चौथी लाइन का खेल असल में ट्रेन की रफ्तार से ज्यादा रेल नेटवर्क की सांस बढ़ाने का है. ज्यादा लाइन, ज्यादा क्षमता, माल और यात्री ट्रेनों के लिए ज्यादा रास्ता और व्यस्त रूट पर कम टकराव. अगर काम तय समय पर पूरा होता है, तो 2029-30 के आसपास इसका सबसे बड़ा असर यात्रियों को ज्यादा भरोसेमंद और कम बाधित रेल सफर के रूप में दिखाई दे सकता है.

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