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तुम पूर्वजों से लिंक साबित नहीं कर पाए... 16 कागज देने के बाद भी ये शख्स भारतीय नागरिक नहीं

Indian Citizenship Proof: याचिकार्ता गुवाहाटी के बोरबोरी में किराए के मकान में रहकर दिहाड़ी मजदूरी करता है. उसने Gauhati High Court को 16 दस्तावेज दिए. इसके अलावा अपने पिता की मौखिक गवाही भी दिलवाई. अब कोर्ट ने फैसला सुनाया है.

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2019 में असम NRC की लिस्ट में अपना नाम देखने के लिए लाइन में खड़े लोग. (PTI)

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  • गुवाहाटी हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा भारतीय नागरिक साबित करने के लिए जमा किए गए 1951 से 2017 तक के 16 दस्तावेजों और पिता की गवाही को खारिज करते हुए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का निर्णय बरकरार रखा।
  • कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि 1951 का एनआरसी, पैन कार्ड, वोटर आईडी और पिता की मौखिक गवाही नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि इनमें कानूनी आवश्यक सर्टिफिकेट या पुख्ता दस्तावेज़ नहीं थे।
  • इस फैसले के बाद याचिकाकर्ता को विदेशी माना गया है, जिसके चलते उसके पासपोर्ट और अन्य दस्तावेज़ भारतीय नागरिकता के सबूत माने जाने से रोक दिए गए हैं, और आगे कानूनी स्थिति पर असर पड़ सकता है।
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शौनक सान्याल

पासपोर्ट भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है. इस पर तो बहस पहले से ही चल रही है. अब असम में एक ऐसा मामला देखने को मिला, जिसमें एक शख्स ने 1951 से 2017 तक के 16 डॉक्यूमेंट दिए. लेकिन फिर भी गुवाहाटी हाई कोर्ट ने उसे भारतीय नागरिक मानने से इनकार कर दिया. इन 16 डॉक्यूमेंट में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC), पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, जमीन और स्कूल से जुड़े कागज-पत्तर आदि शामिल थे. ऊपर से शख्स के पिता ने भी उसके पक्ष में गवाही दी. लेकिन कोर्ट ने सबूत और दलीलें नहीं मानीं और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए उसे विदेशी माना.

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इंडिया टुडे से जुड़े शौनक सान्याल की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता गुवाहाटी के पास किराए पर रहता है. उसने गुवाहाटी हाई कोर्ट में अपने भारतीय नागरिक होने के पक्ष में लिखित सबूतों के साथ-साथ मौखिक गवाही भी दिलवाई. लेकिन कुछ भी काम नहीं आ सका. जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की डिवीजन बेंच ने फैसला दिया कि कोई भी दस्तावेज याचिकाकर्ता को उसके बताए वंश से नहीं जोड़ सका.

डिवीजन बेंच ने कहा कि पिटीशनर "फॉरेनर्स एक्ट, 1946 के सेक्शन 9 के तहत यह साबित करने में नाकाम रहा कि वह विदेशी नहीं बल्कि भारतीय नागरिक है."

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कौन-कौन से कागज दिए?

याचिकाकर्ता ने खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए कुल 16 दस्तावेज गुवाहाटी हाई कोर्ट में जमा किए थे-

याचिकाकर्ता (DW-1) द्वारा सबूत के तौर पर पेश 16 दस्तावेज (1951 से 2017 तक)

  1. याचिकाकर्ता के पिता के नाम साल 1951 की एनआरसी (NRC) की कॉपी.
  2. याचिकाकर्ता के पिता के नाम साल 1951 की कम्प्यूटराइज्ड एनआरसी (NRC) की कॉपी, जिसमें दादा-दादी, सौतेली दादी और अन्य परिवार के सदस्यों के नाम भी दर्ज हैं.
  3. साल 1966 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता के दादा-दादी और सौतेली दादी के नाम दर्ज हैं.
  4. साल 1970 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता के पिता, दादा-दादी और अन्य परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज हैं.
  5. दिनांक 12 सितंबर 1973 की जमीन खरीदने की मूल डीड (Original Land Purchase Deed), जो याचिकाकर्ता के दादा के नाम पर है.
  6. साल 1979 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता के माता-पिता, दादा-दादी और अन्य परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज हैं.
  7. साल 1985 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता के माता-पिता और अन्य परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज हैं.
  8. याचिकाकर्ता का पैन कार्ड (PAN Card).
  9. साल 1989 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता के माता-पिता, अंकल और अन्य परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज हैं.
  10. साल 1997 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता के माता-पिता और बड़े भाई का नाम दर्ज है.
  11. दिनांक 20 अक्टूबर 2017 का स्कूल सर्टिफिकेट, जो हाशदोबा आंचलिक उच्च विद्यालय (Hashdoba Anchalik High School) के हेडमास्टर द्वारा जारी किया गया है.
  12. साल 2005 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता के माता-पिता और अन्य परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज हैं.
  13. साल 2013 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता, उसके माता-पिता और अन्य परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज हैं.
  14. याचिकाकर्ता का मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC Card).
  15. साल 2015 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता, उसके माता-पिता एवं अन्य परिवार के सदस्यों के नाम दर्ज हैं.
  16. साल 2017 की वोटर लिस्ट की सर्टिफाइड कॉपी, जिसमें याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी के नाम दर्ज हैं.
कहां-कहां रहा याचिकाकर्ता?

लिखित बयान के अनुसार, याचिकाकर्ता का जन्म 1 मई 1988 में हुआ था. वह गुवाहाटी के बोरबोरी में किराए के मकान में रहकर दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. उन्होंने कोर्ट को बताया कि नदी के कटाव की वजह से उनके परिवार को चराई खसरा से धोबाकुरा, फिर घुगुडोबा और आखिर में हाशदोबा जाना पड़ा, जहां उन्होंने 1999 में हाशदोबा आंचलिक हाई स्कूल में क्लास 5 में पढ़ाई की. अपने दावों को सपोर्ट करने के लिए याचिकाकर्ता और उसके पिता दोनों ने गवाह के तौर पर मौखिक गवाही दी.

कोर्ट ने क्यों नहीं माने सबूत?

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के सबूतों को क्यों नहीं माना, उसकी वजह नीचे दी गई हैं:

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NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) का कागज क्यों नहीं माना?

हाई कोर्ट ने कहा कि 1951 के NRC का कागज यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि कोई इंसान भारत का मूलनिवासी है. 1951 का NRC 'सेंसस एक्ट, 1948' के तहत बना था. इस कानून की धारा 15 कहती है कि जनगणना के रिकॉर्ड को कोर्ट में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

याचिकाकर्ता ने जो NRC की कॉपी दी, वह कंप्यूटर से निकाली गई थी. कानून के मुताबिक, कंप्यूटर से निकले किसी भी दस्तावेज को सबूत मानने के लिए एक खास सरकारी सर्टिफिकेट 'एविडेंस एक्ट, 1872' की धारा 65-B (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में धारा 63(4) है) के तहत देना जरूरी होता है, जो उसने नहीं दिया था.

वोटर आईडी (EPIC) और पैन कार्ड क्यों नहीं माना?

कोर्ट ने साफ कहा कि पैन कार्ड और वोटर आईडी कार्ड (EPIC) होने का यह मतलब नहीं होता कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है. अदालत के पहले के फैसलों में यह माना जा चुका है कि पैन कार्ड और वोटर इलेक्शन कार्ड सिटिजनशिप के सबूत नहीं हैं.

पिता की मुंहजुबानी गवाही क्यों नहीं मानी?

याचिकाकर्ता के कथित पिता ने कोर्ट में आकर कहा कि याचिकाकर्ता उन्हीं का बेटा है. लेकिन कोर्ट ने कहा कि नागरिकता जैसे गंभीर मामलों में सिर्फ मुंहजुबानी बातें काम नहीं आतीं, इसके लिए पक्के सरकारी कागजात होने जरूरी हैं. जब पिता से पूछताछ की गई, तो उन्हें खुद याद नहीं था कि उनका बेटा किस साल पैदा हुआ था, जिससे उनकी बातों पर शक पैदा हो गया.

स्कूल का सर्टिफिकेट क्यों नहीं माना?

याचिकाकर्ता ने स्कूल का जो सर्टिफिकेट दिखाया, उसे सही साबित करने के लिए याचिकाकर्ता स्कूल के हेडमास्टर (या सर्टिफिकेट जारी करने वाले) को कोर्ट में गवाह के तौर पर पेश नहीं कर सका. कोर्ट में स्कूल का असली 'एडमिशन रजिस्टर' भी पेश नहीं किया गया, ताकि यह मैच किया जा सके कि सर्टिफिकेट सच्चा है या झूठा.

यह भी पढ़ें: 2010 में सरकार ने पासपोर्ट को माना था नागरिकता का सबूत! रिपोर्ट में दावा

उम्र और परिवार के रिकॉर्ड में हेरफेर

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसका परिवार समय-समय पर तीन अलग-अलग गांवों (धोबाकुरा, घुगुडोबा और हासदोबा) में जाकर बसा. लेकिन अलग-अलग सालों की वोटर लिस्ट में उसके परिवार के सदस्यों के नाम और उम्र आपस में मैच नहीं हो रहे थे. उदाहरण के लिए, उसके परिवार के एक सदस्य की उम्र 1979 की वोटर लिस्ट में 25 साल थी, 1989 की लिस्ट में बढ़कर 29 साल हो गई.

हाई कोर्ट ने मान लिया कि यह पूरा परिवार एक नहीं है और याचिकाकर्ता का अपने कथित पूर्वजों से कोई पक्का संबंध (लिंक) नहीं जुड़ता.

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