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1947 से अब तक सिखों पर कितना अत्याचार, पाकिस्तान में क्यों ढहाए जा रहे ऐतिहासिक गुरुद्वारे?

Attacks on Sikhs in Pakistan: पाकिस्तान के झांग जिले में 125 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारे को जमींदोज किए जाने के बाद भारत ने सख्त आपत्ति जताई है. 1947 के विभाजन के बाद से पाकिस्तान में सिखों के धार्मिक स्थलों, टारगेट किलिंग और भू-माफिया के गठजोड़ की इस कहानी में कईं पेंच हैं.

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पाकिस्तान के गुरुद्वारों पर भू माफिया की नजर (फोटो- ANI)

पाकिस्तान के झांग जिले से आई एक तस्वीर ने पूरी दुनिया के सिखों और इंसाफ पसंद लोगों को झकझोर कर रख दिया है. वहां के एक 125 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारे को स्थानीय प्रशासन और भू-माफिया ने मिलकर जमींदोज कर दिया. भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस पर बेहद सख्त विरोध दर्ज कराया है.

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लेकिन ये कोई पहली घटना नहीं है, जब पाकिस्तान में सिख यूं निशाना बने हों. ये एक अंतहीन सिलसिले की वो ताजा कड़ी है, जो 1947 के विभाजन के बाद से पाकिस्तान में लगातार जारी है. चलिए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर पाकिस्तान में सिखों और उनके धार्मिक स्थलों के साथ क्या खेल हो रहा है.

घटती विरासत का सच: चालू गुरुद्वारों से खंडहरों तक का सफर

1947 में जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तो सिखों की एक बहुत बड़ी विरासत, उनके पुरखों की जमीन और दर्जनों बेहद पवित्र धार्मिक स्थल पाकिस्तान वाले हिस्से में रह गए. इतिहासकार इकबाल कैसर की किताब 'हिस्टोरिकल सिख श्राइन्स इन पाकिस्तान' के मुताबिक, विभाजन के समय पाकिस्तान के इलाके में सैकड़ों छोटे-बड़े ऐतिहासिक गुरुद्वारे मौजूद थे.

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एक दौर था जब इन गुरुद्वारों में गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश होता था और संगत जुटती थी. लेकिन आज हकीकत बिल्कुल उलट है. 'सेंटर फॉर पीस एंड सेक्युलर स्टडीज' (CPSS) की एक पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में मौजूद सैकड़ों ऐतिहासिक सिख धार्मिक स्थलों में से महज कुछ दर्जन ही ऐसे हैं, जहां आज के समय में सिख अरदास कर पाते हैं या जो चालू हालत में हैं. बाकी के गुरुद्वारे या तो भू-माफिया के कब्जे में हैं, या उन्हें सरकारी स्कूलों, थानों, मवेशी बांधने के बाड़ों में तब्दील कर दिया गया है या वो झांग के गुरुद्वारे की तरह जमींदोज कर दिए गए हैं.

दि ट्रिब्यून अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, झांग जिले में तोड़ा गया गुरुद्वारा सिख समुदाय के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता था. रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि समय-समय पर होने वाली इस तरह की घटनाएं पड़ोसी मुल्क में बची-खुची सिख विरासत को भी खत्म कर रही हैं. 

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पाकिस्तान में तोड़ा गया एक गुरुद्वारा (फाइल फोटो- PTI)

ETPB का काला खेल: रक्षक ही जब भक्षक बन जाए

पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों की छोड़ी गई जमीनों, संपत्तियों और धार्मिक स्थलों की देखरेख के लिए एक सरकारी संस्था बनाई गई थी, जिसका नाम है 'इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड' (ETPB). कायदे से इस बोर्ड का काम अल्पसंख्यकों की संपत्तियों की रक्षा करना है. लेकिन पाकिस्तान में जमीन के धंधेबाज और भू-माफिया के लिए ये बोर्ड सबसे बड़ा मददगार साबित होता आया है.

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‘इंडिया मैटर्स’ के रोहित शर्मा कहते हैं कि सरकारी तंत्र और भूमाफिया की मिली भगत से ये सारा काम लंबे समय से चल रहा है. लल्लनटॉप से बात करते हुए रोहित कहते हैं,

होता ये है कि जिन गुरुद्वारों के आस-पास सिखों की आबादी नहीं बची है, उनकी कीमती जमीनों को ETPB के अधिकारी कमर्शियल इस्तेमाल के लिए लीज पर दे देते हैं या भू-माफिया के साथ मिलकर कागजों में हेरफेर कर देते हैं. इसके बाद धीरे-धीरे उस धार्मिक इमारत का वजूद ही मिटा दिया जाता है. 

झांग जिले की घटना में भी यही पैटर्न सामने आया है, जहां लोकल एडमिनिस्ट्रेशन और जमीन के सौदागरों ने मिलकर रातों-रात 125 साल पुरानी इमारत को ढहा दिया ताकि वहां कोई नया कमर्शियल प्रोजेक्ट खड़ा किया जा सके.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारत ने पाकिस्तानी अधिकारियों के सामने अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों की सुरक्षा का मुद्दा बार-बार उठाया है, लेकिन ETPB की मिलीभगत से ये संपत्तियां लगातार गायब हो रही हैं. 

डरे हुए सिखों की दास्तान: टारगेट किलिंग और पलायन

बात सिर्फ इमारतों के टूटने तक महदूद नहीं है, बात जान पर बन आने की है. पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत (विशेषकर पेशावर) और ननकाना साहिब में रहने वाले सिख समुदाय के लोग पिछले एक दशक से लगातार चरमपंथियों के निशाने पर हैं.

मानवाधिकार संगठनों और पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP) के डेटा बताते हैं कि पेशावर में सिख दुकानदारों, हकीमों और गुरुद्वारे के सेवादारों की लगातार टारगेट किलिंग हुई है. साल 2018 में सिख सामाजिक कार्यकर्ता चरनजीत सिंह की हत्या, उसके बाद परमजीत सिंह और सतनाम सिंह जैसे कई बेगुनाह सिखों को सरेआम गोलियों से भून दिया गया. ननकाना साहिब जैसे पवित्र स्थान पर भी गुरुद्वारे के बाहर हिंसक भीड़ ने कई बार नारेबाजी की और सिखों को डराया-धमकाया.

इस लगातार बढ़ते खौफ का नतीजा ये हुआ है कि पाकिस्तान में सिखों की आबादी तेजी से घट रही है. 'सिख ह्यूमैनिटेरियन' संगठनों के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा के ग्रामीण इलाकों से ज्यादातर सिख परिवार या तो ननकाना साहिब और लाहौर जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित शहरों में शरण ले चुके हैं, या फिर वो पूरी तरह से पाकिस्तान छोड़कर भारत, यूरोप या कनाडा पलायन कर रहे हैं. जो कभी लाखों की तादाद में थे, वो अब चंद हजारों में सिमट कर रह गए हैं.

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) की सालाना रिपोर्टों में अल्पसंख्यकों, खासकर सिखों पर होने वाले हमलों और उनके जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों पर गहरी चिंता जताई गई है. 

भारत का कूटनीतिक दबाव: बयानों से आगे की राह

झांग की घटना के बाद भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने पाकिस्तानी उच्चायोग के समक्ष अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है. भारत हमेशा से ये कहता आया है कि पाकिस्तान अपने अल्पसंख्यकों और उनके मजहबी ठिकानों की सुरक्षा करने की अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता. 

वैसे ये पहला मौका नहीं है जब भारत न पाकिस्तान में सिखों पर होने वाले हमलों पर आधिकारिक विरोध दर्ज कराया है. 1947 से 2026 तक पड़ोसी मुल्क में सिखों पर होने वाले हमलों और उस पर भारत सरकार के आधिकारिक रुख की एक बानगी हम इस टेबल में देख सकते हैं.

मुख्य मुद्दा (Topic)विभाजन के वक्त (1947)मौजूदा जमीनी हकीकत (आज की स्थिति)मुख्य जिम्मेदार/वजह
ऐतिहासिक गुरुद्वारेसैकड़ों चालू गुरुद्वारे थे, जहां संगत जुटती थी और गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश होता था.महज कुछ दर्जन गुरुद्वारे ही चालू हालत में बचे हैं. बाकी खंडहर हो चुके हैं या ढहा दिए गए हैं.भू-माफिया और स्थानीय प्रशासन का गठजोड़. झांग जिले में 125 साल पुराना ढांचा गिराया गया.
धार्मिक संपत्तियांसिखों की अरबों रुपये की पुश्तैनी जमीनें, बाग और गुरुद्वारों के नाम रजिस्टर्ड कीमती जायदादें थीं.ज्यादातर कीमती जमीनों को कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के लिए अवैध तरीके से लीज पर दे दिया गया या बेच दिया गया.ETPB (इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड) के अफसरों और जमीन के धंधेबाजों का खेल.
सिखों की सुरक्षाखैबर पख्तूनख्वा (पेशावर) और पंजाब प्रांत के इलाकों में लाखों की संख्या में सिख सुरक्षित रहते थे.पिछले एक दशक से लगातार चरमपंथियों के निशाने पर हैं. सरेआम बाजार में गोलियों से भून दिया जाता है.चरमपंथी संगठनों द्वारा टारगेट किलिंग (जैसे चरनजीत सिंह, परमजीत सिंह और सतनाम सिंह की हत्या).
आबादी और बसावटविभाजन के बाद भी एक बड़ी आबादी अपने ऐतिहासिक ठिकानों और पुश्तैनी घरों में जमी हुई थी.ग्रामीण इलाकों से सिखों का पूरी तरह सफाया हो चुका है. जो बचे हैं, वो ननकाना साहिब या लाहौर जैसे शहरों में सिमटे हैं.जान-माल का बढ़ता हुआ खौफ, जबरन धर्म परिवर्तन और लगातार हो रहा पलायन (भारत, यूरोप और कनाडा).
भारत का स्टैंडद्विपक्षीय समझौतों के तहत दोनों देशों ने एक-दूसरे के अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों की रक्षा का वादा किया था.भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने पाकिस्तानी उच्चायोग के सामने हर बार बेहद सख्त कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया है.अब भारत केवल बयानों तक सीमित न रहकर संयुक्त राष्ट्र (UNHRC) और यूनेस्को (UNESCO) के जरिए दबाव बनाने की राह पर है.

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग (HRCP) की रिपोर्टों के मुताबिक, वहां गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों का वजूद मिटाना और संपत्तियों पर कब्जा करना एक ऐसा पैटर्न बन चुका है, जिसे रोकने में वहां की सरकारें नाकाम रही हैं.

लेकिन अब समय आ गया है कि भारत इस मामले को केवल द्विपक्षीय वार्ताओं तक सीमित न रखे. अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) और दुनिया भर के धार्मिक स्वतंत्रता संगठनों (जैसे USCIRF) के सामने पाकिस्तान के इस ढर्रे को मजबूती से रखना होगा. इसके साथ ही यूनेस्को (UNESCO) के जरिए पाकिस्तान में मौजूद सिख हेरिटेज साइट्स को अंतरराष्ट्रीय संरक्षण के दायरे में लाने के लिए कूटनीतिक दबाव बनाना बेहद जरूरी हो गया है ताकि कागजों पर चलने वाला ETPB का खेल हमेशा के लिए बंद हो सके.

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