हिंद महासागर (Indian Ocean) की गहराईयों से लेकर अरब सागर (Arebian Sea) के नीले पानी तक. इंडियन नेवी (Indian Navy) एक ऐसा सुरक्षा घेरा बनाने की तैयारी में है, जो ना सिर्फ भारत की समुद्री सीमाओं को सुरक्षित रखेगा. बल्कि हमारे ‘प्यारे पड़ोसियों’ बोले तो चीन (China) और पाकिस्तान (Pakistan) की 'जुगलबंदी' की भी हवा निकाल देगा. नौसेना के इस सुरक्षा कवच को 'प्रोजेक्ट-75 अल्फा' (Project-75 Alpha) नाम दिया गया है.
चीन की चाल और पाकिस्तान की ढाल, दोनों पर भारी पड़ेगा इंडियन नेवी का 'प्रोजेक्ट-75 अल्फा'
Indian Navy ने Strait of Malacca से लेकर Gwadar Port तक के समुद्री इलाके में चीन और पाकिस्तान की 'नौसैनिक जुगलबंदी' की काट तैयार कर ली है. इसके तहत इस पूरे क्षेत्र में 'न्यूक्लियर अटैक सबमरीन्स' का जाल बिछाया जाएगा. भारत के इस प्रोजेक्ट को नाम दिया गया है- 'प्रोजेक्ट-75 अल्फा'.


ये प्रोजेक्ट कोई आम सैन्य प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि समंदर में भारत की बादशाहत तय करने वाला गेम चेंजर प्लान है. 'प्रोजेक्ट-75 अल्फा' के तहत भारतीय नौसेना पूर्व में मल्लका जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) से लेकर पश्चिम में ग्वादर पोर्ट (Gwadar Port) तक न्यूक्लियर अटैक सबमरीन्स (Nuclear Attack Submarines) यानी परमाणु ऊर्जा से चलने वाले लड़ाकू पनडुब्बियों का जाल बिछाएगी.
रक्षा विशेषज्ञ डॉ डीके पाण्डेय के शब्दों में,
ये वही समुद्री इलाका है, जहां एक तरफ मल्लका की खाड़ी में चीन की नौसेना अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है. तो वहीं दूसरी तरफ ग्वादर पोर्ट पर पाकिस्तानी नेवी इंडिया को घेरने के मंसूबे पाल रही है. दोनों की ये जुगलबंदी भारत के लिए गंभीर खतरा हो सकती है.
तो चलिए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर ये 'प्रोजेक्ट-75 अल्फा' क्या है और क्यों ये चीन और पाकिस्तान की परेशानी का सबब बन गया है. साथ ही ये भी जानने की कोशिश करेंगे कि इस प्रोजेक्ट के पूरा हो जाने के बाद ड्रैगन के लिए हिंद महासागर में मनमानी करना कैसे नामुमकिन हो जाएगा.
क्या है ‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’?
समुद्री लड़ाई में जब सबमरीन्स की एंट्री हुई तो इसे गेम चेंजर माना गया. वजह थी इसका बिना किसी को नजर आए, समुद्र की गहराईयों से किसी भी बैटलशिप को निशाना बना लेने की खूबी. मगर परंपरागत तौर पर इस्तेमाल होने वाले डीजल या इलेक्ट्रिकल पनडुब्बियों के साथ एक बड़ी दिक्कत भी थी. अपनी बैटरियों को चार्ज करने के लिए 'सरफेसिंग' (Surfacing) करनी पड़ती है. आसान भाषा में कहें तो समंदर की गहराईयों से निकलकर पानी की सतह पर आना पड़ता है.
यहीं पर खेल पलट जाता है. सतह पर आने का मतलब है दुश्मन की नजर में आ जाना और आसान शिकार बन जाना. पहले तो खतरा सिर्फ सोनार और खुली आंखों से था. मगर अब इसमें सैटेलाइट्स और आधुनिक रडार भी जुड़ गए हैं.
यहीं पर एंट्री होती है न्यूक्लियर अटैक सबमरीन्स यानी एसएसएन (SSN) की. परमाणु पनडुब्बियों के अंदर एक छोटा न्यूक्लियर रिएक्टर लगा होता है. जिसकी वजह से इन सबमरीन्स को ऊर्जा के लिए किसी बाहरी फ्यूल या हवा की जरूरत नहीं होती. नतीजा ये होता है कि परमाणु पनडुब्बियां महीनों तक, पानी के भीतर बिना भनक लगे छिपी रह सकती हैं. बशर्ते सबमरीन के क्रू मेंबर्स के पास पर्याप्त खाना-पानी मौजूद हो.
इन सबमरीन्स की रफ्तार भी आम पनडुब्बियों से दोगुनी होती है और ये सागर के भीतर हजारों किलोमीटर का सफर तय कर सकती हैं. ‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ के तहत भारत ऐसी ही छह स्वदेशी न्यूक्लियर अटैक सबमरीन्स का निर्माण कर रहा है.
आगे बढ़ने से पहले ग्राफिक टेबल के जरिए ये समझ लेते हैं कि न्यूक्लियर सबमरीन, कैसे पुरानी सब मरीन्स से अलग हैं,
Note: AI की मदद से तैयार ग्राफिक्स, डाटा सोर्स- इंडियन नेवी
रक्षा मंत्रालय की ताजा गाइडलाइंस के मुताबिक, ‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ के तहत बनने वाली पनडुब्बियों का डिजाइन और तकनीक पूरी तरह से स्वदेशी होगी, जो 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को समंदर में मजबूती देगी.
चीन और पाकिस्तान की जुगलबंदी का मतलब
अब सवाल उठता है कि भारत को इतनी एडवांस मगर महंगी न्यूक्लियर सबमरीन की जरूरत ही क्यों पड़ी, जवाब है चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा. चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को विकसित किया. खबर है कि ड्रैन इस पाकिस्तानी पोर्ट का इस्तेमाल अपने नौसैनिक अड्डे के रूप में करने की फिराक में है. इसके अलावा, चीन ने अफ्रीका के जिबूती में अपना सैन्य बेस भी बना लिया है. साथ ही चीनी नौसेना की पनडुब्बियां अक्सर हिंद महासागर में रिसर्च जहाजों के बहाने चक्कर काटती रहती हैं.
रक्षा मंत्रालय (MoD) की साल 2026 की वार्षिक डिफेंस एक्विजिशन रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि चीन प्लान मलक्का जलडमरूमध्य से लेकर अरब सागर तक एक ऐसा जाल बिछाने की है, जिससे वह भारतीय नौसेना पर दबाव बना सके. रही बात हमारे दूसरे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की तो इंडियन नेवी का मुकाबला अपने दम पर करने की काबिलियत तो उसके पास है नहीं. लिहाजा वो भी जाकर चीन की गोद में जाकर बैठ गया है. चीन उसे आधुनिक युद्धपोत और पनडुब्बियां सप्लाई कर रहा है.
इस दोहरे खतरे से निपटने के लिए भारत को एक ऐसे ब्रह्मास्त्र की जरूरत थी, जो दोनों दुश्मनों पर एक साथ नजर रख सके और जरूरत पड़ने पर पलक झपकते ही हमला कर सके. यहीं पर ‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ की जरूरत महसूस होती है. रक्षा विशेषज्ञ डॉ डीके पाण्डेय इसे 'ऑफेंसिव डिफेंस' (Offensive Defense) का नाम देते हैं.
ग्वादर से मलक्का तक भारत का चक्रव्यूह
‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ के तहत बनने वाली न्यूक्लियर सबमरीन्स का मकसद होगा- दुश्मन पर नजर रखना और उसे रोकने की ताकत विकसित करना. ये पनडुब्बियां समंदर के उन संकरे रास्तों पर तैनात की जा सकती हैं, जहां से चीनी जहाजों और पनडुब्बियों को गुजरना पड़ता है, जैसे कि मलक्का स्ट्रेट. अगर कभी चीन के साथ भारत का तनाव बढ़ता है, तो वैसी स्थिति में भारत की न्यूक्लियर सबमरीन्स चीन के व्यापारिक और सैन्य जहाजों का रास्ता पूरी तरह से बंद कर सकती हैं.
रणनीतिक थिंक टैंक ‘इंडिया मैटर्स’ से जुड़े रोहित शर्मा कहते हैं कि जहां एक तरफ दूसरी तरफ ‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ से चीन पर लगाम कसेगी, वहीं दूसरी तरफ इस प्रोजेक्ट के तरत बनने वाली पनडुब्बियां, अरब सागर में पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के पास तैनात रहकर उसकी हर गतिविधि को ठप कर सकती हैं. रोहित आगे कहते हैं,
अब चूंकि ये पनडुब्बियां पानी के नीचे बेहद शांत रहती हैं, इसलिए दुश्मन को आखिरी वक्त तक पता नहीं चलेगा कि उनकी मौत उनके ठीक नीचे तैर रही है. ना किसी रडार से और ना ही सोनार से.
रोहित का मानना है कि इंडियन नेवी की इस ताकत से चीन इसलिए भी डरा हुआ है क्योंकि उस समुद्री इलाके भौगोलिक स्थिति के चलते इंडियन नेवी को एडवांटेज हासिल है.

भारत की पनडुब्बी ताकत का इतिहास और भविष्य
भारत के पास पहले से ही परमाणु पनडुब्बियां हैं, लेकिन वे एसएसबीएन (SSBN) श्रेणी की हैं, जैसे आईएनएस अरिहंत. एसएसबीएन का मुख्य काम परमाणु मिसाइलें ले जाना और भारत पर परमाणु हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई करना होता है. ये पनडुब्बियां रणनीतिक होती हैं और आमतौर पर छिपी रहती हैं.
इसके विपरीत, ‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ के तहत बनने वाली एसएसएन (SSN) पनडुब्बियां आक्रामक लड़ाकू होती हैं. इनका काम दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों का शिकार करना होता है.
रक्षा मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक इस प्रोजेक्ट की शुरुआत काफी पहले हो गई थी, लेकिन साल 2026 की रिपोर्ट बताती है कि अब इसके डिजाइन और शुरुआती बजट को लेकर मंजूरी की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. विशाखापट्टनम के शिप बिल्डिंग सेंटर में इन पनडुब्बियों के निर्माण की तैयारी चल रही है.
माना जा रहा है कि अगले कुछ वर्षों में पहली स्वदेशी एसएसएन पानी में उतरने के लिए तैयार हो जाएगी. इसके साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिनके पास खुद की न्यूक्लियर अटैक सबमरीन बनाने की क्षमता है.
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‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ का भारत और दुनिया पर असर
‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ का असर दो तरीके से होगा. शॉर्ट टर्म में देखें तो इस प्रोजेक्ट के पूरी तरह एक्टिवेट हो जाने के बाद चीन, हिंद महासागर में कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले दस बार सोचेगा. भारतीय नौसेना से रिटायर्ड चीफ पेटी ऑफिसर श्रीनिवास सिंह का मानना है कि,
भारत की इस बढ़ती ताकत से अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देश भी खुश हैं, जो क्वाड (QUAD) संगठन के जरिए चीन के बढ़ते असर को रोकना चाहते हैं. भारत इस क्षेत्र में एक 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' के रोल में आ जाएगा.
वही अगर लॉन्ग टर्म की बात करें तो ‘प्रोजेक्ट-75 अल्फा’ रक्षा क्षेत्र में भारत को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाएगा. इससे भारत के भीतर भारी उद्योगों, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स और न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हजारों नौकरियां पैदा होंगी और रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा. सबसे बड़ी बात ये है कि समंदर में भारत की पोजिसन इतनी मजबूत हो जाएगी कि कोई भी पड़ोसी देश हमारी समुद्री सीमाओं की तरफ आंख उठाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा.
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