भारत की कृषि निर्यात कहानी में एक ऐसा प्रोडक्ट तेजी से आगे बढ़ रहा है, जिसकी चर्चा आम तौर पर चावल, मसाले, समुद्री उत्पाद या कॉफी के साथ होती है. ये है भैंस का मांस, जिसे इंटरनेशनल मार्केट में ‘कैराबीफ़’ (carabeef) के नाम से भी जाना जाता है. 2025-26 में भारत से भैंस के मांस का निर्यात करीब 5.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया. रिपोर्ट के मुताबिक, सालाना आधार पर इसमें 25.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
'भैंस के मांस' ने भारत को दिलाए 5 अरब डॉलर, रूस से मिस्र तक बढ़ी डिमांड, किसानों को कितना फायदा?
India’s Buffalo Meat Exports Cross $5 Billion: भारत का buffalo meat export 2025-26 में करीब 48 हजरा करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. नए बाजारों, बेहतर प्रति टन कीमत, APEDA के quality standards और retail expansion ने इस कारोबार को नई रफ्तार दी है. इसका फायदा पुराने और कम उत्पादक buffaloes की बिक्री के जरिए dairy farmers को भी मिल सकता है.

2024-25 में APEDA के आंकड़ों के मुताबिक भारत ने 12.55 लाख टन ‘भैंस के मांस से बने उत्पाद’ (buffalo meat products) का निर्यात किया था, जिसकी कीमत 4.06 अरब डॉलर (करीब 38,865 करोड़ रुपये) रही. APEDA के मुताबिक ‘भैंस का मांस’ (buffalo meat) अकेले भारत के ‘पशु उत्पादों के निर्यात’ (animal products exports) का करीब 79.4 फीसदी हिस्सा था.
यानी कहानी सिर्फ मांस के ज्यादा कंटेनर विदेश भेजने की नहीं है. असली बदलाव इसकी कीमत में भी दिखाई दे रहा है.
अप्रैल-जून में एक्सपोर्ट 66 फीसदी से ज्यादा बढ़ा
2026-27 की शुरुआत ने भी इस सेक्टर को मजबूत संकेत दिए हैं. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून 2026 के दौरान भैंस के मांस का निर्यात करीब 1.5 अरब डॉलर (14.36 हजार करोड़ रुपये) रहा. जबकि अप्रैल-जून 2025 में ये आंकड़ा 896.8 मिलियन डॉलर (करीब 8.5 हजार करोड़ रुपये) था. यानी करीब 66.6 फीसदी की छलांग.
कॉमर्स मिनिस्ट्री के एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत पहली बार 5 अरब डॉलर (47.86 हजार करोड़ रुपये) के स्तर को पार कर चुका है और मौजूदा रफ्तार बनी रही तो 2026-27 में बफेलो मीट एक्सपोर्ट 6 अरब डॉलर (करीब 57.43 हजार करोड़ रुपये) से ऊपर जा सकते हैं.
‘भैंस के मांस’ और ‘बीफ इकॉनमी’ पर ‘इंडिया टुडे’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में भारत ने करीब 13 लाख टन buffalo meat export किया और इसमें उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 60 फीसदी से ज्यादा थी.
ज्यादा माल नहीं, ज्यादा कीमत भी मिल रही है
इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा प्रति टन निर्यात मूल्य है. 2014-15 में भारत ने करीब 14.8 लाख टन बफेलो मीट एक्सपोर्ट किया था और इसकी कुल कीमत करीब 4.8 अरब डॉलर (45.95 हजार करोड़ रुपये) थी. तब औसत कीमत करीब 3,240 डॉलर (लगभग 3 लाख 10 हजार रुपये) प्रति टन बैठती थी.
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक इसके बाद कई साल तक एक्सपोर्ट वॉल्यूम और वैल्यू दोनों कमजोर रहे. 2023-24 तक प्रति टन औसत वसूली करीब 2,700 से 3,000 डॉलर (करीब 2.58 लाख से 2.87 लाख रुपये) के स्तर तक आ गया था.
लेकिन 2024-25 से तस्वीर बदलने लगी. उस साल निर्यात मूल्य करीब 4.1 अरब डॉलर (करीब 39.25 हजार करोड़ रुपये) रही. जबकि यूनिट वैल्यू करीब 3,236 डॉलर (लगभग 3 लाख 10 हजार रुपये) प्रति टन पहुंच गई. 2025-26 में ये बढ़कर करीब 3,591 डॉलर (लगभग 3 लाख 44 हजार रुपये) प्रति टन हो गई. अप्रैल-जून 2026 में औसत वसूली करीब 4,392 डॉलर (लगभग 4 लाख 20 हजार रुपये) प्रति टन बताया गया है.
यानी भारत अब सिर्फ सस्ता बफेलो मीटि बेचकर वॉल्यूम गेम नहीं खेल रहा. प्रोडक्ट क्वालिटी, प्रोसेसिंग, हाइजिन और नए बाजार की वजह से भारतीय मीट को ज्यादा कीमत मिलने लगी है.
APEDA की मंजूरी और क्वालिटी कंट्रोल बना बड़ा फैक्टर
इस बदलाव में APEDA की भूमिका अहम है. एक्सपोर्ट के लिए मीट प्रोसेसिंग प्लांट और बूचड़खानों को निर्धारित मानकों को पूरा करना होता है. APEDA की मौजूदा वेबसाइट पर जुलाई 2026 में ‘रजिस्टर्ड इंटीग्रेटेड बूचड़खाने और प्रोसेसिंग प्लांट’ (registered integrated abattoirs-cum-meat processing plants), स्वतंत्र स्लाटर हाउस (standalone abattoirs) और मीट प्रोसेसिंग प्लांट की अपडेटेड लिस्ट मौजूद है.
APEDA के आधिकारिक रेड मीट मैन्युअल के मुताबिक एक्सपोर्ट के लिए बफेलो मीटि को निर्धारित नियमों के तहत रजिस्टर्ड बूचड़खानों और प्रोसेसिंग प्लांट से सोर्स किया जाना चाहिए. प्लांट्स में इंफ्रास्ट्रचर, हाईजिन, लेबोरेट्री सुविधा, रिकॉर्ड रखने और पशु वध से पहले होने वाली जांच (ante-mortem) तथा पोस्ट मार्टम (post-mortem inspection) जैसी व्यवस्थाओं की जांच की जाती है. निर्यात की खेप (Export consignments) के लिए हेल्थ और माइक्रोबायलॉजिक जरूरतें भी लागू हैं.
यही वजह है कि भारतीय बफेलो मीट की इंटरनेशनल मांग बढ़ने की बात कही जा रही है. रिपोर्ट में एक्सपोर्ट्रस एसोसिएशन के हवाले से कहा गया है कि पहले भारतीय बफेलो मीट और ब्राजीलियन बीफ के बीच कीमत का अंतर करीब 2,000 डॉलर (लगभग 1 लाख 91 हजार रुपये) प्रति टन तक था, जो अब घटकर करीब 500-700 डॉलर (करीब 47 से 67 हजार रुपये) प्रति टन रह गया है.
वियतनाम पर निर्भरता घटी, नए बाजार खुले
एक और बड़ा बदलाव उन देशों में आया है, जहां मीट एक्सपोर्ट किया जाता है, आसान भाषा में कहें तो एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन. 2014-15 में भारत के बफेलो मीट एक्सपोर्ट का करीब 45 फीसदी अकेले वियतनाम जाता था. उस समय वियतनाम को करीब 2.2 अरब डॉलर (लगभग 21.06 हजार करोड़ रुपये) का बफेलो मीटि एक्सपोर्ट हुआ था.
2025-26 में तस्वीर काफी विविधतापूर्ण (diversified) हो चुकी है. रिपोर्ट के अनुसार वियतनाम करीब 933.9 मिलियन डॉलर (करीब 8,940.22 करोड़ रुपये) के साथ सबसे बड़ा बाजार रहा. इसके बाद मिस्र (Egypt) 725 मिलियन डॉलर (करीब 6.94 हजार करोड़ रुपये), मलेशिया 654.1 मिलियन डॉलर (करीब 6.26 हजार करोड़ रुपये), यूएई 444.2 मिलियन डॉलर (करीब 4.25 हजार करोड़ रुपये), सऊदी अरब 359.3 मिलियन डॉलर (करीब 3.44 हजार करोड़ रुपये), उज्बेकिस्तान 307 मिलियन डॉलर (करीब 2.94 हजार करोड़ रुपये), इंडोनेशिया 301.3 मिलियन डॉलर (करीब 2.88 हजार करोड़ रुपये) और इराक 300.1 मिलियन डॉलर (करीब 2.87 हजार करोड़ रुपये) रहे.
इसके अलावा फिलीपिंस, जॉर्डन, रूस, जॉर्जिया, ओमान और सेनेगल जैसे बाजार भी भारतीय बफेलो मीट के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.
APEDA के 2024-25 आंकड़ों में भी वियतनाम, मिस्र, मलेशिया, इराक और सऊदी अरब प्रमुख डेस्टिनेशन के रूप में सामने आते हैं.
यानी अब भारत का निर्यात कारोबार किसी एक देश पर टिके रहने के बजाय कई बाजारों में फैल रहा है. यही किसी भी एक्सपोर्ट कमोडिटी के लिए बड़ा रणनीतिक फायदा होता है.
थोक बाजारों की जगह खुदरा मार्केट पर नजर
इंडियन बफेलो मीट का बड़ा हिस्सा अभी प्रोसेस्ड फूड इंडस्ट्री में इस्तेमाल होता है. सॉसेज (Sausages), बर्गर पैटी (burger patties), नगेट (nuggets), डिब्बाबंद उत्पाद और रेडी टू ईट फूड जैसे सेगमेंट में इसकी मांग हैं.
लेकिन निर्यातक अब वैल्यू एडीशन पर ज्यादा जोर दे रहे हैं. 20-30 किलो के थोक फ्रोजेन ब्लॉक के बजाय 1 किलो या उससे छोटे कंज्यूमर पैकेज में रीटेल सेल बढ़ाने की कोशिश हो रही है.
अगर ये रणनीति कामयाब होती है तो एक्सपोर्ट वैल्यू सिर्फ वॉल्यूम बढ़ने से नहीं, बल्कि पैकेजिंग, ब्रांडिंग और कंज्यूमर लेवल की कीमतों से भी बढ़ सकती है.
APEDA ने फ्रोजेन और ठंडे बफेलो मीट एक्सपोर्ट पर प्रति टन 250 रुपये लेवी लगाने की व्यवस्था की है, जिससे ‘मीट एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फंड’ बनाने का उद्देश्य रखा गया है. इस फंड का इस्तेमाल नए बाजारों में प्रमोशन, ट्रेड डेलीगेशन, बायल-सेलर मीट और नॉन टैरिफ बैरियर से जुड़े मुद्दों पर काम करने के लिए किया जाना है.

इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू है डेयरी किसान
बफेलो मीटि एक्सपोर्ट की कहानी को सिर्फ मीट उद्योग की कहानी मानना अधूरा होगा. इसका सीधा संबंध डेयरी अर्थव्यवस्था से भी है.
भारत में काउ मीट का एक्सपोर्ट नहीं होता. एक्सपोर्ट पॉलिसी के तहत बोनलेस बफेलो मीट (boneless buffalo meat) को निर्धारित शर्तों के साथ निर्यात की अनुमति है. APEDA के दस्तावेज भी बताते हैं कि गाय, बैल और बछड़े के बीफ का निर्यात प्रतिबंधित यानी बैन है. जबकि बोनलेस बफेलो मीट को निर्धारित अनुपालन (compliance) के साथ एक्सपोर्ट किया जा सकता है.
डेयरी किसान के लिए पुरानी, कम दूध देने वाली या दूध उत्पादन की क्षमता खो चुकी भैसों को लंबे समय तक रखना महंगा पड़ सकता है. चारा, पानी और श्रम लगातार खर्च होता है. ऐसे में पुराने पशु की बिक्री से मिलने वाली रकम नई और ज्यादा दूध देने वाली भैंस खरीदने में मदद कर सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक 400 किलो वजन वाली भैंस से औसतन करीब 190 किलो वजन का बीफ मिल सकता है. उत्तर प्रदेश में प्लांट पर बीफ के वजन के हिसाब से 300-320 रुपये प्रति किलो के आसपास का भाव बताया गया है. इस हिसाब से एक 400 किलो वजन की भैंस की कीमत करीब 57,000 से 60,800 रुपये तक बैठ सकती है.
अगर कोई किसान 50,000 रुपये के आसपास पुरानी भैंस बेच पाता है और उस रकम से नई दुधारू भैंस खरीदने की लागत का करीब एक-तिहाई जुट जाता है.
हार्ड फैट मिल्क की बढ़ती मांग से बफेलो इकॉनमी को सहारा
भारत में ‘हार्ड फैट मिल्क’ (high-fat milk) की मांग भी बढ़ रही है. घी, क्रीम, पनीर, आइसक्रीम और खोये से बनी मिटाईयों में ज्यादा फैट वाले दूध की जरूरत होती है. भैंस का दूध इस सेगमेंट में अहम भूमिका निभाता है.
यही वजह है कि बफेलो इकॉनमी का रिश्ता सिर्फ मीट एक्सपोर्ट से नहीं है. एक तरफ दुधारू भैंसों से दूध मिलता है, दूसरी तरफ जब उसका प्रोडक्टिव सायकिल खत्म होती है तो रेगुलेटेड मीट इंडस्ट्री (regulated meat industry) के जरिए किसान को उसकी आर्थिक वैल्यू मिल सकती है.
असली चुनौती अब पॉलिसी स्टेबिलिटी की
निर्यातकों की सबसे बड़ी मांग नीतियों के पूर्वानुमान यानी policy predictability की है. मीट उद्योग का तर्क है कि जिन प्लांट्स ने APEDA की जरूरी शर्तें पूरी की है, उन्हें ‘नियामक अनिश्चितता’ बोले तो regulatory uncertainty से बचाया जाना चाहिए.
उत्तर प्रदेश में कुछ मीट प्रोसेसिंग यूनिट के बंद होने का जिक्र भी रिपोर्ट में किया गया है. इंडस्ट्री का कहना है कि गैकानूनी बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई का वो समर्थन करते हैं, लेकिन लाइसेंस वाली और नियमों का पालन करने वाली निर्यात इकाइयों के साथ स्पष्टता और स्थिरता जरूरी है.
आखिर में तस्वीर काफी साफ है. भारत का बफेलो मीट एक्सपोर्ट अब सिर्फ एक लो-कास्ट कमोडिटी एक्सपोर्ट वाली कहानी नहीं रह गया है. नए बाजार, बेहतर प्रति यूनिट रिटर्न, प्रोसेसिंग के कड़े मानकों, रीटेल पैकेजिंग और डेयरी किसानों के लिए पुराने पशुओं की आर्थिक वैल्यू, इन सबने मिलकर इसे एक बड़ा कृषि निर्यात उद्योग बना दिया है.
APEDA के आंकड़े भी बताते हैं कि बफेलो मीट पहले से ही भारत के पशु उत्पादों के निर्यात से जुड़े सेगमेंट का सबसे बड़ा हिस्सा है.
अगर 2026-27 में निर्यात वास्तव में 6 अरब डॉलर के पार जाता है, तो ये भारत के कृषि निर्यात के लिए एक और बड़ा मील का पत्थर होगा. लेकिन इस ग्रोथ को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए गुणवत्ता मानकों, पता लगाने की क्षमता (traceability), बाजार के विविधता (market diversification) और सबसे बढ़कर ‘स्थिर नीतियों वाला माहौल’ (stable policy environment) जरूरी होगा.
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