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भारत 2047 तक बढ़ाना चाहता है अपनी न्यूक्लियर पावर, लेकिन सबसे बड़ी अड़चन रिएक्टर नहीं, लोग हैं?

India Nuclear Power: भारत की परमाणु बिजली क्षमता 8.8 GW से बढ़कर 100 GW करने की तैयारी में है. इसके लिए करीब 210 अरब डॉलर, यानी लगभग 17 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश के साथ बड़ी संख्या में प्रशिक्षित वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों की जरूरत होगी.

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100 GW का मतलब आखिर कितना बड़ा लक्ष्य है? (फोटो-AI)

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  • भारत सरकार ने 2047 तक देश की परमाणु बिजली क्षमता को वर्तमान 8.78 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करने का लक्ष्य रखा है, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भागीदारी शामिल है।
  • ऊर्जा मांग में वृद्धि और नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने परमाणु ऊर्जा को बिजली उत्पादन का स्थायी और कम कार्बन वाला स्रोत बनाने का निर्णय लिया है।
  • 100 गीगावाट की क्षमता प्राप्त करने के लिए 210 अरब डॉलर का निवेश, प्रशिक्षित मानव संसाधन, तकनीकी और नियामक ढांचे की आवश्यकता है, साथ ही समय पर परियोजनाओं के पूरा होने पर भी निर्भरता है।

भारत अगर 2047 तक विकसित देश बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को ऊर्जा के मोर्चे पर भी हासिल करना चाहता है, तो सिर्फ सौर पैनल और पवन चक्कियां काफी नहीं होंगी. बिजली की मांग बढ़ेगी, उद्योग बढ़ेंगे, डेटा सेंटर बढ़ेंगे, इलेक्ट्रिक वाहन बढ़ेंगे और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी नई जरूरतें भी पैदा होंगी. ऐसे में सरकार अब परमाणु ऊर्जा को बिजली व्यवस्था के एक बड़े और भरोसेमंद आधार के तौर पर देख रही है.

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सरकार ने 2047 तक देश की परमाणु बिजली क्षमता को 100 गीगावाट तक ले जाने का लक्ष्य रखा है. आज की स्थापित क्षमता 8.78 गीगावाट है. यानी करीब 21 साल में क्षमता को 11 गुना से ज्यादा बढ़ाना होगा. जुलाई 2026 में सरकार ने संसद में बताया कि मौजूदा परियोजनाओं के पूरा होने के बाद 2031-32 तक क्षमता करीब 22 गीगावाट पहुंच सकती है.

अभी भारत कितनी परमाणु बिजली बनाता है?

अभी परमाणु ऊर्जा भारत की कुल बिजली में बहुत बड़ा हिस्सा नहीं रखती. वित्त वर्ष 2024-25 में देश की कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 3.1 फीसदी रही. उस साल परमाणु संयंत्रों ने 56,681 मिलियन यूनिट बिजली पैदा की.

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यहीं से 100 GW का लक्ष्य समझ आता है. सरकार सिर्फ कुछ नए रिएक्टर लगाने की बात नहीं कर रही. पूरा मकसद परमाणु ऊर्जा को देश के बिजली तंत्र का कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना है.

100 GW का मतलब आखिर कितना बड़ा लक्ष्य है?

इसे ऐसे समझिए. भारत के पास आज करीब 8.78 GW की स्थापित परमाणु क्षमता है. लक्ष्य 100 GW है. यानी करीब 91 GW की नई क्षमता जोड़नी होगी.

सरकारी रोडमैप के मुताबिक 2031-32 तक मौजूदा परियोजनाओं के पूरा होने से क्षमता करीब 22 GW हो सकती है. इसके बाद NPCIL यानी न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की तरफ से 32 GW और जोड़े जाने की योजना है. इससे NPCIL की कुल क्षमता करीब 54 GW तक पहुंच सकती है. बाकी 46 GW दूसरी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों, राज्य सरकारों, निजी क्षेत्र और संयुक्त उपक्रमों से आने की परिकल्पना की गई है.

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यानी 100 GW का लक्ष्य सिर्फ सरकार के मौजूदा परमाणु प्रतिष्ठानों को बड़ा करने से हासिल नहीं होगा. इसके लिए निजी पूंजी, नई कंपनियां, नई तकनीक और बड़ा औद्योगिक ढांचा भी चाहिए.

परमाणु रिएक्टर बिजली बनाता कैसे है?

परमाणु बिजलीघर का मूल विचार सुनने में बहुत हाईटेक लगता है, लेकिन बिजली बनाने की प्रक्रिया काफी हद तक पारंपरिक ताप बिजलीघर जैसी है.

रिएक्टर में परमाणु विखंडन यानी फिशन (Fission) कराया जाता है. इसमें परमाणु ईंधन से बड़ी मात्रा में गर्मी निकलती है. ये गर्मी पानी को गर्म करके भाप बनाती है. भाप टरबाइन घुमाती है और टरबाइन जनरेटर को घुमाकर बिजली बनाता है.

फर्क ये है कि कोयला बिजलीघर में पानी गर्म करने के लिए कोयला जलाया जाता है, जबकि परमाणु बिजलीघर में परमाणु ईंधन से निकलने वाली गर्मी इस्तेमाल होती है.

फिर कोयले की जगह परमाणु ऊर्जा क्यों?

परमाणु ऊर्जा की सबसे बड़ी ताकत ये है कि संयंत्र मौसम पर निर्भर नहीं होता. सूरज नहीं निकले तो सौर बिजली का उत्पादन घटता है. हवा धीमी हो तो पवन ऊर्जा घटती है. परमाणु संयंत्र लंबे समय तक लगातार बिजली देने वाले आधारभूत स्रोत के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

दूसरी तरफ कोयले पर आधारित बिजली लगातार चल सकती है, लेकिन उसमें कोयले की खपत और कार्बन उत्सर्जन की समस्या है. भारत ने 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य भी रखा है. इसी वजह से सरकार परमाणु ऊर्जा को कम कार्बन वाली लगातार उपलब्ध बिजली के स्रोत के रूप में देख रही है.

इसका मतलब ये नहीं कि परमाणु ऊर्जा सौर और पवन ऊर्जा की जगह लेगी. असल रणनीति इन सभी स्रोतों को साथ लेकर चलने की है. सौर और पवन ऊर्जा तेजी से बढ़ेंगी, जबकि परमाणु ऊर्जा लगातार बिजली उपलब्ध कराने वाले स्रोत की भूमिका निभा सकती है.

सबसे बड़ा सवाल पैसा है

100 GW परमाणु क्षमता बनाना बेहद महंगा काम है. 2 सितंबर 2026 की Reuters रिपोर्ट के मुताबिक भारत को इस विस्तार के लिए करीब 210 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत का अनुमान है. इसे रुपये में देखें तो ये 17 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि बैठती है, हालांकि वास्तविक रुपया मूल्य विनिमय दर पर निर्भर करेगा.

इतना पैसा जुटाना अपने आप में बड़ी चुनौती है. NITI Aayog और उद्योग जगत का कहना है कि परमाणु ऊर्जा को हरित वित्त की मौजूदा व्यवस्था में जगह मिलने से निवेश जुटाना आसान हो सकता है. फिलहाल कुछ प्रमुख हरित वित्त ढांचे परमाणु परियोजनाओं को उसी तरह शामिल नहीं करते जैसे दूसरे कम कार्बन वाले ऊर्जा स्रोतों को किया जाता है.

लेकिन पैसा ही अकेली अड़चन नहीं है

Reuters की रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प हिस्सा यहीं है. इतनी बड़ी संख्या में परमाणु संयंत्र बनाने के लिए सिर्फ पैसा और जमीन नहीं चाहिए. प्रशिक्षित लोगों की भी जरूरत होगी.

परमाणु क्षेत्र में सामान्य इंजीनियरिंग से अलग विशेषज्ञता चाहिए. रिएक्टर डिजाइन, परमाणु सुरक्षा, विकिरण सुरक्षा, ईंधन चक्र, संचालन, रखरखाव और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होती है.

Reuters के मुताबिक उद्योग जगत ने परमाणु क्षेत्र में प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी को चुनौती बताया है. NITI Aayog ने भी परमाणु क्षेत्र में तकनीकी भूमिकाओं से लेकर अनुसंधान एवं विकास तक विशेषज्ञता तैयार करने के लिए समिति बनाई है. फ्रांस की EDF भारतीय कंपनियों और विक्रेताओं के साथ प्रशिक्षण और प्रमाणन कार्यक्रम भी चला रही है.

यानी 100 GW की कहानी सिर्फ रिएक्टर बनाने की कहानी नहीं है. ये इंसानी पूंजी बनाने की भी कहानी है.

निजी कंपनियों की एंट्री से क्या बदलेगा?

भारत ने परमाणु क्षेत्र में निजी भागीदारी का रास्ता खोलने के लिए SHANTI Act, 2025 बनाया है. इसके तहत लाइसेंस और सुरक्षा मंजूरी की व्यवस्था के साथ निजी क्षेत्र को परमाणु सुविधाओं की स्थापना और संचालन जैसे क्षेत्रों में भाग लेने का रास्ता मिला है.

सरकार की योजना बड़े 700 MW के स्वदेशी PHWR यानी प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर के साथ बड़े उन्नत रिएक्टर और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR पर भी काम करने की है. कम से कम पांच स्वदेशी SMR को 2033 तक विकसित और संचालित करने का लक्ष्य रखा गया है.

लेकिन निजी कंपनियों के आने का मतलब ये नहीं कि परमाणु सुरक्षा के नियम ढीले होंगे. AERB यानी परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड सुरक्षा की निगरानी करता है. SHANTI Act ने नियामक ढांचे को और मजबूत करने की व्यवस्था की है.

परमाणु कचरे और सुरक्षा का क्या होगा?

परमाणु ऊर्जा की चर्चा कचरे और दुर्घटना के सवाल के बिना अधूरी है. परमाणु संयंत्रों से रेडियोधर्मी कचरा निकलता है और इसे सामान्य औद्योगिक कचरे की तरह नहीं संभाला जा सकता.

भारत में रेडियोधर्मी कचरे के प्रबंधन पर AERB की निगरानी रहती है. कम स्तर के ठोस, तरल और गैसीय कचरे के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं हैं. इस्तेमाल किए गए ईंधन के मामले में भारत बंद ईंधन चक्र की नीति अपनाता है, जिसमें ईंधन को दोबारा संसाधित करके उपयोगी सामग्री को वापस इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है.

सुरक्षा के मामले में भी परमाणु संयंत्रों की स्थापना, निर्माण, संचालन और कचरा प्रबंधन पर नियामकीय निगरानी होती है. लेकिन 100 GW की महत्वाकांक्षा के साथ सुरक्षा को लेकर जनता का भरोसा बनाए रखना उतना ही जरूरी होगा जितना रिएक्टर बनाना.

तो क्या 2047 तक 100 GW संभव है?

कागज पर इसका रोडमैप मौजूद है. सरकार ने 2031-32 तक करीब 22 GW और 2047 तक 100 GW का रास्ता बताया है. लेकिन परमाणु परियोजनाओं में समय बहुत महत्वपूर्ण है. सरकार के मुताबिक एक परमाणु परियोजना की निर्माण अवधि आम तौर पर 10 से 12 साल तक हो सकती है.

इसलिए 2047 का लक्ष्य हासिल करने के लिए जमीन, मंजूरी, वित्त, तकनीक, निर्माण क्षमता, ईंधन, आपूर्ति श्रृंखला और प्रशिक्षित मानव संसाधन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा.

यही इस पूरी कहानी का असली सवाल है. भारत के सामने चुनौती सिर्फ ये नहीं है कि वो 100 GW के रिएक्टर बना सकता है या नहीं. सवाल ये है कि क्या भारत 100 GW के परमाणु कार्यक्रम को संभालने लायक पैसा, तकनीक, उद्योग और प्रशिक्षित लोग एक साथ तैयार कर सकता है.

अगर इसका जवाब हां है, तो 2047 की भारतीय बिजली व्यवस्था में परमाणु ऊर्जा आज के मुकाबले बिल्कुल अलग भूमिका में दिखाई दे सकती है. और अगर इनमें से किसी एक कड़ी में बड़ी कमी रह गई, तो 100 GW का लक्ष्य कागज पर बड़ा दिखेगा, जमीन पर उतना नहीं.

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