‘मैं बाहर से सरदार हूं, लेकिन ऊर्जा के मामले में बनिया हूं.’ ये शब्द हैं केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के. यहां उन्होंने ऊर्जा के मामले में बनिया हूं कहकर जिस बात पर जोर दिया, वो है तेल खरीदने में देश का आर्थिक हित.
'सरदार' हरदीप सिंह पुरी ने खुद को बताया 'बनिया', वजह तेल है
27 अक्टूबर को गोवा में 29वें एनर्जी टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन मीट का आयोजन हुआ. इस कार्यक्रम में हरदीप सिंह पुरी भारत की ऊर्जा जरूरतों और तेल खरीदने की रणनीति पर बात कर रहे थे. इसी दौरान रूसी कच्चे तेल का जिक्र आया.

27 अक्टूबर को गोवा में 29वें एनर्जी टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन मीट का आयोजन हुआ. इस कार्यक्रम में हरदीप सिंह पुरी भारत की ऊर्जा जरूरतों और तेल खरीदने की रणनीति पर बात कर रहे थे. इसी दौरान रूसी कच्चे तेल का जिक्र आया.
कार्यक्रम में पुरी ने सुनाया किस्सारूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस की कमाई सीमित करने के लिए कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए. रूसी तेल की कीमत पर प्राइस कैप लगाने की व्यवस्था भी इसी रणनीति का हिस्सा थी. लेकिन भारत के सामने सवाल था कि उसे अपनी ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी करनी हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध तेल में से कौन-सा ऑप्शन आर्थिक रूप से बेहतर है.
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल की कीमत में होने वाला बदलाव देश के आयात बिल, अर्थव्यवस्था और आम लोगों की ऊर्जा लागत पर असर डाल सकता है. भारत ने रूसी तेल खरीदने के फैसले को भी अपनी जरूरतों और व्यावसायिक हितों के नजरिये से देखा.
हरदीप सिंह पुरी ने कार्यक्रम में एक अमेरिकी सहयोगी से हुई बातचीत का किस्सा सुनाया. उनके मुताबिक, उस अमेरिकी व्यक्ति ने उनसे कहा था कि अगर कम कीमत पर तेल खरीदने का मौका मिल रहा है, तो उसे गंवाना नहीं चाहिए.
मतलब पुरी समझाना चाह रहे थे कि तेल खरीदने के मामले में सिर्फ ये नहीं देखना चाहिए कि तेल किस देश से आ रहा है, ये भी देखना चाहिए कि किस कीमत पर मिल रहा है. उससे देश के हितों को कितना फायदा हो रहा है. उनका आशय अपनी खरीद रणनीति को व्यावसायिक नजरिये से समझाना था. इसी कड़ी में उन्होंने 'बनिया' वाली बात कही.
पुरी ने ये भी कहा कि भारत को रूस से तेल खरीदने के मामले में किसी अमेरिकी दबाव का सामना नहीं करना पड़ा. उनका जोर इस बात पर था कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर फैसले करता है.
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इसका मतलब ये नहीं है कि भारत के सामने कोई अंतरराष्ट्रीय चुनौती नहीं रही. रूसी तेल की खरीद को लेकर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध, संभावित टैरिफ और वैश्विक बाजार की परिस्थितियां लगातार चर्चा में रही हैं. लेकिन भारत का आधिकारिक तर्क यही रहा है कि ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं को किफायती कीमत पर ऊर्जा उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है.
इस बहस का सीधा रिश्ता आम लोगों से भी है. कच्चे तेल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले बदलाव का असर पेट्रोलियम उत्पादों की लागत पर पड़ सकता है. इसलिए भारत के लिए तेल कहां से खरीदना है, ये सिर्फ विदेश नीति का सवाल नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था से जुड़ा फैसला भी है.
इसी कार्यक्रम में पुरी ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अलग-अलग स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाने, घरेलू तेल और गैस की खोज को मजबूत करने और नई तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया. यानी एक तरफ भारत की मौजूदा जरूरत है कि उसे पर्याप्त और किफायती तेल मिले, तो दूसरी तरफ भविष्य की चुनौती है कि ऊर्जा के दूसरे विकल्प भी विकसित किए जाएं.
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