'CJI के पास जरूरत से ज्यादा शक्तियां होने के कारण लोग उन्हें हीरो की तरह पूजने लगते हैं.' ये कहना है सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एस ओका का. मंगलवार, 27 अक्टूबर को जस्टिस ओका 'कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स' (CJAR) की ओर से आयोजित एक सेमिनार पहुंचे थे.
'CJI को लोग हीरो की तरह पूजते हैं', पूर्व SC जज ने आंबेडकर का नाम लेकर 'चेताया'
'जजों की जवाबदेही' नाम के एक सेमिनार में जस्टिस ओका ने कहा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पद पर बहुत ज्यादा शक्तियां होने की वजह से लोग उनकी जरूरत से ज्यादा प्रशंसा करते हैं. लोगों के अंदर भक्ति का भाव पैदा होता है.

'जजों की जवाबदेही' नाम के इस सेमिनार में जस्टिस ओका ने कहा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पद पर बहुत ज्यादा शक्तियां होने की वजह से लोग उनकी जरूरत से ज्यादा प्रशंसा करते हैं. लोगों के अंदर भक्ति का भाव पैदा होता है.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस ओका ने कहा,
'सुप्रीम कोर्ट को देखिए. वहां ज्यादातर प्रशासनिक फैसले भारत के मुख्य न्यायाधीश लेते हैं. मतलब सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर प्रशासनिक कामों पर CJI का ही कंट्रोल होता है. उनके पास इतनी ज्यादा शक्तियां होने की वजह से कई बार लोग उन्हें जरूरत से ज्यादा महत्व देने लगते हैं. उनकी छवि को एक हीरो की तरह पेश करते हैं.'
जस्टिस ओका ने कहा कि एक ही पद पर सत्ता और अधिकारों का इस तरह केंद्रित होना चिंता की बात है. उन्होंने कहा कि संविधान सभा में चर्चा के दौरान डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी इस तरह की स्थिति के गंभीर नतीजों को लेकर आगाह किया था. उन्होंने कहा,
'डॉ. आंबेडकर ने हीरो वर्शिप यानी किसी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा पूजने के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी. CJI के हाथों में बहुत ज्यादा शक्तियां केंद्रित होने से ही ऐसी स्थिति पैदा होती है.'
जस्टिस ओका ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मामलों को अलग-अलग बेंचों के पास भेजने के लिए एक क्लियर सिस्टम होना चाहिए. इसे 'रोस्टर सिस्टम' कहा जाता है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में एक ही तरह के मामलों की सुनवाई कई अलग-अलग बेंचों को सौंपी जाती है. इससे वकीलों और मुकदमा लड़ने वाले लोगों को ये समझने में परेशानी होती है कि उनका मामला किस बेंच के पास जाएगा.
जस्टिस ओका ने कहा कि हाई कोर्ट की तरह सुप्रीम कोर्ट में भी मामलों को बेंचों के बीच बांटने के लिए एक क्लियर और ट्रांसपैरेंट सिस्टम लागू होना चाहिए. इससे जवाबदेही बढ़ेगी और मामलों को बेंचों के पास भेजने में किसी के निजी हस्तक्षेप की गुंजाइश कम होगी. उन्होंने कहा,
अदालतों में भी VIP लाइन!'अगर सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट की तरह मामलों को बेंचों के बीच बांटने की उचित व्यवस्था लागू की जाती है, तो वह मुकदमा लड़ने वाले लोगों के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनेगा. इससे CJI अपनी मर्जी से मामलों को अलग-अलग बेंचों को नहीं सौंप सकेंगे.'
जस्टिस ओका ने इस बात की भी आलोचना की कि कई बार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट, निचली अदालतों को किसी खास मामले का फैसला तय समय के अंदर करने का निर्देश देते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे आदेशों से उन लोगों को फायदा मिलता है, जो अपनी याचिका लेकर बड़ी अदालत तक पहुंच सकते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे निर्देश देते समय अक्सर उन पुराने मामलों का ध्यान नहीं रखा जाता, जो पहले से ही अदालतों में लंबित हैं.
जस्टिस ओका ने इसे एक उदाहरण से समझाया. उन्होंने कहा, 'कई मंदिरों में दो कतारें होती हैं. एक आम लोगों के लिए और दूसरी VIP लोगों के लिए. इसी तरह, जब कोई व्यक्ति बड़ी अदालत में जाता है और वहां से उसके मामले का फैसला बाकी मामलों से पहले करने का निर्देश दिया जाता है, तो अदालतों में मुकदमा लड़ने वाले लोगों की दो अलग-अलग श्रेणियां बन जाती हैं. इससे अदालतों की जवाबदेही को नुकसान पहुंचता है.'
जजों के खिलाफ शिकायतों पर क्या कहा?जजों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों पर बात करते हुए जस्टिस ओका ने कहा कि ऐसी व्यवस्था नहीं बननी चाहिए, जिसमें हर शिकायत मिलते ही जांच शुरू कर दी जाए. बॉम्बे हाई कोर्ट में जज के तौर पर अपने अनुभव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 'जो जज सख्ती से काम करते हैं, ज्यादा काम करते हैं, ज्यादा मामलों का निपटारा करते हैं और बेबाक फैसले सुनाते हैं, उन्हें दूसरे जजों के मुकाबले ज्यादा शिकायतों का सामना करना पड़ता है.'
उन्होंने कहा कि जजों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई करने के लिए एक व्यवस्था होना जरूरी है. लेकिन ये भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जज बिना किसी डर या पक्षपात के अपना काम कर सकें.
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