मार्च, 2026. दिल्ली का इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम. एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप के ट्रायल चल रहे थे. स्टेडियम खचाखच भरा था. हर तरफ पहलवान, कोच और मीडिया के लोग नजर आ रहे थे. इसी शोरगुल के बीच स्टेडियम के एक कोने में एक महिला खड़ी थीं. गले में ओलंपिक रिंग वाली चेन. नजरें अपनी बेटी पर टिकी थीं. बेटी काजल मीडिया से बात कर रही थीं. यह काजल का पहला सीनियर लेवल ट्रायल था. उन्होंने इसे क्वालिफाई कर लिया था.
चाचा ने भाभी को कुश्ती सिखाई, भाभी ने अपनी बेटी को, अब बेटी वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल ले आई
काजल ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में 76 किलोग्राम वेट कैटेगरी में सिल्वर मेडल हासिल किया है. वह भारत के लिए सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल जीतने वाली तीसरी महिला खिलाड़ी हैं.

लेकिन प्रतियोगिता में बड़ी निराशा हाथ लगी. एशियन चैंपियनशिप में काजल पहले ही राउंड में बाहर हो गईं. तब शायद ही कोई ये दावा करता कि महज सात महीने बाद वह वर्ल्ड चैंपियनशिप की मेडलिस्ट बन जाएंगी. 18 साल की काजल ने अपनी पहली ही वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल हासिल किया है.
चाचा बने पहले कोचकाजल की इस कामयाबी के पीछे उनकी मां बबीता और चाचा कृष्णन का बेहद अहम रोल रहा है. कृष्णन वह शख्स हैं, जिन्होंने काजल को पहली बार रेसलिंग मैट पर ट्रेनिंग देना शुरू किया था. वह खुद स्टेट लेवल के ग्रीको-रोमन रेसलर रहे हैं.
कृष्णन ने शुरुआत में काजल के बड़े भाई को ट्रेनिंग देना शुरू किया था. उस वक्त उन्हें अंदाजा नहीं था कि काजल भी रेसलिंग करना चाहती थीं. जब भी वह उनके भाई को ट्रेनिंग के लिए लेकर जाते, काजल भी साथ जाने की जिद करतीं. वह रोने लगती थीं. कृष्णन काजल की जिद के आगे झुक जाते थे. धीरे-धीरे काजल के लिए यह डेली रूटीन बन गया. कुछ समय बाद कृष्णन को एहसास हुआ कि काजल वाकई में बहुत प्रतिभाशाली हैं. इसके बाद उन्होंने काजल के भाई के मुकाबले उनकी ट्रेनिंग पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया.
काजल के लिए मां ने किया त्यागकाजल की मां बबीता भी उनके रेसलिंग सफर का अहम हिस्सा बनीं. ट्रेनिंग के दौरान काजल के पास अक्सर कोई पेयरिंग पार्टनर नहीं होता था. ऐसे में कृष्णन ने बबीता को भी रेसलिंग की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया. वह चाहते थे कि बबीता समझें कि रेसलिंग क्या है, जिसके लिए उनकी बेटी दिन-रात मेहनत करती हैं. मां-बेटी साथ में प्रैक्टिस करने लगीं. कृष्णन ने बबीता को भी एक अच्छे रेसलर के तौर पर तैयार कर दिया. बबीता ने भी राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया.
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लेकिन धीरे-धीरे परिवार को एहसास हुआ कि सीमित संसाधनों के बीच दोनों के रेसलिंग करियर पर एक साथ ध्यान देना मुश्किल होगा. ऐसे में परिवार ने काजल की ट्रेनिंग पर फोकस करने का फैसला किया. बबीता ने प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना बंद कर दिया. बेटी के साथ उनका अभ्यास आज भी जारी है. वह आज भी हर कदम पर काजल के साथ खड़ी रहती हैं.
काजल का सपनाकाजल ने 'द लल्लनटॉप' से बातचीत में अपनी मां के बारे में बताया था. उन्होंने कहा था,
मेरी मां की शादी बहुत छोटी उम्र में हो गई थी. वह अपनी जिंदगी में बहुत कुछ नहीं कर पाईं. लेकिन वह चाहती हैं कि मैं ओलंपिक खेलूं. उनके गले में जो ओलंपिक रिंग वाली चेन है, वह मेरी है. जब भी मैं मैट पर खेलने उतरती हूं, मां उस चेन को अपने गले में पहन लेती हैं. वह मेरे सपने को अपने दिल के बेहद करीब रखती हैं.
काजल का सपना किसी और रेसलर जैसा बनना नहीं है. वह चाहती हैं कि रेसलर्स उनके जैसा बनना चाहें. उन्होंने रोल मॉडल को लेकर किए गए सवाल पर कहा,
मैं किसी और के जैसा नहीं बनना चाहती. मैं चाहती हूं कि लोग मेरे जैसा बनना चाहें. मुझे देखकर कहें कि उन्हें मेरे जैसा रेसलर बनना है. यही मेरा सपना है. इस सपने के लिए मैं बहुत मेहनत कर रही हूं.
काजल के लिए उनके चाचा कृष्णन भी उतने ही खास हैं. उन्होंने काजल को ट्रेनिंग देने से लेकर अलग-अलग टूर्नामेंट में उनके साथ जाने तक, हर मोर्चे पर उन्होंने मदद की. आर्थिक मदद हो या मुश्किल वक्त में मानसिक सहारा देना, कृष्णन ने हमेशा काजल का साथ दिया. आज काजल की कामयाबी में उनकी मां और चाचा की मेहनत, भरोसे और त्याग की भी बड़ी हिस्सेदारी है.
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