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CEC नियुक्ति मामले में सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की दलील, 'PM के फैसले पर भरोसा करें'

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया का बचाव किया. CEC की नियुक्ति करने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता होते हैं. सरकार ने तर्क दिया कि इस अपॉइंटमेंट कमेटी पर शक करने की कोई पुख्ता वजह नहीं है.

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सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की अपॉइंटमेंट प्रक्रिया का बचाव किया है. (फोटो: इंडिया टुडे)

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  • सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यीय कमेटी द्वारा होती है, जिसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।
  • 2023 के कानून में सीजीआई की जगह केंद्रीय मंत्री को नियुक्ति कमेटी में शामिल करने का प्रावधान बनाया गया, जिससे विपक्ष ने संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजने पर विचार कर रही है, जो नियुक्ति प्रक्रिया की संवैधानिक व्याख्या को अंतिम रूप देगा।
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संजय शर्मा

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की अपॉइंटमेंट प्रक्रिया का पुरजोर बचाव किया है. मौजूदा प्रावधान के तहत प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता वाली तीन सदस्य कमेटी में होते हैं. यही कमेटी चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) और दूसरे इलेक्शन कमिश्नरों की नियुक्ति करती है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका पर शक करने की कोई वजह नहीं है.

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इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) एक्ट, 2023' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं (PILs) पर 30 जुलाई को सुनवाई हुई. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने केस की सुनवाई की.

सरकार ने कोर्ट में दिए ये तर्क

केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (SG) ने कोर्ट से कहा, 

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“प्रधानमंत्री के पद की अपनी एक गरिमा और पवित्रता होती है."

पैनल में चीफ जस्टिस को शामिल नहीं करने पर सवाल उठाया गया था. मेहता ने इस पर जवाब देते हुए कहा, ‘अगर प्रधानमंत्री के फैसले पर भरोसा नहीं है, तो इस लॉजिक से, पीएम को अपनी कैबिनेट चुनते समय भी किसी पुराने जज या बाहरी व्यक्ति से सलाह लेनी चाहिए.’

उन्होंने तर्क दिया कि अदालतें पहले से यह मानकर नहीं चल सकतीं कि जनता की चुनी हुई सरकार (कार्यपालिका) हमेशा लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने वाले या पक्षपात करने वाले फैसले ही लेगी. 

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सरकार का कहना है कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर को चुनने वाली कमेटी संसदीय कानून के तहत बनी है. इसलिए इस कमेटी की नीयत या निष्पक्षता पर सवाल उठाना असल में संसद के विवेक, देश के नागरिकों के फैसले और लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई संस्थाओं पर भरोसा नहीं करने जैसा होगा.

‘संविधान पीठ के पास भेजा जाए मामला’

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजे. संविधान पीठ सुप्रीम कोर्ट की उस स्पेशल बेंच को कहते हैं, जिसमें कम से कम 5 या उससे ज्यादा जज शामिल होते हैं. सरकार का तर्क है कि इन याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद 324 की व्याख्या से जुड़े अहम सवाल शामिल हैं.

केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने तर्क दिया कि संविधान पीठ के पिछले फैसले में यह निर्देश दिया गया था कि अपॉइंटमेंट कमेटी में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होने चाहिए. सरकार के मुताबिक, अगर सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले को ही आखिरी और पूरा माना जाए, तो संसद के पास इस मुद्दे पर कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं रह जाएगा.

कोर्ट ने क्या कहा?

सरकार की दलीलों का जवाब देते हुए, जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा, 

“हम प्रधानमंत्री पर भरोसा क्यों नहीं करेंगे? बेशक, हम प्रधानमंत्री पर भरोसा करेंगे. इलेक्शन कमिश्नरों को इंडिपेंडेंट होना चाहिए. लेकिन क्या उनकी निष्पक्षता नहीं दिखनी चाहिए?”

याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया है कि 2023 एक्ट ने अपॉइंटमेंट कमेटी में CJI की जगह प्रधानमंत्री की तरफ से नॉमिनेटेड कैबिनेट मिनिस्टर को रखकर संविधान पीठ के फैसले को खारिज कर दिया है.

दोनों पक्षों की डिटेल में दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या 2023 के कानून को चुनौती देने वाले मामले को संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए.

ये भी पढ़ें: "चुनाव आयुक्त कैसे बनाया? कोई गड़बड़ नहीं तो फ़ाइल दिखाओ" - सुप्रीम कोर्ट का आदेश

क्या है मामला?

संविधान के अनुच्छेद 324(2) में लिखा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति तब तक करेंगे, जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बना देती. लेकिन 1950 से लेकर 2023 की शुरुआत तक किसी भी सरकार ने इस पर कोई कानून नहीं बनाया. 

मार्च 2023 तक यह प्रक्रिया पूरी तरह से केंद्र सरकार (कार्यपालिका) के कंट्रोल में थी. सरकार कुछ नाम तय करती थी. इन नामों को सीधे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता था. फिर राष्ट्रपति की ओर से नियुक्ति की जाती थी.

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी बेंच (संविधान पीठ) ने आदेश दिया कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक इस अपॉइंटमेंट कमेटी में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होंगे. लेकिन दिसंबर 2023 में संसद ने एक नया कानून पास किया. इसके तहत CJI को कमेटी से बाहर कर दिया गया और उनकी जगह पर केंद्रीय मंत्री को रख लिया गया. 

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और अन्य याचिकाकर्ताओं ने इसे कोर्ट में चुनौती दी है. उनका तर्क है कि इस कमेटी में सरकार के दो लोग (PM और मंत्री) होने से बहुमत हमेशा सरकार (2:1) के पास रहेगा.

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