BRICS Leaders Have What U.S. Doesn’t यानी ‘ब्रिक्स नेताओं के पास वो है, जो अमेरिका के पास नहीं है.’ पश्चिमी देशों का मीडिया ऐसा क्यों कह रहा है? इशारा किस पर है? एक ही मेज पर व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और बीच में मेज़बानी करता भारत. ब्रिक्स सम्मेलन (BRICS Summit) सिर्फ उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बैठक भर नहीं था, बल्कि ये दुनिया को दिखाने की कोशिश थी कि जब मंच पर अमेरिका या पश्चिमी देश नहीं होते, तब ग्लोबल लीडरशिप कैसी दिखती है? ऐसा खुद पश्चिमी मीडिया कह रहा है.
‘जो अमेरिका के पास नहीं, वो उनके पास...’, ग्लोबल मीडिया ने BRICS पर क्या-क्या लिखा?
एक ही मंच पर पुतिन, शी जिनपिंग और पेजेशकियान की मौजूदगी के बीच भारत ने BRICS के साझा बयान पर सहमति बनाई, जबकि पश्चिमी मीडिया ने इसे अमेरिका से अलग उभरती वैश्विक कूटनीति और भारत की बैलेंसिंग पॉलिसी के तौर पर देखा.

एक तरफ मिडिल ईस्ट में तनाव, आसमान छूती तेल की कीमतें, और दूसरी तरफ ब्रिक्स के अंदर ही भारत-चीन या ईरान-यूएई की आपसी करार. इन सब मतभेदों के बावजूद भारत सभी ब्रिक्स सदस्यों के बीच साझा बयान पर सहमति बनाने में कामयाब हो गया. तो समझते हैं कि इसे दुनिया भर की मीडिया कैसे देख रही है?
अमेरिकी अखबार ने क्या लिखा?अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा- As Oil Prices Rise, BRICS Leaders Have What U.S. Doesn’t: Iran at the Table. तेल की बढ़ती कीमत के बीच ब्रिक्स लीडर्स के पास वो है जो अमेरिका के पास नहीं है. बातचीत की मेज़ पर ईरान की मौजूदगी. विकासशील देशों का संगठन ब्रिक्स ये समिट कराकर दिखा रहा है कि पश्चिमी देशों के बिना दुनिया की लीडरशिप कैसी दिखती है. मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से जब दुनिया भर में तेल के दाम बढ़ रहे हैं, तब नई दिल्ली में हो रही इस बैठक ने भारत, चीन और रूस को वो मौका दिया है जो अमेरिका के पास नहीं है. वो है ईरान के साथ एक ही मेज़ पर बैठकर बात करने की सुविधा.
ब्रिक्स में अब इजिप्ट, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे नए देश जुड़ चुके हैं. कागज़ पर ये एकता दिखती है, लेकिन हकीकत में नहीं. हालिया कॉन्फ्लिक्ट के चलते ईरान और यूएई के बीच तनाव इतना गहरा गया कि मई में विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद कोई साझा बयान तक जारी नहीं हो सका था.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये पश्चिमी दबदबे का विरोध करने के नाम पर तो साथ आ रहे हैं, लेकिन उनके अपने हित एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं. इसलिए इस गुट से वैश्विक समस्या सुलझाने की उम्मीदें काफी कम हैं. पीएम मोदी, पुतिन या पेजेश्कियान की तरह खुलकर पश्चिम-विरोधी रुख नहीं अपनाते. वो भारत की पारंपरिक गुटनिरपेक्ष नीति पर चलते हुए हर खेमे के देशों से रणनीतिक दोस्ती बनाए रखने की छवि पेश करना चाहते हैं.
ब्रिक्स के अंदर ही भारत का बड़ा मुकाबला चीन से है. चीन इस मंच का इस्तेमाल अमेरिका के वैश्विक प्रभाव को घटाने के लिए करना चाहता है, जबकि भारत संतुलन बनाने के पक्ष में है. पीएम मोदी की राजनीति चुनौतियों और चीन के मुक़ाबले भारतीय अर्थव्यवस्था के धीमे रफ्तार के बीच ये सम्मेलन उन्हें ग्लोबल लेवल पक प्रभावशाली नेता के रूप में अपनी साख मज़बूत करने का अवसर है.
फ्रांस की न्यूज़ एजेंसी AFP ने लिखा,
ब्रिटिश न्यूज़ एजेंसी ने किया ईरान-UAE मीटिंग का जिक्रपीएम मोदी एक तरफ ईरान और अमेरिकी के सहयोगी इज़रायल दोनों से दोस्ताना रिश्ते बनाए रखते हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भी मज़बूत बैलेंस साधते हैं. जब अमेरिका-ईरान तनाव के चलते एनर्ज़ी क्राइसिस बढ़ा तो पश्चिमी दबाव और यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर अपनी ज़रूरतों को पूरा किया.
2020 की गलवान घाटी हिंसक झड़प के 6 साल बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ये पहला भारत दौरा था. फ्लाइट्स फिर से शुरू हो गईं हैं, वीज़ा मिलने लगे हैं. हाई लेवल बैठकें हो रही हैं. पड़ोसियों के बीच जमी बर्फ धीरे-धीरे पिघलती दिख रही है. सीमा पर तनाव है. इसके अलावा बढ़ते व्यापार घाटे और वैश्विक दबदबे की होड़ की वजह से दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास बना हुआ है.
ब्रिटेन की समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इस समिट में ईरान-UAE की मीटिंग का जिक्र किया. रॉयटर्स ने लिखा कि इस समिट में UAE ने मिडिल ईस्ट में शांति और संयम बरतने की अपील वाले एक साझा बयान पर सहमति जताई है. युद्ध की वजह से बंटे इन दोनों देशों के बीच इसे एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है. सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस के बीच बातचीत हुई. जंग शुरू होने के बाद दोनों देशों के बीच सबसे हाई लेवल की बैठक है. भारत में कोई इतना बड़ा इवेंट हो और पाकिस्तान कुछ न कहे ऐसा कैसे हो सकता है.
वहीं भारत में हुए ब्रिक्स समिट पर पाकिस्तान की भी नजर रही. पाकिस्तान के अखबार Dawn ने AFP के हवाले से छापा- ‘China, Russia, India seek economic cooperation, discuss inclusive global growth at Brics.’
चीन, रूस और भारत ने ब्रिक्स में आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर ज़ोर दिया और सभी को साथ लेकर चलने वाले वैश्विक विकास पर चर्चा की. समिट के पहले दिन मिडिल ईस्ट के युद्ध का मुद्दा छाया रहा. मई में नई दिल्ली में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बन पाई थी. 28 फरवरी को अमेरिका-इज़रायल के हमलों से शुरू हुए इस युद्ध को लेकर ईरान, सऊदी अरब और UAE के विचार अलग-अलग थे. हालांकि, मेजबान भारत की कूटनीतिक कोशिशों के बाद सभी नेताओं ने एक साझा बयान जारी किया, जिनमें ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान भी शामिल थे.
भारत के लिए ये समिट ऐसे समय में हो रहा है जब मोदी सरकार रूस, अमेरिका, खाड़ी देशों, ईरान और इज़रायल के साथ संबंध साधने की कोशिश कर रही है. प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच ENERGY, DEFENSE और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर बातचीत हुई. भारत ने इस रिश्ते को एक पुराना रणनीतिक गठजोड़ बताया, जिसमें रूस अब भी नई दिल्ली के सबसे बड़े डिफेंस सप्लायर में से एक बना हुआ है.
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चीन की मीडिया BRICS को कैसे देखती है?चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स में BRICS पर एक ओपिनियन पीस छपा है. इसमें बताया गया कि BRICS मंच लगातार क्यों आगे बढ़ रहा है? इसकी असली वजह है खुलापन, सबको साथ लेकर चलने की सोच, दोनों पक्षों के फायदे का लक्ष्य और निष्पक्षता, न्याय की भावना. दुनिया जितनी अधिक उथल-पुथल और बदलाव के दौर से गुजर रही है, ब्रिक्स सहयोग का अनूठा महत्व उतना ही उभर कर सामने आ रहा है.
आख़िर में बात रूस की भी कर लेते हैं. रूसी मीडिया RT International ने लिखा, ‘ब्रिक्स समिट के अंतिम दिन पुतिन ने इसे वैश्विक आर्थिक विकास का मुख्य इंजन बताया. पुतिन ने कहा कि इस समूह के प्रति दुनिया की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है. पुतिन ने यह भी बताया कि वैश्विक जीडीपी की वृद्धि (Growth) में 49% हिस्सेदारी अकेले ब्रिक्स देशों की है और इसके विकास की संभावनाएं अभी खत्म नहीं हुई हैं.’
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