बोफोर्स तोप भारतीय सेना का अहम हिस्सा है लेकिन इस पर राजनीति खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है. यह वही मशहूर तोप है, जिसने कारगिल की जंग का रुख ही बदल दिया था. इसकी खरीद में कमीशन या रिश्वत के आरोप लगे थे. 2005 में हाई कोर्ट ने इस केस को बंद कर दिया था. अब लगभग 2 दशक बाद फिर से इस मामले को खोलने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया है.
40 साल बाद बोफोर्स केस पर लगा 'द एंड', सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की आखिरी याचिका
Bofors Case Supreme Court: बोफोर्स तोप का मामला एक बार फिर कोर्ट में पहुंच गया है. हालांकि, मुकदमा जारी रखने के मकसद पर सवाल उठाते हुए जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि अब फैसला करने के लिए क्या बचा है?

याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट के 2005 के फैसले को चुनौती दी गई थी. फैसले के तहत, बोफोर्स मामले में हिंदुजा ब्रदर्स (श्रीचंद पी हिंदुजा और गोपीचंद पी हिंदुजा) और स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया गया था.
कोर्ट का सुनवाई से इंकारसुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने वकील अजय के अग्रवाल की अपील पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. सुनवाई के दौरान अजय अग्रवाल ने याचिका से श्रीचंद पी हिंदुजा और गोपीचंद पी हिंदुजा के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा. क्योंकि दोनों का निधन हो चुका है. हालांकि, बेंच ने एक्सट्रा टाइम देने से इनकार कर दिया और कहा कि मामले को और आगे नहीं खींचा जा सकता.
मुकदमे को जारी रखने के मकसद पर सवाल उठाते हुए जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि अब फैसला करने के लिए क्या बचा है? दिल्ली हाई कोर्ट ने 2005 में ही कार्यवाही रद्द कर दी थी. उस फैसले को सीबीआई ने चुनौती दी थी. हालांकि, उसे कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया था. दिल्ली हाई कोर्ट ने 31 मई 2005 के फैसले में श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा के साथ-साथ एबी बोफोर्स को सभी क्रिमिनल आरोपों से बरी कर दिया था. कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के सबूतों में गंभीर कमियां पाईं. कोर्ट ने कहा कि सीबीआई यह साबित करने में नाकाम रही कि 1986 में गन डील हासिल करने में हिंदुजा बंधुओं की कोई सीधी भूमिका थी. ये भी साबित नहीं हो पाया था कि उन्हें कथित तौर पर मिले पैसों का संबंध गैर-कानूनी कमीशन से था.
स्वीडन से मिले डॉक्यूमेंट्स, सीबीआई पर उठे थे सवाल2005 के अपने जजमेंट में हाईकोर्ट ने कहा था कि CBI को स्वीडिश अधिकारियों से जो डॉक्यूमेंट्स मिले थे, वे न तो असली रिकॉर्ड थे और न ही प्रमाणित कॉपियां. कोर्ट ने कहा कि ऐसे बिना प्रमाणित डॉक्यूमेंट्स के आधार पर आरोपी पर मुकदमा चलाना जनता के समय और पैसे की बर्बादी होगी. यह उन लोगों के साथ अन्याय होगा जिनका मुकदमा चल रहा है.
इस फैसले में CBI की जांच की भी कड़ी आलोचना की गई थी. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक इस जांच पर ही सरकारी खजाने से लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च हो गए थे. इस फैसले के बाद, हिंदुजा ब्रदर्स को मामले से बरी कर दिया गया. उनके जमानत बॉन्ड भी वापस करने का आदेश दिया गया था.
इससे पहले नवंबर 2018 में भी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ CBI ने अपील की थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया. कोर्ट का कहना था कि अपील दायर करने में 4,522 दिनों की बिना वजह देरी हुई.
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क्या था बोफोर्स मामला?बोफोर्स विवाद की शुरुआत 24 मार्च 1986 से बताई जाती है. उस साल इंडियन आर्मी के लिए तोपें खरीदी जानी थीं. लिहाजा भारत सरकार और स्वीडन की रक्षा कंपनी AB बोफोर्स के बीच 400 होवित्जर तोपों की खरीद के लिए हुए 1,437 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट हुआ. हालांकि, इस सौदे की वजह से देश की राजनीति में खूब बावेला हुआ था. 1987 में स्वीडिश रेडियो ने आरोप लगाया कि कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिया गया था.
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