सालों का बवाल. आंदोलन की आग. राजनीति की बिसात पर बिछीं लंबी चालें और अंत में एक ऐसा आंकड़ा, जिसने सबको सन्न कर दिया. जिस नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA को लेकर असम सुलग उठा था, ट्रेनें फूंक दी गई थीं और महीनों तक हिंसक प्रदर्शन हुए थे, वहां से एक बेहद चौंकाने वाली खबर आई है. असम सरकार ने खुद राज्य विधानसभा में एक लिखित जवाब में ये साफ किया है कि सूबे में अब तक सीएए के तहत नागरिकता पाने के लिए सिर्फ 70 लोगों ने आवेदन किया है. और चौंकाने वाली बात ये है कि इनमें से अब तक केवल 6 लोगों को ही भारत की नागरिकता मिल पाई है.
CAA पर सालों तक बवाल, लेकिन असम में नागरिकता के लिए आए सिर्फ 70 आवेदन, आखिर क्यों?
CAA Reality Check in Assam: असम सरकार ने विधानसभा में बताया कि CAA लागू होने के बाद राज्य में सिर्फ 70 लोगों ने भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया, जिनमें से 6 को नागरिकता मिल चुकी है. आखिर इतने लंबे आंदोलन के बाद आवेदन इतने कम क्यों आए? जानिए पूरा गणित और इसके राजनीतिक मायने.


द सेंटिनेल, नॉर्थईस्ट नाउ और इंडियन एक्सप्रेस जैसी मीडिया रिपोर्ट्स में जब ये आंकड़ा छपा, तो हर कोई हैरान रह गया. जिस मुद्दे पर देश और असम की सियासत सालों तक घूमती रही, वो जमीन पर इतना फुस्स कैसे हो गया? आखिर वो कौन सी क्रोनोलॉजी और जमीनी हकीकत है, जिसने लाखों लोगों को नागरिकता देने के वादे वाले इस कानून को सिर्फ 70 आवेदनों पर समेट दिया? आइए इसे सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं.
डर या तकनीकी पेच: बंगाली हिंदू क्यों पीछे हट रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब असम में रहने वाले लाखों गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने के लिए ये कानून लाया गया था, तो लोग आवेदन क्यों नहीं कर रहे हैं? इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और कानूनी पेच है.
असम में रहने वाले बंगाली हिंदुओं के मन में सबसे बड़ा डर ये है कि अगर वो सीएए पोर्टल पर जाकर आवेदन करते हैं, तो उन्हें सबसे पहले ये लिखित में स्वीकार करना होगा कि वो पहले 'विदेशी' या 'अवैध अप्रवासी' थे. वो भी बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफगानिस्तान से आए हुए. सालों से असम में रह रहे और खुद को भारत का नागरिक मानने वाले लोग कानूनी रूप से खुद पर 'विदेशी' का ठप्पा लगाने से कतरा रहे हैं. उन्हें डर है कि अगर किसी वजह से उनका आवेदन खारिज हो गया, तो वो कहीं के नहीं रहेंगे. न नागरिक रह पाएंगे और न ही शरणार्थी.
असम सरकार की विधानसभा रिपोर्ट और सीएए नियम 2024 जिक्र करते हुए ‘द सेंटिनेल’ की रिपोर्ट कहती है कि इस पूरे मामले में एक बड़ा तकनीकी रोड़ा दस्तावेजों का भी है. सीएए के नियमों के मुताबिक, आवेदकों को ये साबित करना होगा कि वो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आ चुके थे और उनके पास बांग्लादेश या उनके मूल देश का कोई ऐसा दस्तावेज है, जो उनकी राष्ट्रीयता साबित करता हो. असम में दशकों से रह रहे गरीब और ग्रामीण इलाकों के लोगों के पास ऐसे विदेशी दस्तावेज मिलना लगभग असंभव सा है.
असम आंदोलन बनाम सीएए: विचारधारा की वो टक्कर
असम में सीएए का विरोध देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग रहा है. देश के अन्य हिस्सों में ये विरोध धार्मिक भेदभाव (मुस्लिमों को शामिल न करने) के आधार पर था, लेकिन असम में लड़ाई 'असमिया बनाम बाहरी' की थी.
‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक साल 1985 का ऐतिहासिक 'असम समझौता' (Assam Accord) कहता है कि 25 मार्च 1971 के बाद असम में आने वाले हर अवैध विदेशी को बाहर निकाला जाएगा, चाहे उसका धर्म कोई भी हो. लेकिन सीएए ने इस कट-ऑफ तारीख को बढ़ाकर 31 दिसंबर 2014 कर दिया. असमिया समुदाय का मूल विरोध यही था कि ये कानून असम समझौते की आत्मा को खत्म करता है और बाहर से आए बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देकर असम की जनसांख्यिकी (Demography) और संस्कृति को बदल देगा.
लेकिन अब जब सिर्फ 70 आवेदन सामने आए हैं, तो असमिया आंदोलनकारियों के उस दावे पर भी सवाल उठ रहे हैं जिसमें लाखों-करोड़ों घुसपैठियों के वैध होने का डर दिखाया गया था. हालांकि, आंदोलनकारी संगठनों का मानना है कि ये सिर्फ शुरुआती झिझक है और सरकार पिछले दरवाजे से लोगों को राहत देने की कोशिश कर रही है.
राजनीतिक नफा-नुकसान: बीजेपी की सफाई और विपक्ष का हमला
इस आंकड़े के सामने आने के बाद असम की सियासत में भूचाल आ गया है. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां बीजेपी पर हमलावर हैं. ‘नॉर्थईस्ट नाउ’ के मुताबिक विपक्ष का कहना है कि बीजेपी ने सिर्फ चुनावी फायदे के लिए और ध्रुवीकरण करने के लिए असम को आंदोलन की आग में झोंका, जबकि हकीकत में नागरिकता लेने वाला कोई है ही नहीं.
दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और बीजेपी इस आंकड़े को अपनी रणनीति के तहत देख रहे हैं. बीजेपी नेताओं का तर्क है कि ये आंकड़े उन लोगों के मुंह पर तमाचा हैं जो दावा कर रहे थे कि सीएए लागू होते ही बांग्लादेश से लाखों लोग असम आ जाएंगे और स्थानीय संस्कृति को नष्ट कर देंगे. सरकार ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सीएए से असमिया पहचान को कोई खतरा नहीं है, जैसा कि दुष्प्रचार किया गया था.
साथ ही, असम सरकार ने हाल ही में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को ये निर्देश भी दिए हैं कि वो 2014 से पहले आए गैर-मुस्लिमों के खिलाफ मामलों को आगे न बढ़ाएं और उन्हें सीएए के तहत आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित करें. यानी राजनीतिक रूप से बीजेपी अभी भी बंगाली हिंदू वोट बैंक को ये भरोसा दिलाने में जुटी है कि वो उनके साथ खड़ी है, भले ही आंकड़े अभी दहाई में सिमटे हों.
क्या वाकई जमीन पर फुस्स हो गया मुद्दा?
सिर्फ 70 आवेदन और 6 लोगों को नागरिकता मिलना ये दिखाता है कि कोई भी कानून जब जमीन पर उतरता है, तो उसकी पेचीदगियां कागजी दावों से बिल्कुल जुदा होती हैं. असम में सीएए के इस ठंडे रिस्पॉन्स ने ये साफ कर दिया है कि पहचान, नागरिकता और दस्तावेजों की ये लड़ाई इतनी सीधी नहीं है जितनी रैलियों में नजर आती है. क्या आने वाले समय में इन आवेदनों की संख्या बढ़ेगी या ये ऐतिहासिक कानून असम में सिर्फ एक राजनीतिक प्रतीक बनकर रह जाएगा, ये वक्त ही बताएगा.
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