हर साल जुलाई आते ही मुंबई से वही पुरानी तस्वीरें सामने आने लगती हैं. पटरियों पर थमी लोकल ट्रेनें, कमर तक भरे पानी में चलते लोग और टीवी स्क्रीन्स पर चमकता 'रेड अलर्ट'. इस साल भी कहानी अलग नहीं है. मुंबई, पुणे और नासिक में मानसून की भारी बारिश ने रफ्तार रोक दी है. मुंबई में स्कूल-कॉलेज बंद करने पड़े हैं, तो वहीं नासिक में बादल फटने (क्लाउडबर्स्ट) जैसी स्थिति को लेकर चेतावनी जारी की गई है. सोशल मीडिया पर फिर से 'स्पिरिट ऑफ मुंबई' का गुणगान शुरू हो गया है, लेकिन असलियत ये है कि ये कोई स्पिरिट नहीं, बल्कि आम जनता की बेबसी है. आखिर हर साल अरबों रुपये का बजट पानी में क्यों बह जाता है और देश की आर्थिक राजधानी घुटनों पर क्यों आ जाती है? आइए इसे गहराई से समझते हैं.
'स्पिरिट ऑफ मुंबई' या मजबूरी की मार? हर बरसात क्यों घुटनों पर आ जाती है देश की आर्थिक राजधानी!
Mumbai Rain Red Alert: मुंबई, पुणे और नासिक में मानसून की भारी बारिश से रेड अलर्ट लागू है. जानिए क्यों देश की सबसे अमीर महानगरपालिका BMC के भारी-भरकम बजट के बावजूद हर साल मुंबई पानी-पानी हो जाती है और इसके पीछे का वेदर साइंस क्या है.


देश की सबसे अमीर महानगरपालिका का पैसा जाता कहां है?
मुंबई को संभालने वाली बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) देश की सबसे अमीर महानगरपालिका है. ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक बीएमसी का सालाना बजट कई छोटे राज्यों के कुल बजट से भी ज्यादा होता है. साल 2024-25 के लिए BMC ने करीब 59,954 करोड़ रुपये का बजट पेश किया था, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा ड्रेनेज सिस्टम और मानसून की तैयारियों के लिए रखा जाता है. हर साल दावा किया जाता है कि नालों की सफाई (डीसिल्टिंग) पूरी हो चुकी है, लेकिन पहली भारी बारिश ही इन दावों की पोल खोल देती है.
वरिष्ठ पत्रकार संजय प्रभाकर के मुताबिक मुंबई का ड्रेनेज सिस्टम ब्रिटिश जमाने का है, जो सिर्फ 25 मिमी प्रति घंटे की बारिश को झेलने के लिए डिजाइन किया गया था. लल्लनटॉप से बात करते हुए संजय कहते हैं,
आज के समय में जब क्लाइमेट चेंज की वजह से कुछ ही घंटों में 100 मिमी से ज्यादा बारिश हो जाती है, तो ये सिस्टम पूरी तरह फेल हो जाता है. दादर, हिंदमाता, कुर्ला और सायन जैसे इलाके हर साल बिना चूके डूबते हैं.
संजय आगे कहते हैं कि जिस 'ब्रिमस्टोवॅड' (BRIMSTOWAD) प्रोजेक्ट का मकसद मुंबई के ड्रेनेज सिस्टम को सुधारना था, वो दशकों से कछुआ गति से चल रहा है और इसकी लागत लगातार बढ़ती जा रही है.
नासिक और पुणे में 'क्लाउडबर्स्ट' और क्लाइमेट चेंज का कनेक्शन
इस बार सिर्फ मुंबई ही नहीं, बल्कि पुणे और नासिक भी पानी-पानी हैं. ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के मुताबिक नासिक में तो बादल फटने (क्लाउडबर्स्ट) जैसी स्थिति की चेतावनी खुद प्रशासन को देनी पड़ी है. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसके पीछे अरब सागर का तेजी से गर्म होना और वेस्टर्न घाट (पश्चिमी घाट) की भौगोलिक स्थिति है.
जब समुद्र का तापमान बढ़ता है, तो हवा में नमी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है. मानसून की ये नमी से भरी हवाएं जब वेस्टर्न घाट की पहाड़ियों से टकराती हैं, तो तेजी से ऊपर उठती हैं. ऊपर जाकर ये हवाएं ठंडी होती हैं और घने बादलों का निर्माण करती हैं. जब बहुत कम समय में एक सीमित इलाके में भारी मात्रा में पानी बरस जाता है, तो उसे क्लाउडबर्स्ट जैसी स्थिति कहा जाता है. अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट (शहरों का कंक्रीट के जंगल में बदलना) भी इन बादलों को एक ही जगह पर बरसने के लिए मजबूर करता है, जिससे पुणे और नासिक जैसे शहरों में अचानक बाढ़ आ जाती है.
एक दिन ठप होने से कितने करोड़ का होता है नुकसान?
मुंबई सिर्फ एक शहर नहीं है, ये देश का फाइनेंशियल हब है. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE), नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE), और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) जैसी बड़ी संस्थाएं यहीं हैं. जब मुंबई ठहरती है, तो पूरे देश की अर्थव्यवस्था को झटका लगता है. ‘बिजनेस स्टैडर्ड’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई में एक दिन के कम्पलीट लॉकडाउन या ठप होने से देश को करीब 1,000 से 1,500 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान होता है.
इस नुकसान का सबसे बड़ा शिकार वो आम दिहाड़ी मजदूर, ऑटो-टैक्सी ड्राइवर और डब्बावाले होते हैं, जिनकी रोज की कमाई पर ही उनका घर चलता है. लोकल ट्रेन बंद होने का मतलब है कि लाखों लोग काम पर नहीं पहुंच पाते. फैक्ट्रियां, ऑफिस और बिजनेस ठप हो जाते हैं. ये आर्थिक चोट सिर्फ बड़े कॉरपोरेट्स को नहीं, बल्कि उस आखिरी पायदान पर खड़े इंसान को लगती है जो रोज सुबह इस उम्मीद में निकलता है कि वो शाम को कुछ कमा कर घर लौटेगा.
'स्पिरिट ऑफ मुंबई' या मजबूरी की मार?
मराठी समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर लगातार वीडियो चल रहे हैं जहां लोग घुटनों तक भरे पानी में चलकर दफ्तर जाने को मजबूर हैं. लोकल ट्रेनों के ट्रैक पानी में डूब चुके हैं, स्टेशनों पर हजारों की भीड़ फंसी हुई है. इसे अक्सर 'स्पिरिट ऑफ मुंबई' कहकर रोमानियत का रंग दे दिया जाता है. लेकिन ग्राउंड रियलिटी ये है कि ये कोई स्पिरिट नहीं, बल्कि नौकरी खोने का डर और पेट पालने की मजबूरी है.
जब तक अर्बन प्लानिंग में सुधार नहीं होगा, जब तक नालों की सफाई सिर्फ कागजों पर रहेगी और जब तक कंक्रीट के अंधाधुंध निर्माण को नहीं रोका जाएगा, तब तक मायानगरी ऐसे ही हर मानसून में डूबती रहेगी. आम नागरिक टैक्स देता है ताकि उसे बेहतर सुविधाएं मिलें, ना कि इसलिए कि वो हर साल अपनी जान जोखिम में डालकर काम पर जाए. प्रशासन को अब 'स्पिरिट' के पीछे छिपना बंद करके कड़े और ठोस कदम उठाने होंगे.
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