इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पत्नी को मिलने वाले गुजारा-भत्ते की रकम को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. फैमिली कोर्ट आमतौर पर पति की नेट सैलरी का 25 फीसदी मेंटेनेंस तय करता है. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में इस हद को खत्म कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि 25 फीसदी मेंटेनेंस का बेंचमार्क महज एक 'व्यापक गाइडलाइन' है, कोई जरूरी नियम नहीं.
पति की सैलरी का 25 फीसदी भत्ता देना जरूरी नहीं... HC ने मेंटेनेंस रकम की हद मिटा दी
Allahabad High Court ने कहा कि सिर्फ तलाक का आदेश देने से कानूनी तौर पर शादीशुदा पत्नी को गुजारा-भत्ता देने से महरूम नहीं किया जा सकता, बशर्ते वह अपना गुजारा नहीं कर सकती और उसने दूसरी शादी नहीं की है या एडल्टरी में नहीं रह रही हो.


हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट हर एक मामले के फैक्ट्स के आधार पर गुजारा-भत्ता तय कर सकता है. 10 जुलाई को कोर्ट ने एक मामले में पत्नी के मेंटेनेंस को 12,000 रुपये प्रति महीना से बढ़ाकर 20,000 प्रति महीना करने का आदेश देते हुए यह निर्देश दिया.
हाई कोर्ट ने क्या कहा?लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अचल सचदेव ने कहा,
"गुजारा-भत्ते का मकसद यह पक्का करना है कि पत्नी सम्मान के साथ जी सके, ना कि सिर्फ जिंदा रह सके."
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ किया कि मेंटेनेंस तय करते समय 'नेट इनकम' का मतलब जरूरी खर्च और टैक्स घटाकर बचने वाली कमाई है, ना कि कुल सैलरी.
क्या था पूरा मामला?कोर्ट ने दो जुड़े हुए मामलों की सुनवाई की. एक अर्जी पत्नी ने दायर की थी, जिसमें कानपुर देहात फैमिली कोर्ट के तय किए गए 12,000 रुपये प्रति महीने के गुजारा-भत्ते को बढ़ाने की मांग की गई थी. दूसरी अर्जी पति ने गुजारा-भत्ता के इस आदेश को रद्द करने के लिए डाली थी.
हाई कोर्ट के सामने दो बातें रखी गईं. पहली, पति ने पत्नी के खिलाफ तलाक की अर्जी दी थी, जिसका फैसला उसके पक्ष में आया. दूसरी, तलाक के बाद पत्नी ने दूसरी शादी नहीं की थी. हाई कोर्ट ने यह भी देखा कि पत्नी के पास कमाई का कोई जरिया नहीं था, और वो अपना गुजारा करने के काबिल नहीं थी. इसलिए, फैमिली कोर्ट ने पत्नी के लिए गुजारा-भत्ता तय किया था.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ तलाक का आदेश देने से कानूनी तौर पर शादीशुदा पत्नी को गुजारा-भत्ता देने से महरूम नहीं किया जा सकता, बशर्ते वह अपना गुजारा नहीं कर सकती और उसने दूसरी शादी नहीं की है या एडल्टरी (पति-पत्नी की मर्जी के बिना किसी और व्यक्ति के साथ सेक्सुअल रिलेशन बनाना) में नहीं रह रही हो.
हाई कोर्ट ने इस मामले में फैमिली कोर्ट के तय गुजारा-भत्ते की रकम को बढ़ाया तो अपनी पावर की हद पर भी बात की. हाई कोर्ट ने अपनी शक्तियों के दायरे के बारे में कहा कि रिवीजनल कोर्ट आम तौर पर गुजारा-भत्ते की रकम को बढ़ा या घटा नहीं सकती.
बेंच ने जोर देकर कहा, "भले ही ट्रायल कोर्ट ने बहुत कम रकम तय की हो, फिर भी हाई कोर्ट रिवीजन के दौरान उसे बढ़ा नहीं सकता."
जस्टिस अचल सचदेव ने यह भी कहा कि रिवीजनल कोर्ट की शक्ति सुपरवाइजरी (निगरानी करने वाली) होती है, ना कि अपीलेट (अपील सुनने वाली).
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हाई कोर्ट ने बताया कि दखल तब जरूरी है जब ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष गलत हों, अहम सबूतों को नजरअंदाज किया गया हो, या पहले से बने सिद्धांतों को गलत तरीके से लागू किया गया हो, जिससे गंभीर अन्याय या परेशानी हुई हो.
हाई कोर्ट ने क्यों बढ़ाया मेंटेनेंस?बेंच ने गौर किया कि पति की ग्रॉस मंथली सैलरी 86,674 रुपये थी, जिसमें से काट-पीटकर 67,043 रुपये उसके बैंक अकाउंट में आ रहे थे. हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजी सबूतों पर विचार किए बिना जल्दबाजी में गुजारा-भत्ते की रकम तय कर दी थी. खासकर, इसलिए क्योंकि पति ने मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार अपनी संपत्ति और देनदारियों के बारे में एफिडेविट फाइल नहीं किया था.
कोर्ट ने कहा कि चूंकि फैमिली कोर्ट ने मानी गई इनकम को नजरअंदाज किया था और रिकॉर्ड के बिना अपने नतीजे पर पहुंचा था. कोर्ट ने कहा कि इसलिए मेंटेनेंस की रकम पर दिए गए फैसले को बदलना और गलती को ठीक करना जरूरी था.
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