सिर्फ 8 हजार रुपए. एक बुजुर्ग की जान की कीमत शायद इससे कहीं ज्यादा थी. उनके परिवार का दावा है कि अगर बैंक ने समय रहते उनके अपने खाते से ये पैसे निकालने दिए होते, तो शायद उनका इलाज हो जाता और जान बच सकती थी. लेकिन समय पर बैंक से पैसे नहीं निकल पाए और बुजुर्ग की जान चली गई. ये कहानी एक 75 साल के व्यक्ति रतन लकड़ा की है. रतन टीबी से जूझ रहे थे. उनके खाते में सरकारी वृद्धावस्था पेंशन के पैसे जमा थे, लेकिन उन पैसों तक पहुंचने से पहले परिवार को ई-केवाईसी, फॉर्म, साइन और बैंक के चक्कर जैसी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. इलाज इंतजार करता रहा, बैंकिंग प्रक्रिया चलती रही और आखिरकार 6 जुलाई को रतन लकड़ा ने दम तोड़ दिया.
8 हजार रुपये नहीं मिले, इलाज अटका... बैंक के बाहर पहुंच गई लाश
6 जुलाई को Ratan Lakda की मौत हो गई. मौत के कुछ घंटों बाद परिवार उनकी लाश के साथ बैंक की गढ़वा ब्रांच के बाहर पहुंच गया और विरोध प्रदर्शन किया. मामला बढ़ा तो झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren ने जांच के आदेश दिए.


ये पूरा मामला है झारखंड के गढ़वा जिले के बड़गढ़ गांव का. यहां रहने वाले 75 साल के रतन लकड़ा को टीबी की बीमारी थी. उनके खाते में सरकारी वृद्धावस्था पेंशन के करीब 8 हजार रुपये जमा थे. परिवार इसी पैसे से उनका इलाज कराना चाहता था. लेकिन पैसे निकालने के लिए बैंक ने ई-केवाईसी अपडेट करने को कहा. रतन लकड़ा की बहू फुलमनी लकड़ा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पिछले साल अक्टूबर से उनका परिवार झारखंड ग्रामीण बैंक की ब्रांच के चक्कर लगा रहा था. कभी एक काउंटर पर भेजा जाता, कभी दूसरे पर. कभी बैंक सखी के पास जाने को कहा जाता. लेकिन किसी ने साफ तौर पर ये नहीं बताया कि ई-केवाईसी पूरी कैसे होगी.
फुलमनी मजदूरी करती हैं और वही पूरे परिवार का खर्च चलाती हैं. उनके पति की आंखों की रोशनी नहीं है. घर में पांच बच्चे हैं. ऐसे में उन्होंने उम्मीद की कि ससुर की पेंशन से इलाज हो जाएगा. परिवार का कहना है कि, जब अक्टूबर 2025 में रतन लकड़ा की पत्नी यानी फूलमनी की सास बैंक गईं तो कहा गया कि पैसे निकालने के लिए पहले KYC कराइए. इसके बाद कई महीने तक वही बात दोहराई जाती रही. फुलमनी मार्च से खुद बैंक जाने लगीं. लेकिन हर बार उन्हें अलग-अलग लोगों के पास भेज दिया जाता.
आखिर उन्हें एक दिन बैंक में मौजूद दूसरे ग्राहक ने बताया कि आपको एक फॉर्म भरना होगा जो वहां टेबल पर ही रखा है. फुलमनी कहती हैं कि अगर शुरुआत में किसी ने यही बात बता दी होती, तो इतना समय बर्बाद नहीं होता. रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म भरने के बाद भी मसला हल नहीं हुआ. फॉर्म भरने के बाद अब मैनेजर के साइन का इंतजार शुरू हो गया. फुलमनी कहती हैं कि इस काम में भी करीब दो महीने लग गए.
पैसे नहीं निकले, तबीयत बिगड़ती गईइस दौरान रतन लकड़ा की तबीयत लगातार बिगड़ती रही. यहां तक कि फुलमनी अपने ससुर को ऑटो से बैंक भी लेकर जाने लगीं. फुलमनी का आरोप है कि उन्होंने बैंक के मैसेंजर नंदलाल राम से कई बार कहा कि मैनेजर बाहर आकर मरीज की हालत देख लें. लेकिन उन्हें जवाब मिला कि ‘यहां तमाशा मत करो, साहब मीटिंग में हैं.’
फुलमनी का कहना है कि वो बार-बार बैंक कर्मचारियों से इलाज के लिए पैसे निकालने की गुहार लगाती रहीं. लेकिन उन्हें बैंक से बाहर कर दिया गया. उन्होंने अपने ससुर से हमेशा यही कहा कि प्रक्रिया चल रही है और जल्द इलाज के लिए अस्पताल ले जाएंगे. परिवार ने सोचा था कि रतन लकड़ा को पलामू जिले के डाल्टनगंज सदर अस्पताल में भर्ती कराया जाए. उनका गांव वहां से करीब 80 किलोमीटर दूर है. एंबुलेंस बुक करने के लिए भी उन्हें उसी पैसे की जरूरत थी. फिर 6 जुलाई को रतन लकड़ा की मौत हो गई.
मौत के कुछ घंटों बाद परिवार उनकी लाश के साथ बैंक की गढ़वा ब्रांच के बाहर पहुंच गया और विरोध प्रदर्शन किया. मामला बढ़ा तो झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जांच के आदेश दिए. जांच के बाद बैंककर्मी नंदलाल राम को सस्पेंड कर दिया गया. बैंक मैनेजर कृष्णा राम का तबादला कर दिया गया. हालांकि नंदलाल राम ने सभी आरोपों से इनकार किया है. उनका कहना है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है.
जांच में पता चला, हुई थी लापरवाही लेकिन….इस बीच रंका के एसडीएम मोहम्मद परवेज ने मामले की जांच की. उन्होंने माना कि शुरुआती जांच में बैंक की तरफ से कुछ लापरवाही सामने आई है. लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि रतन लकड़ा की मौत को सीधे ई-केवाईसी में हुई देरी से जोड़ना सही नहीं होगा. एसडीएम के मुताबिक, रतन लकड़ा का ई-केवाईसी 9 जून को पूरा हो गया था. यानी उनकी मौत से करीब एक महीने पहले. अब जांच रिपोर्ट बैंक के पलामू रीजनल मैनेजर अरुण कुमार को भेज दी गई है ताकि विभागीय कार्रवाई हो सके.
वहीं रीजनल मैनेजर अरुण कुमार का कहना है कि 9 जून को ही परिवार को बता दिया गया था कि ई-केवाईसी पूरी हो चुकी है और अब पैसे निकाले जा सकते हैं. उनके मुताबिक, जांच के दौरान परिवार ने कहा कि घर में शादी होने की वजह से वे तुरंत बैंक नहीं आ सके. लेकिन बड़गढ़ गांव में बैठी फुलमनी के लिए ये जवाब कोई मायने नहीं रखते. उनका कहना है कि महीनों तक बैंक के चक्कर लगाने, बार-बार अपमान झेलने और इलाज के लिए पैसे नहीं मिलने का दर्द अब कभी खत्म नहीं होगा.
रतन लकड़ा की मौत की असल वजह टीबी थी या सिस्टम की सुस्ती, इसका फैसला जांच रिपोर्ट करेगी. लेकिन एक सवाल अपनी जगह कायम है. अगर किसी बुजुर्ग के अपने खाते में जमा 8 हजार रुपये भी जरूरत पड़ने पर उसके काम न आ सकें, तो फिर सरकारी पेंशन और बैंकिंग सुविधाओं का मतलब क्या रह जाता है?
रतन लकड़ा अब इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन गढ़वा के उस छोटे से गांव से उठी ये कहानी देश के लाखों गरीब और बुजुर्ग लोगों की हकीकत को भी सामने रखती है, जो अपने ही पैसों तक पहुंचने के लिए फॉर्म, साइन, काउंटर और दफ्तरों के बीच भटकते रहते हैं.और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या किसी नागरिक को अपने ही पैसे निकालने के लिए अपनी आखिरी सांस तक इंतजार करना चाहिए?
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