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आधी जगह बाढ़, आधी जगह सूखा: थाली से गायब होगी दाल और सब्जी? 'अजीब मानसून' का महंगाई कनेक्शन

Monsoon Impact 2026: मानसून के डबल अटैक से खरीफ की बुवाई सुस्त पड़ी हुई है. आलम ये है कि यूपी-बिहार के कई जिलों में बाढ़ जैसे हालात हैं. तो वहीं प्रमुख कृषि बेल्ट में सूखे के हाल हैं. जानें इन सबके चलते कैसे बढ़ेगी आपकी थाली की महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका असर क्या होगा?

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मानसून के डबल अटैक से खरीफ की बुवाई सुस्त (फोटो- इंडिया टुडे)

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  • मौसम विभाग ने देश के 22 राज्यों में भारी बारिश और संभावित बाढ़ की चेतावनी जारी की है, जिसके साथ ही सूखे के भी संकेत मिलने लगे हैं।
  • मानसून के कमजोर पड़ने और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के कारण खेती की बुवाई में गिरावट और खेतिहर मजदूरों के पलायन की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
  • कृषि क्षेत्र में गिरावट और परिवहन लागत बढ़ने से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि की संभावना है, जिससे त्योहारों के दौरान महंगाई बढ़ सकती है।

तेल के संकट ने भारतवासियों की दिक्कतें पहले ही बढ़ा रखी हैं. ऊपर से मौसम ने ऐसा चक्का चलाया है आने वाले दिनों में ये दिक्कतें कम होने के बजाय बढ़ने के आसार नजर आने लगे हैं. एक तरफ तो मौसम विभाग देश के 22 राज्यों में ज़बरदस्त बारिश की चेतावनी दे रहा है. कई जगहों पर बाढ़ वाले हालात हैं. वहीं दूसरी तरफ अबकी बरस औसत के कम मानसून के चलते सूखे के आसार भी दिखने लगे हैं.

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चर्चा कुदरत के इसी दोहरे बर्ताव पर ही किसी शायर ने कहा है,

“कहीं मरुथल सी प्यासी है ज़मीं, कहीं सैलाब का है दौर जारी,
अजीब मौसम की ये फितरत, है ज़िंदगी फिर भी बेचारी.
कहीं पर खेत तरसें हैं बूंद को, कहीं पर डूबती है हर तैयारी,
बंटा है इस कदर कुदरत का गुस्सा, कि मुफलिस की थाली हो रही है भारी.”

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मॉरल ऑफ द स्टोरी ये है कि अबकी बरस सावन में कुदरत कुछ अलग ही कहर बरपा रही है. कहीं तो बरसात ने कई शहरों की सड़कों पर इटली के ‘वेनिस’ जैसा नजारा दिखना शुरू कर दिया है. तो कही देश का अन्नदाता (बोले तो किसान) ‘लगान’ के भुवन की तरह आसमान की ओर टकटकी लगाए गुहार लगा रहा है कि ‘भईया काले मेघा, पानी तो बरसा दो…’

कहने का मतलब ये कि वो किसान जो धान और दाल उगाते हैं, उनके माथे पर टेंशन की लकीर नजर आ रही है. क्योंकि जहां पानी बरसना चाहिए, मौसम विभाग के मुताबिक वहां मानसून का सरप्लस यानी अधिशेष तेजी से नीचे गिर गया है. मौसम की इस मार ने सरकार की नींद उड़ा दी है क्योंकि खरीफ की बुवाई की रफ्तार काफी सुस्त पड़ गई है.

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मौसम की बेरुखी से परेशान किसान (फोटो-इंडिया टुडे)

क्या है खेती और उपज का असली गणित?

इंसान की ज़िंदगी में टाइमिंग की बड़ी अहमियत है. सही जगह- सही समय पर मौजूद होना बेहद जरूरी है. ठीक उसी तरह जब हम खेती की बात करते हैं, तो बात सिर्फ बारिश की नहीं, सही समय पर बारिश की होती है. 

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किसान नेता मास्टर आजाद इस बात का मतलब आज के संदर्भ में समझाते हुए लल्लनटॉप से कहते हैं,

“जिन इलाकों में धान की रोपाई सबसे ज्यादा होती है, वहां सूखे जैसे हाल हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले काफी पीछे चल रही है. अरहर और मूंग जैसी दलहन फसलों की स्थिति तो और भी ज्यादा टेंशन देने वाली है.”

कृषि मंत्रालय के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, दलहन की बुवाई में अब तक काफी गिरावट देखी गई है. सवाल ये है कि क्या अगस्त में अगर बारिश होती भी है, तो क्या ये नुकसान भरपाई हो पाएगी? जानकारों का कहना है कि अगर फसल की बुवाई में देरी होती है, तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है.

पेट्रोल की मार और मानसून का 'डबल अटैक'

अब जरा इस महंगाई के गणित को समझिए. एक तरफ मानसून की बेरुखी से फसलों के उत्पादन पर संकट मंडरा रहा है, और दूसरी तरफ ईंधन की कीमतें. जब पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, तो ढुलाई यानी ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा बढ़ जाता है. अब सोचिए, खेत से सब्जी या अनाज मंडी तक आने का खर्चा पहले ही ज्यादा है, और अगर फसल कम हुई, तो बाजार में सप्लाई कम हो जाएगी.

अर्थशास्त्र का सीधा नियम है, सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा, तो दाम बढ़ेंगे ही. दिवाली और छठ जैसे त्योहारों के आसपास ये महंगाई सीधे आपकी थाली पर असर डालेगी. दाल, तेल और सब्जियों के दाम बढ़ सकते हैं, क्योंकि बाजार में उपलब्धता कम होगी और पेट्रोल के कारण ट्रांसपोर्टिंग कॉस्ट ज्यादा होगी.

पलायन का वो दर्द जो आंकड़ों में नहीं दिखता

इस पूरे घटनाक्रम का एक बहुत बड़ा मानवीय पहलू भी है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. वो है ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मजदूरों का पलायन. कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक जब खेतों में बुवाई नहीं होती, तो खेतिहर मजदूरों के पास काम नहीं रहता. ऐसे में वो पेट पालने के लिए शहरों की तरफ भागते हैं. गांवों में मनरेगा पर काम का दबाव अचानक बढ़ जाता है.

लातूर और विदर्भ जैसे इलाकों में, जहां अक्सर सूखा पड़ता है, वहां किसानों की कमर टूट जाती है. ये सिर्फ फसल का नुकसान नहीं है, ये एक परिवार की पूरी साल भर की कमाई और उम्मीदों का मरना है. जब तक बुवाई नहीं होती, ग्रामीण भारत का ये चक्र रुका रहता है और यही वो चीज है जो देश की पूरी अर्थव्यवस्था को अंदर से खोखला कर देती है.

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देश के कई हिस्सों में बाढ़ की मार (फोटो- इंडिया टुडे)

मौसम की चाल!

मौसम की ये 'अजीब' चाल केवल एक खबर नहीं है, ये आने वाले समय के लिए एक बड़ी चेतावनी है. आधी जगह बाढ़ और आधी जगह सूखा, ये बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ चर्चाओं का विषय नहीं रहा, बल्कि ये हमारी रसोई तक पहुंच चुका है. सरकार को अब सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर उन इलाकों में राहत और वैकल्पिक फसलों की योजना बनानी होगी जहां बारिश नहीं हो रही. वरना ये मानसून का 'डबल अटैक' आने वाले त्योहारों की खुशियों को महंगा कर देगा.

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