‘370 रुपये की बिरयानी की वसूली’ वाला वीडियो आपने देख लिया होगा. वीडियो में आसपास बैठे लोगों के ठहाके इस बात को बता रहे थे कि ‘कंसेंट इज टेकेन फॉर ग्रांटेड'. यानी मानकर चलो कि लड़की डेट पर आई है तो इंटिमेसी के लिए सहमति देगी ही. इस वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई कि क्या पैसे से कंसेंट खरीदा जा सकता है, क्या डेटिंग एक इकोनॉमिक ट्रांजैक्शन है और क्या ज्यादातर पुरुष डेट पर पैसा खर्च करने के बदले महिलाओं से सेक्स की उम्मीद रखते हैं.
'₹370 की बिरयानी वसूलना' जैसी घटिया सोच आती कहां से है? स्टडी क्या कहती है?
सोशल मीडिया के दौर में डेटिंग वर्ड बहुत पॉपुलर हो गया है. अगर डेटिंग का सिंपल मीनिंग निकाला जाए तो एक ऐसा समय जिसमें दो लोग आपसी-सहमति से मिलते-जुलते हैं, बातें करते हैं, खाते-पीते हैं. और आगे बात बढ़ी तो सहमति से सेक्शुअली एंगेज होते हैं. लेकिन ये सिंपल डेफिनेशन है. क्या असल में डेटिंग इतनी सिंपल है?


सोशल मीडिया के दौर में डेटिंग वर्ड बहुत पॉपुलर हो गया है. अगर डेटिंग का सिंपल मीनिंग निकाला जाए तो एक ऐसा समय जिसमें दो लोग आपसी-सहमति से मिलते-जुलते हैं, बातें करते हैं, खाते-पीते हैं. और आगे बात बढ़ी तो सहमति से सेक्शुअली एंगेज होते हैं.
लेकिन ये सिंपल डेफिनेशन है. क्या असल में डेटिंग इतनी सिंपल है?
The Print में इस मुद्दे पर समा कंदील का एक आर्टिकल छपा है- “Men can’t buy women’s consent by paying for dinner. Dating is not vasooli.” समा लिखती हैं कि डेटिंग को इकोनॉमिक ट्रांजैक्शन के तौर पर लिया जाता है. क्योंकि सामाजिक व्यवस्था ऐसी रही है कि आर्थिक सत्ता ज्यादातर पुरुषों के पास ही होती है. महिलाओं को पढ़ाई, नौकरी, प्रॉपर्टी जैसे मौके सदियों बाद मिले जिनसे वो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो पाई. लेकिन ये मौके अब भी ज्यादातर महिलाओं के पास नहीं हैं.
इसलिए वो पैसे के लिए पुरुषों पर निर्भर रहीं. इसने रिलेशनशिप में पुरुषों की भूमिका को और मजबूत किया. वे महिला पर ज्यादा कंट्रोल चाहने लगे. अब कई महिलाओं, खासतौर पर शहरों में सिचुएशन बदल गई है. कई महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गई हैं. अब वो संभावनाएं तलाशने में नहीं हिचकतीं. डेट पर जाती हैं और खुद पे भी करती हैं. कई बार स्प्लिट यानी खर्चे बांट भी लेती हैं.

इन्हीं डेट्स पर ऐसे लोग भी आते हैं जो सेक्शुअली एडवेंचरस होने का दावा तो करते हैं, लेकिन दिमाग में महिला पर हावी होने की सोच नहीं बदल पा रहे. यही लोग मानते हैं कि डेट या किसी आउटिंग पर पुरुषों को ही पे करना चाहिए.
सेज का एक रिसर्च आर्टिकल है, ‘Who Pays for Dates? Following Versus Challenging Gender Norms’. इस रिसर्च में 84% पुरुषों ने कहा कि रिलेशनशिप में पुरुष महिलाओं से ज्यादा खर्च उठाते हैं. 58% महिलाओं ने भी माना कि पुरुष ही ज्यादा खर्च करते हैं. हालांकि, 6 महीने तक डेटिंग के बाद 74% पुरुष और 83% महिलाएं कहती हैं कि दोनों पार्टनर किसी न किसी रूप में खर्च शेयर करते हैं.
यानी हमेशा पुरुष ही पैसा खर्च करता है, ये बात पूरी तरह सही नहीं है. लेकिन कई लोग इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. उन्हें लगता है- ‘Man pays more and he should pay more.’
खर्च के बाद फेवर की उम्मीद?रिसर्च ये बात निकल कर आई है कि कई पुरुष डेट पर होने वाले खर्च के बदले महिला से सेक्शुअल फेवर की उम्मीद करते हैं. सेज के रिसर्च में पर्सेंटेज तो नहीं बताया गया, लेकिन ये जरूर कंफर्म किया गया है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में यह सोच अधिक थी कि डेट पर खर्च और फिजिकल इंटीमेसी अलग-अलग चीजें नहीं हैं बल्कि आपस में कनेक्ट हैं. यानी पैसा खर्च हुआ है तो सेक्शुअल फेवर तो मिलेगा ही.
साल 2011 में ‘You Owe Me’ स्टडी में पाया गया कि महंगी डेट के बाद पुरुषों में महिलाओं की तुलना में सेक्स की उम्मीद रखने की प्रोबैबिलिटी ज्यादा थी. वहीं, अगर डेट सस्ती हो या दोनों लोग बिल बराबर-बराबर बांट लें, तो महिलाओं पर पे बैक मोर का दबाव कम होता है. हालांकि ज्यादातर महिलाओं का मानना था कि किसी पुरुष के डिनर का बिल भरने से उसे सेक्स का राइट्स नहीं मिल जाता, लेकिन फिर भी कई महिलाएं यह दबाव महसूस करती हैं कि शायद पुरुष उनसे कुछ एक्सपेक्ट कर रहा है.
वजह क्या है?
रिसर्च पेपर ‘First Date Sexual Expectations: The Effects of Who Asked, Who Paid, Date Location, and Gender’ में Sexual Script Theory का जिक्र किया गया है. ये थ्योरी कहती है कि समाज हमें पहले से कुछ रूल्स या स्क्रिप्ट सिखा देता है कि लड़का और लड़की डेट पर कैसे बिहेव करेंगे. इस रिसर्च में कल्चर स्क्रिप्ट का भी जिक्र है, जिसके मुताबिक, समाज में लंबे समय से यह माना जाता रहा है,
- लड़का ही डेट के लिए पूछेगा
- लड़का ही खर्च करेगा
- लड़का दरवाजा खोलेगा, लड़की को पिक अप/ड्रॉप करेगा
- लड़का ही रोमांटिक या फिजिकल इंटीमेसी की शुरुआत करेगा
यानी परंपरा की तरह पुरुष को ‘एक्टिव’ और महिला को ‘री-एक्टिव’ का रोल दिया गया है. मतलब अगर पुरुष पूरा बिल भरता है, तो उसको लग सकता है कि महिला का उन पर ‘कुछ बकाया’ है. इसी वजह से कुछ लोगों के मन में यह धारणा बन जाती है कि पैसा खर्च करने के बदले कुछ मिलना चाहिए.

प्रणीत के शो में जो हुआ, उससे ये साबित भी होता है. पूरे वाकये के दौरान हिमांशु का कॉन्फिडेंस परेशान करने वाला था. लेकिन बात सिर्फ एक इंडिविजुअल की नहीं है. शो में मौजूद ज्यादातर ऑडियंस उसकी बातों को एन्जॉय कर रही थी. अगर लोग उसकी बातों को नॉर्मल नहीं मानते तो बार-बार हंसते नहीं दिखते.
अमेरिकन नॉवेलिस्ट एमी हैटवेनी ने कंसेंट पर अपने पर्सनल एक्सपीरिएंस शेयर करते हुए बताया है कि वे खुद सेक्शुअल असॉल्ट से गुजर चुकी हैं. उनका कहना है कि समाज लड़कियों को तो यह सिखाता है कि खुद को कैसे सेफ रखें, लेकिन लड़कों को यह कम सिखाता है कि सामने वाले के कंसेंट, डिस्कम्फर्ट और बाउंड्री को कैसे समझें.
केवल ‘No Means No’ और ‘Yes Means Yes’ हमेशा सफिशियंट नहीं होते, क्योंकि कई बार कोई व्यक्ति डर, दबाव या मजबूरी में ‘हां’ कह देता है. एमी का मानना है कि असली सहमति तब होती है जब सामने वाला व्यक्ति खुशी और उत्साह से शामिल हो, न कि डर या दबाव में. सिर्फ औपचारिक 'हां' लेना काफी नहीं है. सामने वाले की भावनाओं, डर, असहजता और मनःस्थिति को समझना भी जरूरी है.
वीडियो: सोशल लिस्ट: 370 Biryani Controversy: प्रणित मोरे की वायरल क्लिप पर Male Comedians गायब?




















