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POCSO केस का दोषी बेल पर छूटा तो पीड़िता ने उसी से शादी कर ली, सुप्रीम कोर्ट ने सजा रद्द की

Supreme court quashes POCSO case: सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज' (POCSO) एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा रद्द कर दी है. क्योंकि पीड़िता ने बालिग होने के बाद दोषी से शादी कर ली. शख्स को 10 साल की सजा सुनाई गई थी.

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आरोपी को 2019 में ट्रायल कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई थी. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए POCSO एक्ट के तहत दोषी व्यक्ति की सजा रद्द कर दी क्योंकि पीड़िता ने बालिग होने के बाद उससे शादी की।
  • पीड़िता ने आरोपी से शादी की जिसके बाद मामले में सुलह हुई, जबकि पहले शिकायत में आरोपी पर नाबालिग से संबंध बनाने का आरोप था जिसके कारण उसे ट्रायल कोर्ट ने सजा सुनाई थी।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आरोपी और पीड़िता पति-पत्नी के रूप में शांति से जीवन बिताने के लिए स्वतंत्र हैं और इस निर्णय को किसी अन्य मामले के लिए मिसाल नहीं माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज' (POCSO) एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा रद्द कर दी है. जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सजा को रद्द किया है. क्योंकि पीड़िता ने बालिग होने के बाद आरोपी से शादी कर ली.

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संविधान का आर्टिकल 142 सुप्रीम कोर्ट को अधिकार देता है कि वो अपने पास लंबित किसी भी मामले में 'पूरा न्याय' करने के लिए जरूरी कोई भी आदेश दे सके. Live law की रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़िता जब 12वीं क्लास में थी, तब वो आरोपी के साथ रिश्ते में थी. पीड़िता ने जब शादी की बात कही, तो शख्स ने इनकार कर दिया. 

इसके बाद महिला ने पुलिस थाने में उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई. दावा किया कि आरोपी ने शादी का वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे. लेकिन बाद में उसने शादी करने से इनकार कर दिया. पुलिस ने नाबालिग से शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में उसे गिरफ्तार किया. 2019 में ट्रायल कोर्ट ने POCSO एक्ट की धारा 5(1) और 6 के तहत दोषी ठहराते हुए आरोपी को 10 साल की सजा सुना दी.

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बाद में महिला की किसी और से शादी हो गई. लेकिन जब पति को उसके पिछले रिश्ते के बारे में पता चला, तो उसने लड़की को कुछ दिनों बाद छोड़ दिया. इसके बाद वो अपने पिता के साथ रहने लगी. इस बीच वो शख्स जमानत पर बाहर आ गया जिसे POCSO के तहत सजा हुई थी. उसने महिला से बात की. दोनों के बीच सुलह हुई जिसके बाद उन्होंने एक-दूसरे से शादी कर ली. 

सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत

अब वो शख्स महिला का पति बन चुका था. ऐसे में महिला ने फिर मद्रास हाई कोर्ट में पति की सजा को रद्द करने की मांग की. पीड़िता ने कहा कि वो और आरोपी साथ रह रहे हैं, इसलिए मामले को खत्म करना चाहती है. उसकी सजा को रद्द करना चाहती है. लेकिन हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया. इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख अपनाया.

मामले पर जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा,

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“पीड़िता ने बालिग होने के बाद आरोपी से शादी कर ली. अपीलकर्ता से पीड़िता को मामले में मुआवजे की रकम (10 लाख रुपये) भी मिल चुकी है. इसलिए, हम POCSO एक्ट की धारा 5(1) के तहत शख्स को दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द करने के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी खास शक्तियों का इस्तेमाल करना उचित समझते हैं. और दर्ज बयानों के आधार पर अपीलकर्ता को आरोप से बरी किया जाता है.”

अदालत ने आगे कहा कि अपीलकर्ता और पीड़िता समाज में पति-पत्नी के तौर पर शांति से जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं. साथ ही ये भी कहा कि उन्होंने ये फैसला खास तथ्यों के आधार पर दिया है. इसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए मिसाल नहीं माना जाएगा.

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