अगर आपको दिल से जुड़ी कोई दिक्कत है, तो ये मत समझिए कि उसका असर सिर्फ़ दिल तक है. कमज़ोर दिल की कीमत किडनी भी चुकाती है. अब इन दोनों के बीच क्या कनेक्शन है और क्यों है, ये जानेंगे आज. डॉक्टर से समझेंगे कि दिल और किडनी आपस में कैसे जुड़े हैं. दिल की बीमारी से किडनी पर कैसे असर पड़ता है. हार्ट फ़ेलियर होने पर किडनी को क्या नुकसान हो सकता है. और हार्ट फ़ेलियर में अपनी किडनी को कैसे बचाएं.
दिल की बीमारी का किडनी पर कैसे पड़ता है असर? हार्ट फ़ेलियर में किडनी को ऐसे बचाएं
डॉक्टर से समझेंगे कि दिल और किडनी आपस में कैसे जुड़े हैं. दिल की बीमारी से किडनी पर कैसे असर पड़ता है. हार्ट फ़ेलियर होने पर किडनी को क्या नुकसान हो सकता है. और हार्ट फ़ेलियर में अपनी किडनी को कैसे बचाएं.

दिल की बीमारी से किडनी पर कैसे असर पड़ता है?
ये हमें बताया डॉक्टर उदित गुप्ता ने.

दिल और किडनी का एक-दूसरे से सीधा संबंध है. दिल की बीमारी होने पर उसका असर किडनी पर पड़ सकता है. वहीं, किडनी की बीमारी होने पर उसका असर दिल पर भी पड़ सकता है
दिल की बीमारी की वजह से किडनी में होने वाली समस्याओं को कार्डियोरेनल सिंड्रोम कहते हैं. इसके पांच प्रकार होते हैं- कार्डियोरेनल सिंड्रोम टाइप 1, 2, 3, 4 और 5. जब दिल की पंपिंग क्षमता कम हो जाती है. तब किडनी तक पहुंचने वाले ब्लड फ्लो पर असर पड़ सकता है. ऐसे में किडनी शरीर से वेस्ट प्रोडक्ट्स (गंदगी) को ठीक से बाहर नहीं निकाल पाती. इससे किडनी को नुकसान पहुंचने लगता है. इसे एक्यूट किडनी इंजरी यानी AKI कहा जाता है. अगर किडनी की समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो ये क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ का कारण बन सकती है.
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हार्ट फ़ेलियर में किडनी को क्या नुकसान हो सकता है?
जिन लोगों को दिल की बीमारी है. खासकर जिनका हार्ट फ़ेलियर है और दिल की पंपिंग क्षमता कम है. उनके शरीर में पानी जमा होने लग सकता है. इसका असर किडनी पर भी पड़ता है. ऐसे में किडनी शरीर में पानी और नमक को रोकने लगती है. इससे शरीर में और ज़्यादा पानी जमा हो सकता है. इस स्थिति को फ्लूइड ओवरलोड कहा जाता है. इसकी वजह से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और हाई बीपी से जुड़ी दूसरी समस्याएं भी हो सकती हैं.
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हार्ट फ़ेलियर में किडनी को कैसे बचाएं?
हार्ट फ़ेलियर के मरीज़ों को मेटाबॉलिज़्म से जुड़ी दूसरी बीमारियां भी हो सकती हैं. जैसे डायबिटीज़, हाई बीपी और डिस्लिपिडेमिया. इन सभी बीमारियों को कंट्रोल में रखना ज़रूरी है. अगर किसी मरीज़ को हार्ट फ़ेलियर है, तो उसकी दवा लें. इनमें ARBs और SGLT2 इनहिबिटर्स जैसी दवाएं शामिल हो सकती हैं. ये दवाएं दिल और किडनी, दोनों को सुरक्षित रखने में मदद करती हैं.
अगर हार्ट फ़ेलियर की वजह से शरीर में ज़्यादा पानी जमा हो जाए. तब मरीज़ की ज़रूरत के हिसाब से डाइयूरेटिक्स दवाएं देनी पड़ती हैं . इसके अलावा, दिल और किडनी को सुरक्षित रखने वाली दूसरी दवाएं भी लेनी चाहिए.
दिल की दिक्कत सिर्फ़ दिल तक नहीं रहती. ये आपकी किडनी पर भी असर डालने लगती है. इसलिए अगर आप दिल की किसी बीमारी के मरीज़ हैं, तो अपनी दवाएं टाइम पर लें और बीच-बीच में किडनी से जुड़े टेस्ट भी कराते रहें.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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