बॉलिवुड एक्ट्रेस नुसरत भरूचा की रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया है. वो काम और छुट्टियों के सिलसिले में इंडोनेशिया के बाली गई हुई थीं. जहां वो एक हादसे का शिकार हो गईं. उन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया. अब नुसरत की सर्जरी होनी है. इसके लिए उन्हें एयर एंबुलेंस से वापस मुंबई लाया गया है. सर्जरी कब होगी, इस बात की जानकारी फिलहाल उनकी टीम ने शेयर नहीं की है.
नुसरत भरूचा रीढ़ की हड्डी के फ्रैक्चर से कब तक ठीक होंगी? डॉक्टर से सब समझिए
रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर की मुख्य वजह चोट या ट्रॉमा होती है. अगर किसी व्यक्ति की हड्डियां मज़बूत हैं. तब भी तेज़ चोट या ट्रॉमा से रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो सकता है.

इधर नुसरत के फैंस परेशान हैं. वो जानना चाहते हैं कि रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर कितना गंभीर है और उन्हें पूरी तरह ठीक होने में कितना समय लग सकता है. तो चलिए फिर. आज डॉक्टर से समझेंगे कि रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर किन वजहों से हो सकता है. फ्रैक्चर होने पर कौन-से लक्षण दिखते हैं. मरीज़ को अस्पताल ले जाते वक्त क्या सावधानियां बरतें. रीढ़ में हड्डी में फ्रैक्चर होने पर कब सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है, कब बिना सर्जरी इलाज किया जा सकता है और मरीज़ को पूरी तरह ठीक होने में कितना टाइम लगता है.
रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर की मुख्य वजहें
ये हमें बताया डॉक्टर मनीष गर्ग ने.

रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर की मुख्य वजह चोट या ट्रॉमा होती है. अगर किसी व्यक्ति की हड्डियां मज़बूत हैं. तब भी तेज़ चोट या ट्रॉमा से रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो सकता है. कुछ लोगों में ऑस्टियोपोरोसिस या किसी बीमारी से हड्डियां कमज़ोर हो सकती हैं. ऐसे में हल्की चोट या दबाव पड़ने पर भी रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो सकता है.
रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर के लक्षण
रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर का मुख्य लक्षण दर्द होता है. जिस हिस्से में फ्रैक्चर हुआ है, उसी जगह दर्द महसूस होता है. हिलने-डुलने, बैठने या चलने पर दर्द काफी बढ़ सकता है. ये दर्द आमतौर पर एक ही जगह पर रहता है. कई बार फ्रैक्चर के बाद हड्डी का टुकड़ा रीढ़ की हड्डी के अंदर की नली में आ जाता है. ऐसे में दर्द पैरों और कूल्हों तक भी फैल सकता है.
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रीढ़ की चोट में मरीज़ को अस्पताल ले जाने में क्या सावधानियां बरतें?
अगर किसी व्यक्ति को तेज़ चोट लगी है और रीढ़ में फ्रैक्चर की आशंका है. ऐसे में जब तक ये पता न चल जाए कि फ्रैक्चर नहीं हुआ है. तब तक मानकर चलें कि उसकी रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो सकता है. ऐसे मरीज़ को उठाते या अस्पताल ले जाते समय स्पाइनल बोर्ड का इस्तेमाल करें. गर्दन, हाथ-पैर और कूल्हों को ज़्यादा हिलाने-डुलाने से बचें. ज़्यादा मूवमेंट से फ्रैक्चर वाली हड्डी के टुकड़े खिसककर रीढ़ की हड्डी के अंदर की नली में जा सकते हैं. इससे गंभीर समस्या हो सकती है. इसलिए रीढ़ में चोट की आशंका होने पर मरीज़ को सीधा लिटाकर रखें. फिर स्पाइनल बोर्ड की मदद से ही उसे ट्रांसफर करें.

सर्जरी की ज़रूरत कब पड़ती है और कब नहीं?
अगर रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हुआ है, लेकिन हड्डी अपनी जगह से नहीं खिसकी है. रीढ़ की हड्डी की ऊंचाई में भी ज़्यादा कमी नहीं आई है. तब उस स्थिति में आराम और इलाज से ये ठीक हो सकता है. ऐसे मामलों में आमतौर पर सर्जरी की ज़रूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर हड्डी टूटकर धंस गई है या रीढ़ की हड्डी के अंदर की नली में आ गई है. तब सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है.
अगर हड्डी में फ्रैक्चर है, लेकिन वो धंसी नहीं है. नसों या रीढ़ की हड्डी पर भी दबाव नहीं डाल रही. तब कम चीरे वाली सर्जरी की जा सकती है. इसमें हड्डी के कमज़ोर हिस्से में बोन सीमेंट डाला जाता है, जिसे बैलून काइफोप्लास्टी कहा जाता है. इस प्रक्रिया के बाद मरीज़ को अगले दिन चलाया जा सकता है, क्योंकि फ्रैक्चर वाला हिस्सा बोन सीमेंट से मज़बूत हो जाता है. इससे दर्द काफी कम हो जाता है. फ्रैक्चर के टुकड़ों के खिसककर रीढ़ की हड्डी के अंदर की नली में जाने या नसों पर दबाव डालने का ख़तरा भी कम हो जाता है.
लेकिन अगर टूटी हुई हड्डी का हिस्सा अंदर की नली में आकर नसों या रीढ़ की हड्डी पर दबाव डाल रहा है. तब बड़ी सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है. इसमें रीढ़ की हड्डी को स्थिर किया जाता है और नसों पर दबाव डाल रहे हड्डी के टुकड़ों को हटा दिया जाता है.
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रिकवरी में कितना वक्त लगता है?
रीढ़ की हड्डी में चोट लगने पर पहले ये देखा जाता है कि चोट कितनी गंभीर है. ये भी देखा जाता है कि कमर से नीचे के हिस्से में कितनी कमज़ोरी है. शरीर की संवेदना और मांसपेशियों की ताकत पर कितना असर हुआ है. इनके आधार पर ही मरीज़ की रिकवरी का अंदाज़ा लगाया जाता है. अगर मरीज़ को कोई कमज़ोरी नहीं है, तो सर्जरी के अगले दिन उसे चलाया जा सकता है. ऐसे मरीज़ घर जाने के बाद एक से डेढ़ हफ्ते में अपने रोज़मर्रा के काम शुरू कर सकते हैं. लेकिन अगर मरीज़ को हाथ-पैरों में कमज़ोरी है या चोट ज़्यादा गंभीर है. तब उसे लंबे समय तक फिज़ियोथेरेपी की ज़रूरत पड़ सकती है. ऐसे मरीज़ों को सामान्य जीवन में लौटने में थोड़ा ज़्यादा समय लग सकता है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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