भारत में डायबिटीज का खतरा अब सिर्फ शहरों, अमीर परिवारों या उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं रह गया है. बीमारी का फैलाव देश के अलग-अलग हिस्सों में दिख रहा है और कम उम्र में भी लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां सामने आ रही हैं. पिछले दिनों केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कैंसर, डायबिटीज, मोटापा और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियों के खिलाफ देशव्यापी जन आंदोलन की जरूरत बताई. उन्होंने साफ कहा कि इन बीमारियों से निपटने की रणनीति सिर्फ अस्पतालों और इलाज तक सीमित नहीं रह सकती. जल्दी जांच, सही मेडिकल सलाह और वैज्ञानिक जानकारी को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना होगा.
भारत बन रहा है दुनिया की डायबिटीज राजधानी, ग्रामीण इलाकों में तेजी से फैल रही बीमारी
India’s Growing Diabetes Burden: भारत में डायबिटीज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है. सरकारी आंकड़ों में डायबिटीज से प्रभावित भारतीयों की संख्या 10.1 करोड़ बताई गई है. कई राष्ट्रीय और इंटरनेशनल संस्थाओं की स्टडी बताती है कि ये बीमारी शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी तेजी से पैर पसार रही है.

हालांकि एक बात यहां साफ करना जरूरी है. उपलब्ध सरकारी बयान में डॉ. जितेंद्र सिंह ने डायबिटीज को अलग से "राष्ट्रीय प्राथमिकता" घोषित करने या खास तौर पर "ग्रामीण इलाकों में तेजी से फैल रही बीमारी" कहने की बात नहीं कही है. उनका जोर व्यापक तौर पर नॉन कम्युनिकेबल डिजीज, बदलती जीवनशैली और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर पर था. इसलिए खबर को सनसनीखेज बनाने के बजाय इसके असली मतलब को समझना ज्यादा जरूरी है.
भारत में डायबिटीज का आंकड़ा कितना बड़ा है
ICMR INDIAB की देशव्यापी स्टडी भारत में डायबिटीज की तस्वीर को काफी गंभीर बनाती है. 2023 में The Lancet Diabetes & Endocrinology में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक भारत में 20 साल या उससे ज्यादा उम्र की आबादी में डायबिटीज की अनुमानित हिस्सेदारी 11.4 फीसदी थी. स्टडी में 1,13,043 लोगों का डेटा शामिल किया गया, जिसमें 79,506 ग्रामीण और 33,537 शहरी प्रतिभागी थे. इसी स्टडी में हिस्सा लेने वालों में 15.3 फीसदी लोग प्री-डायबिटीज की चपेट में आ चुके थे.
सरकारी आंकड़ों में भी इसी अध्ययन के आधार पर भारत में डायबिटीज से प्रभावित लोगों की संख्या करीब 10.1 करोड़ बताई गई थी. यानी मामला सिर्फ ब्लड शुगर की कुछ रिपोर्ट खराब आने तक सीमित नहीं है. इसके पीछे करोड़ों लोगों की आबादी है और उससे भी बड़ा समूह ऐसा हो सकता है जो प्रीडायबिटीज की स्थिति में है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर International Diabetes Federation के 2024 अनुमान के मुताबिक भारत में 20 से 79 साल की उम्र के करीब 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज के साथ जी रहे थे. IDF के मुताबिक 2050 तक ये संख्या करीब 15.67 करोड़ तक पहुंच सकती है, अगर मौजूदा रुझान बने रहते हैं. अलग-अलग रिपोर्टों में उम्र की सीमा और अनुमान लगाने की पद्धति अलग होने के कारण आंकड़े अलग दिख सकते हैं.
गांवों की तस्वीर को सिर्फ शहर बनाम गांव की तरह देखना गलत क्यों है
पुरानी सोच में डायबिटीज को अक्सर शहरी जीवनशैली से जोड़ा जाता था. लेकिन भारत की तस्वीर बदल रही है. ICMR INDIAB अध्ययन में डायबिटीज का प्रसार शहरी इलाकों में ग्रामीण इलाकों से ज्यादा पाया गया. लेकिन शोधकर्ताओं ने ये भी पाया कि भारत के ज्यादातर राज्यों में डायबिटीज का बोझ अभी बढ़ रहा है. खासकर कम विकसित राज्यों में प्रीडायबिटीज का बड़ा आधार भविष्य के खतरे की तरफ इशारा करता है.
यानी गांव में रहने वाला व्यक्ति सिर्फ इसलिए सुरक्षित नहीं है कि वो महानगर में नहीं रहता. खेती और शारीरिक श्रम का पारंपरिक मॉडल बदल रहा है. मोटरसाइकिल और डिजिटल स्क्रीन से लेकर पैकेज्ड फूड, मीठे पेय और बदलते खानपान तक, रोजमर्रा की आदतें तेजी से बदल रही हैं. WHO भी मानता है कि शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के साथ ज्यादा प्रोसेस्ड भोजन, फ्री शुगर और अस्वास्थ्यकर फैट की खपत बढ़ना नॉन कम्युनिकेबल डिजीज के जोखिम को बढ़ाता है.
डायबिटीज आखिर होती कैसे है
डायबिटीज में शरीर या तो पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या फिर शरीर इंसुलिन का प्रभावी इस्तेमाल नहीं कर पाता. टाइप 2 डायबिटीज इसका सबसे आम रूप है. ज्यादा वजन, पेट के आसपास जमा फैट, कम शारीरिक गतिविधि, असंतुलित खानपान और कुछ आनुवंशिक कारण इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं.
मगर सिर्फ खानपान ही डायबिटीज का एक मात्र कसूरवार नहीं है. कैलाश हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा के कंसलटेंट फिजिशियन डॉ. तुषार गोयल कहते हैं.
भारत में डायबिटीज़ के बढ़ते मामलों को सिर्फ मीठा खाने की आदत से जोड़कर देखना सही नहीं होगा. इसके पीछे हमारी पूरी जीवनशैली में आया बदलाव जिम्मेदार है। पिछले कुछ दशकों में शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं, खान-पान में प्रोसेस्ड और रिफाइंड फूड की हिस्सेदारी बढ़ी है और मोटापा भी तेजी से बढ़ा है. इन सभी चीजों का सीधा असर शरीर के इंसुलिन और ब्लड शुगर कंट्रोल करने की क्षमता पर पड़ता है.
समस्या ये भी है कि टाइप 2 डायबिटीज कई बार शुरुआत में साफ संकेत नहीं देती. व्यक्ति बिल्कुल सामान्य महसूस कर सकता है और बीमारी अंदर ही अंदर आगे बढ़ सकती है. इसी वजह से ब्लड ग्लूकोज की समय पर जांच महत्वपूर्ण है. WHO के मुताबिक शुरुआती पहचान और इलाज से बीमारी के गंभीर परिणामों को टाला या देर से आने दिया जा सकता है.
बचाव का सबसे बड़ा हथियार क्या है
डायबिटीज से बचने की शुरुआत किसी महंगे हेल्थ पैकेज से नहीं, रोज की आदतों से होती है. WHO टाइप 2 डायबिटीज की रोकथाम के लिए स्वस्थ वजन बनाए रखने, नियमित शारीरिक गतिविधि, बेहतर खानपान और तंबाकू से दूरी की सलाह देता है. कम से कम 150 मिनट की सामान्य फिजिकल एक्टीविटी (moderate intensity physical activity) हर हफ्ते एक प्रैक्टिकल टारगेट होना चाहिए.
इसका मतलब ये नहीं कि हर शख्स को जिम जाना ही पड़ेगा. तेज गति से पैदल चलना, साइकिल चलाना, तैरना, डांस करना या अपनी क्षमता के अनुसार दूसरी गतिविधियां भी शारीरिक सक्रियता का हिस्सा हो सकती हैं. लंबे समय तक लगातार बैठे रहना कम करना भी जरूरी है.
खाने की प्लेट में भी बदलाव उतना ही जरूरी है. WHO की 2026 की हेल्दी डाइट गाइडेंस (healthy diet guidance) के मुताबिक कम से कम प्रोसेस किया हुआ (minimally processed) और बिना प्रॉसेस किया हुआ खाना, साबुत अनाज, दालें, सब्जियां और फल स्वस्थ आहार की बुनियाद हैं. वहीं ज्यादा शुगर फ्री, अनहेल्दी फैट और ज्यादा नमक वाले भोजन को सीमित करना चाहिए.
अब टेक्नोलॉजी कहां काम आएगी
डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्वास्थ्य व्यवस्था में भारतीय डेटा और भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक समाधान विकसित करने पर जोर दिया. उन्होंने AI powered लैंग्वेज टूल्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल क्लीनिक जैसी तकनीकों के जरिए हेल्थकेयर की पहुंच बढ़ाने की संभावना भी बताई.
डायबिटीज जैसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट में इसका मतलब सिर्फ AI से बीमारी का इलाज करना नहीं है. असली फायदा बेहतर डेटा, समय पर स्क्रीनिंग, जोखिम वाले लोगों की पहचान, फॉलोअप और सही स्वास्थ्य जानकारी को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में हो सकता है. लेकिन टेक्नोलॉजी तभी काम करेगी जब उसके पीछे प्रमाणित मेडिकल गाइडलाइन और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी हों.
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आखिर आम आदमी को क्या करना चाहिए
सबसे पहले अपने जोखिम को समझिए. परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, वजन ज्यादा है, पेट का घेरा बढ़ रहा है, शारीरिक गतिविधि बहुत कम है या डॉक्टर ने ब्लड शुगर को लेकर चिंता जताई है तो जांच को टालना समझदारी नहीं है.
दूसरा, मीठे पेय, जरूरत से ज्यादा प्रोसेस्ड फूड और लगातार बाहर का खाना रोज की आदत न बनने दें. तीसरा, दिन में नियमित शारीरिक गतिविधि के लिए समय निकालें. चौथा, तंबाकू से दूरी रखें. और पांचवां, सोशल मीडिया पर मिलने वाले किसी चमत्कारी इलाज या डाइट टिप को डॉक्टर की सलाह का विकल्प न मानें.
लल्लनटॉप से बात करते हुए कंसलटेंट फिजिशियन डॉ. तुषार गोयल कहते हैं,
आज जरूरत इस बात की है कि डायबिटीज की रोकथाम को सिर्फ अस्पताल या डॉक्टर तक सीमित न रखा जाए. परिवार, स्कूल, कार्यस्थल और ग्रामीण समुदाय - हर स्तर पर खान-पान, शारीरिक गतिविधि, वजन और नियमित ब्लड शुगर जांच को लेकर जागरूकता बढ़ानी होगी. यही वजह है कि डायबिटीज की रोकथाम को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने की चर्चा महत्वपूर्ण है.
डॉ. जितेंद्र सिंह की अपील का असली संदेश भी यही है. डायबिटीज के खिलाफ लड़ाई सिर्फ डॉक्टर के क्लिनिक में नहीं जीती जाएगी. बीमारी सामने आने के बाद इलाज जरूरी है, लेकिन उससे पहले जोखिम को पहचानना, समय पर जांच कराना और जीवनशैली को सुधारना कहीं ज्यादा बड़ा हथियार है. भारत अगर डायबिटीज के बढ़ते बोझ को रोकना चाहता है तो प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को सरकारी कार्यक्रमों से निकालकर घर, स्कूल, दफ्तर और समुदाय की रोजमर्रा की आदत बनाना होगा. यही उस जन आंदोलन का मतलब है जिसकी बात केंद्रीय मंत्री ने की है.
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