आप ऑफिस में आराम से अपना काम कर रहे थे. तभी बॉस ने गुस्से में कुछ बोल दिया. पहले तो आप नाराज़ हुए. फिर हो गए उदास. ये नाराज़गी और उदासी, दोनों ही इमोशन हैं. और पता है इमोशंस के साथ सबसे अच्छी बात क्या है? ये ज़्यादा देर तक नहीं टिकते. उदासी तो बिल्कुल भी नहीं. एक दिन रहेगी, दो दिन रहेगी, पर ढल जाएगी. लेकिन क्या हो कि उदासी कम होने का नाम ही न ले. हफ्तों-महीनों तक आप सिर्फ उदास रहें. घर में, काम पर, दोस्तों के साथ. जगह चाहें जो हो. लोग चाहें जो हो. आप हमेशा मायूस रहें. एक गम घेरे रहे आपको. क्या तब भी ये उदासी कहलाएगी? नहीं. अब ये उदासी नहीं है. ये इशारा है डिप्रेशन का.
हमेशा गम में रहते हैं, ये उदासी है या डिप्रेशन? डॉक्टर ने सारे लक्षण बता दिए
उदासी आमतौर पर कुछ समय के लिए होती है. कुछ लोगों में मौसम बदलने पर उदासी होती है, इसे सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर कहते हैं.


कब डिप्रेशन में बदलने लगती है उदासी, यही जानेंगे आज. डॉक्टर से ये भी समझेंगे कि डिप्रेशन क्यों होता है. क्या हर उदासी डिप्रेशन होती है. डिप्रेशन और उदासी के बीच क्या फर्क है. और डिप्रेशन का इलाज क्या है.
क्या हर उदासी डिप्रेशन होती है?हमें बताया पद्म श्री डॉ. संजीव बगई ने.

उदासी आमतौर पर कुछ समय के लिए होती है. कुछ लोगों में मौसम बदलने पर उदासी होती है, इसे सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर कहते हैं. ये डिप्रेशन का एक प्रकार हो सकता है, जो हर साल एक खास मौसम में दोबारा हो सकता है. लेकिन ज़्यादातर मामलों में उदासी अस्थायी होती है. इसमें व्यक्ति मायूस महसूस करता है. एनर्जी कम हो जाती है, थकान रहती है. काम में मन नहीं लगता. स्कूल जाने का मन नहीं करता. पढ़ाई में मन नहीं लगता. खेलकूद में रुचि कम हो जाती है. ज़रूरत से ज़्यादा थकान या ज़्यादा नींद आने लगती है. मीठा और तली-भुनी चीज़ें खाने की इच्छा बढ़ जाती है. नींद का पैटर्न बिगड़ जाता है. वज़न बढ़ने लगता है. व्यक्ति लोगों से मिलना-जुलना कम कर देता है या अकेला रहने लगता है.
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कब डिप्रेशन में बदलने लगती है उदासी?लंबे समय तक रहने वाली उदासी डिप्रेशन की ओर बढ़ती है. डिप्रेशन बिना किसी बड़ी वजह के भी हो सकता है. डिप्रेशन कई प्रकार का होता है. मेजर डिप्रेसिव डिसऑर्डर इसका एक आम और गंभीर प्रकार है. इसमें लंबे समय तक उदासी बनी रहती है. रोज़ के काम करने में मन नहीं लगता. सोचने-समझने और फैसले लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. चीज़ों को समझने और महसूस करने का तरीका भी बदल सकता है.
डिप्रेशन होने पर व्यक्ति भावनात्मक रूप से परेशान रहने लगता है. हर समय खालीपन महसूस हो सकता है. निराशा बनी रहती है, चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है. बेचैनी या एंग्ज़ायटी हो सकती है. गुस्सा ज़्यादा आने लगता है.

थोड़ी फिज़िकल एक्टिविटी करने पर भी ज़्यादा थकान महसूस होती है. बिना वजह सिरदर्द हो सकता है. शरीर, पीठ या पेट में दर्द की शिकायत हो सकती है. पैरों में दर्द भी हो सकता है. ध्यान लगाने और याद रखने में दिक्कत हो सकती है. पुरानी बातें याद करने में परेशानी हो सकती है.
बच्चों में पढ़ाई और स्कूल में परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है. फैसले लेने में कठिनाई हो सकती है. व्यवहार में बदलाव आने लगते हैं. पढ़ना, पेंटिंग, संगीत या खेल जैसे शौक में रुचि खत्म हो सकती है. व्यक्ति लोगों से मिलना-जुलना कम कर देता है. नींद और भूख का पैटर्न बिगड़ सकता है.
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डिप्रेशन के कारण और इलाजडिप्रेशन के पीछे आनुवंशिक, जैविक, मानसिक और पर्यावरणीय कारण हो सकते हैं. परिवार, स्कूल, नौकरी, आर्थिक या रिश्तों की समस्याएं भी इसकी वजह बन सकती हैं. दिमाग में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे केमिकल्स का संतुलन बिगड़ सकता है. किसी अपने को खोना या लंबे समय तक स्ट्रेस में रहना डिप्रेशन ट्रिगर कर सकता है. दिल की बीमारी जैसी पुरानी बीमारियां भी इसका जोखिम बढ़ा सकती हैं.
डिप्रेशन का इलाज संभव है. इसलिए लक्षण दिखें, तो जल्द से जल्द मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से संपर्क करें. जितनी जल्दी इलाज शुरू होगा, ठीक होने की संभावना उतनी बेहतर होगी.
अगर आपके आसपास कोई ऐसा व्यक्ति है. कोई दोस्त, घर का कोई सदस्य, जिसमें लंबे समय से उदासी के लक्षण दिख रहे हैं, तो उससे बात करें. समझें कि उसे क्या दिक्कत है. और ज़रूरत पड़ने पर उसे मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल के पास लेकर जाएं. वो अलग-अलग थेरेपीज़ देंगे. पता करेंगे कि आखिर परेशानी क्या है और उसे दूर कैसे किया जाए. वैसे तो कई लोग थेरेपी से ठीक हो जाते हैं. पर ज़रूरत पड़ने पर दवाएं भी दी जा सकती हैं.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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