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हेवी मेटल्स से बच्चों को ऑटिज़्म का ख़तरा! जानिए AIIMS की स्टडी से क्या-क्या पता चला?

AIIMS की स्टडी के मुताबिक, हेवी मेटल्स के संपर्क में आने से बच्चों में ऑटिज़्म का ख़तरा बढ़ जाता है. हेवी मेटल्स ऐसे मेटल्स होते हैं, जिनकी थोड़ी मात्रा भी शरीर को बहुत नुकसान पहुंचाती है. जैसे लेड, मर्क्युरी और आर्सेनिक वगैरह.

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ऑटिज़्म एक जन्मजात कंडीशन है. (फोटो: Unsplash.com)

ऑटिज़्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल कंडिशन है. इसमें बच्चों के व्यवहार, उनके सीखने की क्षमता और दूसरों से बातचीत और बर्ताव करने के तरीके पर असर पड़ता है. अब तक ऑटिज़्म होने का कोई सटीक कारण पता नहीं था. मगर अब All India Institute of Medical Sciences यानी AIIMS ने एक स्टडी की है. इसके मुताबिक, हेवी मेटल्स के संपर्क में आने से बच्चों में ऑटिज़्म का ख़तरा बढ़ जाता है. 

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हेवी मेटल्स ऐसे मेटल्स होते हैं, जिनकी थोड़ी मात्रा भी शरीर को बहुत नुकसान पहुंचाती है. जैसे लेड, मर्क्युरी और आर्सेनिक वगैरह.

एम्स की स्टडी से पता चला है कि 3 से 12 साल के ऑटिस्टिक बच्चों के खून में मर्क्युरी, क्रोमियम, मैंगनीज़, लेड और सेलेनियम के लेवल बढ़े हुए थे. इस रिसर्च में 180 बच्चे शामिल किए गए थे. ऑटिज़्म से पीड़ित 32% बच्चों के खून में 7 हेवी मेटल्स का लेवल सामान्य से ज़्यादा था. इनमें से 27% बच्चों में क्रोमियम का लेवल ज़्यादा था. 22% में मर्क्युरी, 21% में लेड, 19% में सेलेनियम, 14% में मैंगनीज़, 13% में कॉपर और 2% बच्चों में निकेल का लेवल बढ़ा हुआ था.  

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स्टडी से ये भी पता चला कि ऑटिस्टिक बच्चों को ग्लूटन और केसिन-फ्री डाइट देने से उनके कुछ लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकती है. जैसे हाइपरएक्टिविटी यानी ज़रूरत से ज़्यादा एक्टिव होना. किसी काम में ध्यान न लगा पाना और नींद न आना.

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ऑटिस्टिक बच्चों को ग्लूटन और केसिन-फ्री डाइट देने से उनके कुछ लक्षणों को कम करने में मदद मिल सकती है (फोटो: Getty Images)

मगर ये ग्लूटन और केसिन-फ्री डाइट है क्या? ग्लूटन फ्री डाइट में ऐसी चीज़ें नहीं खाई जाती हैं जिनमें ग्लूटन होता है. ग्लूटन एक तरह का प्रोटीन है. ये गेहूं, राई और जौ वगैरह में पाया जाता है, लेकिन कई चीज़ें ऐसी हैं जिनमें ग्लूटन बिल्कुल नहीं होता. मसलन दालें, चावल, मकई यानी कॉर्न, क्विनोआ, नट्स और बीज वगैरह. ज़्यादातर फल और सब्ज़ियां भी ग्लूटन फ्री होती हैं.

वहीं केसिन-फ्री डाइट यानी ऐसी डाइट जिसमें केसिन नहीं होता. केसिन भी एक तरह का प्रोटीन है, जो दूध और दूध से बनी चीज़ें जैसे पनीर, दही, चीज़ और मक्खन में पाया जाता है.

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मीडिया से बातचीत में एम्स के पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट के चाइल्ड न्यूरोलॉजी डिवीज़न की इंचार्ज प्रोफेसर शेफाली गुलाटी ने बताया कि फिलहाल इस पर एक फॉलोअप रिसर्च चल रही है. इसमें ऑटिज़्म से पीड़ित 500 बच्चों और 100 नॉन-ऑटिस्टिक बच्चों को शामिल किया गया है. इनके खून और पेशाब के सैंपल्स के ज़रिए 21 तरह के हेवी मेटल्स की स्टडी की जा रही है. अभी तक, बच्चों के खून के साथ-साथ उनके पेशाब के सैंपल्स में भी हेवी मेटल्स की ज़्यादा मात्रा मिली है. आगे और रिसर्च जारी है.

डॉक्टर शेफाली का कहना है कि वैसे तो ऑटिज़्म लड़कियों की तुलना में लड़कों को 4.5 गुना ज़्यादा होता है. लेकिन, अब लड़कियों में भी इसके मामले बढ़े हैं.  

2021 में Indian Journal Of Pediatrics में छपी एक स्टडी के मुताबिक, भारत में हर 68 में से एक बच्चा ऑटिज़्म से प्रभावित है. वहीं देश के करीब 1.8 करोड़ लोगों को ऑटिज़्म है. 

हमने डॉक्टर कुशल अग्रवाल से इस स्टडी पर उनकी राय पूछी और जाना कि आखिर ऑटिज़्म का इलाज क्या है?

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डॉ. कुशल अग्रवाल, हेड, डिपार्टमेंट ऑफ नियोनेटोलॉजी एंड पीडियाट्रिक्स, केवीआर हॉस्पिटल, उत्तराखंड

डॉक्टर कुशल कहते हैं कि भारत में ऑटिज़्म के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. ये स्टडी होना अहम है क्योंकि अब तक ऑटिज़्म होने का कोई सटीक कारण पता नहीं चल सका है. ऐसे में इस स्टडी से रिसर्च के लिए नए रास्ते खुलेंगे. हो सकता है, आने वाले समय में हम ऑटिज़्म का इलाज भी ढूंढ पाएं.

फिलहाल तो ऑटिज़्म का कोई इलाज नहीं है. ये पूरे जीवन रहने वाली कंडीशन है. हालांकि कई सारी थेरेपीज़ हैं, जिनकी मदद से ऑटिस्टिक लोगों का जीवन बेहतर बनाया जा सकता है. जैसे बिहेवियर थेरेपी और स्पीच थेरेपी. बस ज़रूरी है कि ऑटिज़्म के लक्षणों को जल्दी से जल्दी पहचान लिया जाए.

जहां तक बात ग्लूटन और केसिन फ्री डाइट की है तो ऑटिस्टिक बच्चों में ये कारगर हो सकती है. ऑटिज़्म से पीड़ित कुछ बच्चों को ये खास प्रोटीन पचाने में दिक्कत होती है. जिसकी वजह से ये प्रोटीन पूरी तरह से न पचकर, छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाते हैं और खून में पहुंच जाते हैं. इससे उनकी इम्यूनिटी पर असर पड़ता है. गट लाइनिंग में इरिटेशन हो सकता है. गट लाइनिंग पेट में मौजूद एक परत है, जो चीज़ों को खून में जाने से रोकती है. ऐसे में बच्चों को पेट फूलने, कब्ज़ या दस्त जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. जिससे उन्हें असहज महसूस हो सकता है. इससे उनकी नींद, फोकस और व्यवहार पर असर पड़ता है. ऐसे में ये डाइट देना कारगर हो सकता है.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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