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अखिलेश को वो करना चाहिए जो मऊगंज में कन्हैया ड्रेसेज वालों ने किया था

सपा संकट में हैं, चुनाव निशान भी खतरे में हैं. संकट से बचने का उपाय ये रहा.

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फोटो - thelallantop
समाजवादी पार्टी में गृहक्लेश जिस लेवल तक आ गया है अब बस वही दिन देखना रह गया है जब पार्टी के झंडे पर लिखा रहेगा. 'नक्कालों से सावधान हमारी और कोई शाखा नहीं है.' अभी देखे कहां हो. अभी चुनाव तक ये झगड़ा खिंचा चला तो ये कार्यकर्ताओं को रोके रखने के लिए फूड वाउचर भी बांटेंगे. इसी स्पीड से झगड़े बढ़े, तो ये एक कार्यकर्ता के दो कार्यकर्ताओं को ज्वॉइन कराने पर 1500 रुपिया, एक महीने का निरमा और सूट का पैसा भी देंगे. बीजेपी की हालत याद करो. अभी तो मिसकॉल से मेंबर बनेंगे. फिलहाल पार्टी में चुनाव निशान पर झगड़ा चल रहा है. बात ऐसी चल रही थी कि दोनों धड़ों को अलग-अलग सिंबल और मान्यता दे दी जाए. इन बेचारों को ये भी नहीं कहा जा सकता कि इनको माया मिली न राम. रामवालों और मायावती दोनों से तो इनका कंपटीशन ही चल रहा है. तो हम बता रहे हैं, दुविधा में न रहें ये काम करें. 1. हमारे मऊगंज में एक दुकान थी, कन्हैया ड्रेसेज. फिर उसके भाई ने झगड़कर एक दुकान खोल ली नाम रखा. न्यू कन्हैया ड्रेसेज. अब न्यू कन्हैया ड्रेसेज वाले के बेटे ने पांच साल बाद जब अपनी अलग दुकान खोली तो नाम रखा सुपर कन्हैया ड्रेसेज. समाजवादी पार्टी के बागी नेता भी भी चाहें तो अपनी नई पार्टी का नाम न्यू समाजवादी पार्टी, सुपर समाजवादी पार्टी या समाजवादी पार्टी रिटर्न्स रख सकते हैं. 2. वो कहानी सुनी है, जहां एक भैंस होती है दो भाई होते हैं. आधी-आधी भैंस बांट लेते थे. दूसरा भाई जब पीछे से दूध निकालता तो एक भाई मुंह साइड मारता. ऐसा ही बंटवारा समाजवादी पार्टी भी कर ले. अखिलेश आगे का हिस्सा ले लें वहां से साइकल कंट्रोल करें. मुलायम पीछे का कैरियर ले लें क्योंकि उनके करियर में अब कुछ बचा है नहीं और अमर सिंह से लेकर शिवपाल तक सबको अंत तक उन्हें ही ढोना है. जरूरत कैरियर की ही है. 3. सपा की साइकल इस लायक भी नहीं बची है कि एक घर का गेंहू पिसवा पाए. भले वो घर मुलायम सिंह यादव का ही है. बात तो चलती है कि अखिलेश चुनाव निशान मोटरसाइकल ले लेंगे. बड़ा पुराना मजाक है. साइकल पर मोटर रख लेंगे. मोटर साइकल हो जाएगी. लेकिन यूपी में तो ये भी न चलेगा, वहां मोटर चलने को लाइट भी रहती है? तो निदान ये है कि दोनों धड़े लड़ें और जिसका पलड़ा भारी रहे, वो साइकल ले जाए. पिछड़े दल के हाथ घंटी आएगी. शेष आप स्त्रीलिंग-पुल्लिंग करके मजाक समझ ही गए होंगे. 4. शिवपाल कुछ चाहते हैं, रामगोपाल कुछ, अखिलेश कुछ चाहते हैं, मुलायम कुछ, आज़म कुछ चाहते हैं अमर सिंह कुछ. जब इतना विपक्ष है ही तो निर्वाचन आयोग इन्हीं के बीच चाहे तो एक छोटा सा विधानसभा चुनाव करा ले. जो जीते उसे बाद में फाइनल खेलने दिया जाए. ऐसा चला तो अंत में ये होगा कि सबके मन की हो जाएगी. हर कोई चाहता है अगले का पत्ता कैसे भी कट जाए, नतीजों में जनता खिसियाकर वही कर न दे. सब हार जाएं सबके मन की हो जाए.

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