सोमवार को, दीपावली की जाती रात को, एक घटना हुई जिससे इस फिल्म की याद आ गई.
पुलिस की ओर से मीडिया को बताया गया कि भोपाल की सेंट्रल जेल से आठ कैदी फरार हो गए जो प्रतिबंधित संगठन सिमी के कार्यकर्ता थे. पांच ऑफिसर्स को सस्पेंड कर दिया गया. फिर पुलिस ने जानकारी दी कि कुछ घंटों बाद भोपाल से दस किलोमीटर दूर एक गांव के पास एक पठार पर आठों को मार दिया गया है.
अब इस घटना के दो वर्जन है और सच कहीं इसके बीच में है.
एक वर्जन तो पुलिस और सरकार का है. सारी सूचनाएं उनकी ओर से आई हैं तो जो वो बता रहे हैं वो हम मान रहे हैं.
दूसरा वर्जन ये है कि एनकाउंटर फेक था. ऐसी बात सोशल एक्टिविस्ट और राजनेता कर रहे हैं.
क्या माना जाए और क्या न माना जाए इसी बीच तमिल फिल्म 'विसारनाय' याद आती है.
कहानी आंध्र प्रदेश में काम करने वाले कुछ तमिल मजदूरों की. पुलिस उन्हें उठा लेती है क्योंकि उन्हें एक चोरी का केस क्लोज़ करना है. क्योंकि तय समय सीमा में केस निपटाने का पुलिस पर सरकारी दबाव होता है. इस दबाव में और नौकरी बचाने के चक्कर में निर्दोष लोगों को फंसाने के कई मामले सामने आए हैं और शायद ज्यादातर सामने नहीं आए हैं. तो यहां भी चोरों के मिलते हुलिए वाले इन बेगुनाह मजदूरों को उठा लिया जाता है. मानवता की सारी हदें पार करके इन्हें गीली टहनियों, डंडों, लातों, घूंसों से पीटा जाता है. इसके बाद कहानी में पुलिस का ऐसा चेहरा देखने को मिलता है कि हम भयभीत हो जाते हैं. ऐसी दरिंदगी दर्शकों ने वर्दी के साथ जोड़कर कभी नहीं सोची होगी.
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बड़े लोगों के एजेंडे पूरे करने के लिए इन गरीब मजदूरों को मारने का प्लान बनता है. एक ईमानदार पुलिस वाला इसका विरोध करता है तो उसे भी डरा दिया जाता है. वो टूट जाता है. एनकाउंटर ऑपरेशन में शामिल हो जाता है. अंत में सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी अर्दलियों को कहता है कि जब उन मजदूरों को मार दो तो उस पुलिसवाले को भी मार देना.
ये जिम्मा जिस पुलिसवाले को दिया जाता है तो गोली मारने के बाद अधिकारी को फोन करता है. कहता है कि दोनों काम हो गए (मजदूरों का एनकाउंटर और ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर की भी हत्या) अब प्रेस को सूचित कर दें? तो फोन के दूसरे सिरे से अधिकारी कहता है, "उन (प्रेस) से कहो कि इंस्पेक्टर मुथुवेल की मौत पर फोकस करे कि वो एटीएम चोरों का पीछा कर रहे थे. किसी की भी सहानुभूति उन लड़कों के साथ नहीं होनी चाहिए."
अर्दली कहता है, "वो आसान है सर. हम एक कॉलम में उसकी (मुथुवेल) शादी की तस्वीरें छापेंगे और दूसरे कॉलम में अंतिम संस्कार में मौजूद उसकी पत्नी और बच्चे की. कि हर कोई इंस्पेक्टर मुथुवेल के लिए रोए. हम शोक में रोते उसके परिवार को टीवी चैनलों पर कवर करवाएंगे और पुलिसवालों की सुरक्षा को लेकर चर्चाएं आयोजित करवाएंगे."
ये क्लाइमैक्स वाला वार्तालाप आंखें खोल देता है और हमें ताकतवर संस्थानों के प्रति सचेत और दोषदर्षी होना सिखाता है.
भोपाल में सोमवार को हुए एनकाउंटर का सच कुछ भी हो सकता है. शायद पुलिस सच बोल रही है, शायद वो झूठ बोल रही है. लेकिन इस बीच जिस पात्र पर सबसे ज्यादा तरस आता है या जिसके लिए सबसे ज्यादा दुख होता है वो है एक पुलिसवाला. हेड कॉन्स्टेबल रमाशंकर यादव. जो उन आठ कैदियों की कथित फरारी के दौरान मारे गए. पुलिस का वर्जन है कि उन आठ कैदियों ने फरारी के दौरान उनका गला रेत दिया.
अगर ये सच है तो बहुत दुख की बात है. और अगर सच 'विसारनाय' के क्लाइमैक्स जैसा है तो भी ट्रैजिक है.
किसी दिन परदे पर हम इस कहानी को पूरी सच्चाई में देख पाए तो शायद इस त्रासदी का अनुमान लगा पाएंगे.
दुख ये भी है कि रमाशंकर जी की बेटी की शादी की तैयारियां चल रही थीं और वे नहीं रहे. 9 दिसंबर को उनकी 24 साल की बेटी सोनिया की शादी तय थी. उनके भतीजे विजय शंकर यादव ने एक न्यूज एजेंसी को बताया कि "वे इसे लेकर बहुत खुश और उत्साहित थे."
रमाशंकर को पहले दिल का दौरा भी पड़ चुका था. फिर वे शादी की तैयारियों में लगे थे. लेकिन सोमवार को उन्हें मार दिया गया.
एक बेटी के अलावा उनके दो बेटे भी हैं. दोनों ही सेना में हैं. शंभुनाथ (36) और प्रभुनाथ (32). गुवाहाटी और हिसार में इनकी पोस्टिंग है. दुखद समाचार मिलते ही वे रवाना हो गए.
विजय शंकर यादव ने न्यूज एजेंसी से बात करते हुए कहा, "हम लोग बैठकर बात करेंगे कि शादी को दिसंबर में ही करना है कि उसे आगे खिसकाना है."

भोपाल जेल में मारे गए हेड कॉन्स्टेबल रमाशंकर यादव.

फिल्म विसारनाय में ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर का पात्र मुथुवेल.
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सिमी के संदिग्ध आतंकियों के एनकाउंटर के वक्त का वीडियो










