फिल्म- द ओडिसी
डायरेक्टर- क्रिस्टोफर नोलन
एक्टर्स- मैट डैमन, ऐन हैथवे, रॉबर्ट पैटिन्सन, ज़ेंडेया, चार्लीज़ थेरन, जॉन बर्नथल, हिमेश पटेल
रेटिंग- 3.5 स्टार
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फिल्म रिव्यू- द ओडिसी
क्रिस्टोफर नोलन ने 'द ऑडिसी' को एक ऐसी फिल्म की तरह बनाया है, जैसा कुछ दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा.


क्रिस्टोफर नोलन ने 'द ओडिसी' को एक ऐसी फिल्म की तरह बनाया है, जैसा कुछ दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा. दिलचस्प बात ये है कि दुनिया इसे फिर भी वैसे नहीं देख पा रही, जैसे नोलन चाहते थे. क्योंकि दुनिया में मात्र 41 ट्रू IMAX थिएटर हैं. और भारत में सिर्फ एक. वो भी नॉन फंक्शनल. बहरहाल, 'द ओडिसी' एक आदमी के युद्ध के बाद घर लौटने की कहानी है. मगर हमारा नायक ओडिसस जितनी यात्रा शारीरिक तौर पर कर रहा है, उतना ही जहनी तौर पर भी. और ये फिल्म इन्हीं यात्राओं का वृतांत है.
कहानी के नायक ओडिसस से एक गलती हो गई है. गलतियां कई हुई हैं. मगर उसे रियलाइजेशन एक का ही है. उसने शांति का इस्तेमाल युद्ध के लिए किया. उसने इंसानी सभ्यता का सबसे पड़ा पाप किया. विश्वासघात. अब उसके अपराधबोध में गल रहा है. उसका प्रायश्चित करना चाहता है. आप जब ये फिल्म देखते हैं तो पाते हैं कि ये मनुष्य होने के नाते नोलन के एवॉल्यूशन का दस्तावेजीकरण है. उनकी पिछली फिल्म 'ओपनहाइमर' एक ऐसी आदमी की बायोपिक थी, जिसने जानते-बूझते एक ऐसी चूक कर दी है, जिसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है. उसकी ये एक गलती पूरी दुनिया फूंक सकती है. इसलिए वो गिल्ट में जी रहा है. 'द ओडिसी' और 'ओपनहाइमर' थीमैटकली सिमिलर फिल्में हैं. मगर इन्हें जितने अलहदा तरीके से बरता गया है, वही उस फिल्ममेकर में आपका यकीन पुख्ता करता है.
'द ओडिसी' बड़े ग्रैंड कैनवस पर उकेरी गई है. खूबसूरती ऐसी की आंखें चुंधिया जाएं. स्कोर ऐसा मानो कोई हॉरर फिल्म देख रहे हों. दुनिया के सबसे पॉपुलर एक्टर्स को इसमें कास्ट किया गया है. बेसिकली आपको एक ब्लॉकबस्टर थिएट्रिकल एक्सपीरियंस देने की हरसंभव कोशिश की गई है. नोलन चाहते हैं कि वो अपने दर्शकों को हर बार कुछ नया ऑफर करें. जो उन्हें सरप्राइज़ करे. एक ऐसे अनूठे संसार में ले जाए, जिसके अस्तित्व से भी आप अनजान थे. इस फिल्म को देखते हुए आपके आंख, कान, दिमाग, तीनों काम पर लगे हुए हैं. मगर दिल बैठा हुआ है.
इसे सर्वाइल फिल्म के तौर पर भी देख सकते हैं. ओडिसस को दानवों और देवताओं से लड़कर घर जाना है. घर पर उसकी पत्नी और बच्चा इंतज़ार कर रहे हैं. उन्हें अगर ज़िंदा रहना है, तो ओडिसस को लौटना ही होगा. मगर क्या वो खुद घर लौटना चाहता है? उसने इतने सारे अपराध किए हैं कि वो उसे लगता है कि उसने खुश रहने का अधिकार खो दिया है. उसे लगता है कि वो घर न जाकर अपने किए की सज़ा भुगत रहा है.
'द ओडिसी' का नायक खामियों से भरा हुआ है. मगर फिल्म उसे जज नहीं करती. उसे खुद को समझने और बदलने का समय और मौका दोनों देती है. जो बाकी लोगों को नहीं दिया जाता. ओडिसस को पूरे टाइम फिल्म के हीरो वाला ट्रीटमेंट मिलता है. भगवान उसकी मदद कर रहे हैं. भूत उसकी मदद कर रहे हैं. दैत्य उसकी मदद कर रहे हैं. उसे ये भी बता दिया जाता है कि चाहे उसकी पूरी पलटन मारी जाए, वो घर ज़रूर पहुंचेगा. इस वजह से वो बहुत सारी ऐसी चीज़ें करता है, जो शायद वो तब नहीं करता अगर उसे अपनी मौत के बारे में पता नहीं होता. ओडिसस का रोल मैट डैमन ने किया है. जिनकी 20 साल की मुश्किल यात्रा में दाढ़ी बढ़ने के अलावा कोई शारीरिक बदलाव नहीं हुआ.
ओडिसस से जुड़ा एक प्रसंग सोशल मीडिया पर बहुत वायरल होता है. कि कैसे जब वो 20 साल की यात्रा के बाद घर पहुंचा, तो उसका कुत्ता आर्गस अपनी आखिरी सांस बचाए उसका इंतज़ार कर रहा था. वो अकेला जीव था, जिसने ओडिसस को इतने सालों बाद भी पहचान लिया था. इस किस्से को पढ़ते हुए न जाने मैं कितनी बार इमोशनल हुआ हूं. इस फिल्म में शुरुआत से उस सीन का बिल्ड-अप किया गया था. मगर जब वो घटना होती है, तब आपको कुछ भी फील नहीं होता.
'द ओडिसी' की सबसे बड़ी खामी मुझे यही लगी कि वो ऑलमोस्ट कभी भी आपको कुछ फील नहीं करवा पाती. जबकि नोलन की कहानियां का कोर, टाइम और स्पेस से परे इमोशन ही रहा है. वो यहां पूरी तरह से मिस हो जाता है. हो सकता है कि साहित्य में मेरी दिलचस्पी कम होने की वजह से मैं उससे कनेक्ट फील नहीं कर पाया. फिल्म में एक सीन है, जब रॉबर्ट पैटिन्सन का किरदार ओडिसस की पत्नी पेनेलपे को शादी के लिए मना रहा होता है. इस बातचीत के दौरान रॉबर्ट, पेनेलपे को रिझाने की कोशिश करता है. इस सीन में रॉबर्ट पैटिन्सन ने जो किया है, वो इस फिल्म से मेरा पसंदीदा परफॉरमेंस बिट है. दूसरी एक्टर जिनका काम आपको प्रभावित करता है, वो हैं समैंथा मॉर्टन. उन्होंने सन गॉड की बेटी सर्सी का रोल किया है, जो इन्सानों को लिटरली जानवर बना देती है. पूरी फिल्म में उनका एक सीन है और वो आपको डराकर रख देता है.
'द ओडिसी' तमाम डिस्ट्रैक्शंस के बीच बुनियादी तौर पर भटकाव की कहानी है. एक यात्रा खत्म करने और नई यात्रा पर निकलने का आख्यान. मगर जो रिडेंप्शन आर्क ये फिल्म अपने नायक ओडिसस को देती है, वो इस फिल्म को कभी नहीं मिल पाता.
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