फिल्म- रामायण पार्ट 1
डायरेक्टर- नितेश तिवारी
एक्टर्स- रणबीर कपूर, साई पल्लवी, यश, रवि दुबे, अरुण गोविल, लारा दत्ता, शीबा चड्ढा
रेटिंग- 4.5 स्टार
फिल्म रिव्यू- रामायण
'रामायण' एक मॉडर्न मार्वल है. इस स्तर पर भारतीय सिनेमा में कभी कुछ अटेम्प्ट भी नहीं किया गया था.

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'रामायण' जब अनाउंस हुई तो पब्लिक में एक किस्म का स्केप्टिसिज़्म था. नमित मल्होत्रा के बयानों ने उस आग में घी डालने का काम किया. क्योंकि ह्यूमन टेंडेंसी है कि जब कोई खुद अपनी तारीफ करने लगता है, तो लोग उसे गंभीरता से लेने के बजाय, उसे शक़ की निगाह से देखने लगते हैं. इस वजह से 'रामायण' को भी शुरुआत से ही स्क्रूटिनी और नकारात्मकता झेलनी पड़ी. मगर फिल्म देखने के बाद मालूम पड़ा कि ये मेकर्स का ओवर-कॉन्फिडेंस नहीं, बल्कि अपने क्राफ्ट और प्रोडक्ट पर भरोसा था. क्योंकि 'रामायण' एक मॉडर्न मार्वल है. इस स्तर पर भारतीय सिनेमा में कभी कुछ अटेम्प्ट भी नहीं किया गया था. क्योंकि वो भारी भरकम रिस्क के साथ आता है. अगर मामला पौराणिकता से जुड़ा हो, तो डर लाजिम भी है. मगर 'रामायण' इन सभी बाधाओं को लांघकर एक अद्भुत सिनेमैटिक एक्सपीरियंस बनती है.
'रामायण' को दो भागों में बनाया जाना है. ये पहला पार्ट था. इसमें रावण के तीनों लोकों के राजा बनने से लेकर सीता हरण तक की कहानी बताई गई है. इस दौरान फिल्म कुछ जगहों पर समझौता करती है. सेफ़ खेलती है. मगर ये बिट्स एंड पीसेज पूरी फिल्म की किरकिरी नहीं करते.
नमित मल्होत्रा D-NEG नाम की VFX कम्पनी के मालिक हैं. इसलिए फिल्म विजुअल्स के डिपार्टमेंट में कमाल लगती है. इस फिल्म को देखते हुए मुझे पहली बार ये अहसास हुआ कि स्क्रीन साइज और फॉर्मेट वाकई मैटर करते हैं. हमने इसे IMAX 3D में देखा. वो अपने आप में एक अनुभव है. क्योंकि इसमें फिल्म की कई बारीकियां खुलकर सामने आ जाती हैं. 'रामायण' के साथ भी ऐसा हुआ. कुछ सीन्स हैं, जिसमें आप ग्लिच पाएंगे. खासतौर पर शूर्पणखा का नाक काटने वाला सीक्वेंस. वो सीक्वेंस थोड़ा हड़बड़ाया हुआ लगता है. शायद फिल्म का इकलौता हिस्सा, जो खटकता है. घटित होने और विजुअल, दोनों ही लिहाज से. मगर फिल्म उसकी भरपाई दूसरे हिस्सों से कर देती है.
फिल्म में दो तीन मेजर एक्शन सेट पीसेज़ हैं, जो बेहद भव्य और आकर्षक हैं. मसलन, जटायु और रावण के बीच का फाइट सीन. वो टेक्निकली शायद फिल्म और भारतीय सिनेमा इतिहास का सबसे फ्लॉलेस हिस्सा है. खर और दूषण की सेना से होने वाला युद्ध भी बेहद जानदार बन पड़ा है. क्योंकि इसमें राम और सीता, दोनों के पात्रों को ऐसे पेश किया जाता है, जैसा हमने पहले नहीं देखा. सीता को हमेशा एक ऐसी महिला के तौर पर देखा गया, जो खूबसूरत है, शर्मीली है, पवित्रता और पतिव्रता की मिसाल है. जिनकी वजह से रावण की हत्या हुई. मगर सीता की पहचान कभी एक वॉरिअर प्रिंसेस की नहीं थी. ये फिल्म उस नैरेटिव को चैलेंज करती है. सीता को अपना बचाव करने के लिए राम या लक्ष्मण की ज़रूरत नहीं है. वो खुद काफी हैं. वो शादी से पहले भी युद्ध कौशल की ट्रेनिंग लेती हैं. शादी के बाद अयोध्या आकर बच्चियों को ट्रेन करती हैं. और ज़रूरत पड़ने पर अपनी सुरक्षा भी कर सकती हैं.
राम के साथ इसका ठीक उलट होता है. फिल्म में उनका कैरेक्टराइजेशन बेहद टिपिकल और सेफ है. उनके कैरेक्टर करा कोई नया डायमेंशन आपको देखने को नहीं मिलता. वो अयोध्या के भावी राजा हैं. माता पिता के लाड़ले हैं. सहनशीलता की मूरत हैं. मर्यादा पुरुषोतम हैं. उनका मोरल कंपस कभी नहीं हिल सकता. ये चीज़ें इस पात्र को फ्लैट और वन टोन बना देता है. हालांकि फिल्म देखते हुए भी आपको फील होता है कि राम उस कैरेक्टर से ब्रेक फ्री करना चाहते हैं. उन्हें खुद नहीं पता कि वो कौन है. उनके जीवन का मक़सद क्या है. पहले तो वो सब कुछ भाग्य भरोसे छोड़ देते हैं. मगर जब सीता का हरण और जटायु की मृत्यु होती है, तो वो फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं. आपको भान होता है कि ये आदमी जो है, उससे कुछ अलग होना चाहता है. मगर फिल्म और उसके दर्शक उसे ऐसा करने की इजाज़त नहीं देते.
इस फिल्म का फोकस अपने विजुअल्स पर इतना ज़्यादा रहता है कि इमोशनल कनेक्ट मिसिंग लगता है. दो ही ऐसे सीक्वेंस है, जो आपको कुछ महसूस करवा पाते हैं. अव्वल तो राम का वनवास जाने वाला सीन और दूसरा जटायु की मृत्यु और राम से उनकी आखिर बातचीत. फिल्म का एक और सीन है जिसको चर्चा शायद कम हो. मगर वो राम और कैकई के इक्वेशन को खंगालता है. राम वनवास जाने से पहले कैकई से मिलते हैं और बताते हैं कि लौटने के बाद उन्हें अपनी मां का वही लाड चाहिए, जो इस पूरे प्रकरण से पहले मिला करता था. यहां राम, राम बन जाते हैं और कैकई अपराधबोध के तले दब जाती हैं.
रणबीर कपूर की परफॉर्मेंस थोड़ा सा निराश करती है. क्योंकि उनके भीतर का एक्टर खुलकर उस रोल में नहीं समा पाता. शुरुआत में रणबीर थोड़े असहज भी लगते हैं. मगर धीरे धीरे ये कैरेक्टर उन पर ग्रो करने लगता है. लक्ष्मण के रोल में रवि दुबे का काम शानदार है. उनके पात्र में एक किस्म का चुलबुलापन है. वो स्ट्रीट स्मार्ट, प्रैक्टिकल आदमी है. लक्ष्मण के रोल में रवि दुबे एफर्टलेसली फनी लगते हैं. साथ ही उनमें वो सीरियसनेस भी है, जिसे उनके शत्रु हल्के में नहीं ले सकते. कई बार ऐसा लगता है कि वो आदमी अपने भाई के प्रेम में पिस रहा है. सीता के रोल में साई पल्लवी की प्रेजेंस बहुत डिवाइन है. वो उस किरदार में जो ग्रेस लेकर आई है, वो शायद सबके बस की बात नहीं.
यश को रावण के रोल में ये फिल्म खुलकर खेलने का मौका देती है. उनके कुछ सीन्स बेहद शानदार हैं. जैसे जब रावण किसी दुविधा में होता है, तो उसके सामने दो विकल्प होते हैं- संयम या प्रतिशोध. उसे क्या चुनना चाहिए, इस बारे में वो अपने 9 ऑल्टर ईगो से बातचीत करता है. ये 9 लोग एक-दूसरे से बिल्कलु अलहदा हैं. वो फिल्म से रावण का मेरा पसंदीदा सीन है. यश के पात्र को वजनदार बनाने में शरद केलकर की डबिंग बेहद मददगार साबित होती है.
रामायण कुछ ऐसा अचीव करने निकली है, जिसमें पूरी तरह सफल होना मिथकीय है. फिल्म को चुनना पड़ता है कि उसे सबको लुभाना है या अपने क्राफ्ट का लोहा मनवाना है. वो इन दो चीजों के बीच कहीं झूलती रहती है. स्टोरीटेलिंग के लिहाज से कुछ कसर रह जाती है, जिसे फिल्म टेक्नोलॉजी के ब्रिलियंट इस्तेमाल से कवर करना चाहती है. और काफी हद तक कर भी जाती है. इसलिए खलती नहीं. विजुअल्स की मदद से वो आपके ऊपर ऐसा जादू करती है कि आप उससे कभी बाहर नहीं निकल पाते.
हालांकि कई विभाग ऐसे भी हैं जहां गुंजाइश रह जाती है. उदाहरण के तौर पर फिल्म के म्यूजिक को लिया जा सकता. हांस जिमर-एआर रहमान जैसे दिग्गज इस फिल्म से जुड़े हैं. मगर उनका काम फिल्म में कुछ जोड़ नहीं पाता. न गाने आपको याद रह पाते है, न ही स्कोर किसी सीन को एलीवेट कर पाता है.
ये फिल्म सिनेमाई एक्सपीरियंस के लिए बनाई गई है. इस मामले में ये उम्मीद से ज़्यादा डिलिवर करती है. जब आप फिल्म देखकर बाहर निकलते हैं, तो आप पर इसका प्रभाव कुछ समय तक रहता है. एंड क्रेडिट सीन में आपको ये एक कैरेक्टर के इंट्रोडक्शन के साथ छोड़े जाती है, जो आपको दूसरे पार्ट के लिए एक्साइटेड कर देता है.
वीडियो: रणबीर कपूर की रामायण देखकर लोगों ने क्या कहा?









