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'हिरासत और गिरफ्तारी अलग नहीं, 24 घंटे से ज्यादा हुए तो रिहा करना ही होगा', SC का अहम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का समय हिरासत में लेने के वक्त से शुरू होगा, न कि कागजों पर गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से.

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सुप्रीम कोर्ट. फाइल फोटो. Courtesy- India Today

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  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के समय से ही 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होगा, न कि गिरफ्तारी दर्ज करने के कागजी समय से।
  • यह टिप्पणी ड्रग तस्करी के मामले में चार आरोपियों की हिरासत और गिरफ्तारी में अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन की जांच के दौरान की गई।
  • कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि वे हिरासत का सही समय दर्ज करें और 24 घंटे की सीमा का अनुपालन जांच कर रिमांड देने या अस्वीकार करने का निर्णय लें।

सुप्रीम कोर्ट ने किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने और उसको मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की टाइमलाइन पर अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने का समय हिरासत में लेने के वक्त से ही शुरू होगा, न कि कागजों पर गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से. कोर्ट ने ये टिप्पणी ड्रग स्मगलिंग से जुड़े एक केस की सुनवाई के दौरान की.

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 4 नवंबर को जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने ड्रग्स तस्करी के मामले में आरोपी चार लोगों को रिहा करने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि उनकी हिरासत के दौरान संविधान के अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन किया गया. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की समयसीमा उसी वक्त से शुरू हो जाती है, जब उसकी आजादी पर रोक लगाकर उसे हिरासत में लिया जाता है. यह समय पुलिस या जांच एजेंसी के कागजों में गिरफ्तारी दर्ज करने के वक्त से नहीं गिना जाएगा.

संविधान के अनुच्छेद 22(2) मुताबिक, पुलिस किसी को गिरफ्तार करती है तो उसे 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी है. कोर्ट तक पहुंचने में लगने वाला समय इसमें नहीं गिना जाएगा. मजिस्ट्रेट की इजाजत के बिना पुलिस किसी को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रख सकती. कोर्ट ने कहा कि संविधान के हिसाब से हिरासत में लेना और गिरफ्तारी करना, दोनों को अलग-अलग नहीं माना जा सकता. पुलिस गिरफ्तारी से पहले किसी को हिरासत में रखती है, तो उस समय को भी 24 घंटे की समय-सीमा में गिना जाएगा. इसे अलग रखकर पुलिस 24 घंटे की सीमा से बच नहीं सकती. कोर्ट ने कहा,

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'24 घंटे की गिनती सिर्फ कागजों पर गिरफ्तारी दर्ज होने के बाद से शुरू मानना संविधान के अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 56 के नियमों के खिलाफ है.'

कोर्ट ने कहा कि जांच के नाम पर किसी की आजादी छीनकर उसे कागजों में गिरफ्तार न दिखाना असंवैधानिक है. 

गिरफ्तारी और हिरासत अलग नहीं: SC

कोर्ट ने कहा कि संविधान में हिरासत और गिरफ्तारी को अलग-अलग नहीं माना गया है. अनुच्छेद 22(2) के तहत दोनों का मतलब एक ही है. यानी किसी व्यक्ति को जिस वक्त से हिरासत में लिया जाता है, उसी वक्त से 24 घंटे की गिनती शुरू हो जाएगी. कोर्ट ने कहा कि 24 घंटे की तय सीमा के अंदर भी पुलिस किसी व्यक्ति को बेवजह हिरासत में नहीं रख सकती. हिरासत का समय उचित और जरूरी होना चाहिए.

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जिस केस की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ये टिप्पणी की, उसमें आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब 2:30 बजे हिरासत में लिया गया था. जांच एजेंसी ने उनके पास से 11.03 किलो मेथामफेटामाइन की गोलियां बरामद करने का दावा किया था. हालांकि, उनकी गिरफ्तारी अगले दिन सुबह 11:15 बजे दर्ज की गई. इसके बाद 30 सितंबर को शाम 4:45 बजे उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. यानी हिरासत में लिए जाने के 24 घंटे से ज्यादा समय बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया गया.

कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी ने तलाशी और जब्ती की कार्रवाई खत्म होने और आरोपियों की औपचारिक गिरफ्तारी के बीच के 18 घंटे के अंतर की कोई वजह नहीं बताई. कोर्ट के मुताबिक, इतनी देर तक बिना मजिस्ट्रेट की निगरानी के हिरासत में रखना गलत है.

कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे हिरासत में लेने का सही समय दर्ज करें और रिमांड देने से पहले जांचें कि 24 घंटे के नियम का पालन हुआ है या नहीं. जरूरत पड़ने पर वो रिमांड देने से इनकार भी कर सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों का उल्लंघन होने का खतरा रहता है. ऐसे मामलों में NDPS एक्ट की जमानत से जुड़ी सख्त शर्तें भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकतीं.

यह मामला NDPS एक्ट के तहत दर्ज केस में चार आरोपियों की जमानत याचिका खारिज होने से जुड़ा था. त्रिपुरा हाई कोर्ट ने कहा था कि आरोपियों के पास से 11.03 किलो याबा टैबलेट मिलने और उनमें नशीले पदार्थ की पुष्टि होने के सबूत हैं, इसलिए उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती.

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