फिल्म: मिर्ज़या । निर्देशक: राकेश ओमप्रकाश मेहरा । कलाकार: हर्षवर्धन कपूर, सायामी ख़ेर, आर्ट मलिक, अनुज चौधरी, अंजलि पाटिल, के.के. रैना, ओम पुरी । अवधि: 2 घंटे 9 मिनट
Review: मिर्ज़या देखने के बाद अंदर बस पीड़ और दुख है
पॉपकॉर्न्स का प्रवेश वर्जित है.
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मिर्ज़ा-साहिबां का फिल्म में एक पोर्टेट.
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जो पाठक जल्दी में है. 1. फिल्म की लंबाई कम लगेगी. जिस तरह से एडिट हुई है, बीच-बीच में दो सदियों की कहानियां टूटती-जुड़ती रहती हैं अंत तक. इससे carefree दर्शक बेचैन होंगे. 2. मिर्ज़ा और साहिबां की कहानी जिन्होंने नहीं सुनी-पढ़ी हैं, उन्हें सब्र रखकर देखना होगा और कम में ज्यादा महसूस करना होगा. फिल्म देखने के बाद ये कहानी पढ़ लेंगे तो ज्यादा अच्छा लगेगा. 3. पॉपकॉर्न-कोल्डड्रिंक खरीदने वाले दर्शकों को मिर्ज़या की आत्मा हाथ नहीं आएगी. बेहतर होगा कि consumer बनकर न जाएं, किसी बच्चे की तरह कहानी सुनने के लिहाज से जाएं और जज या फिल्म आलोचक बनकर न बैठें. 4. संवेदनशील लोग और वे लोग जो सभ्यताओं में प्रेम के साथ होती जाती त्रासदियों को सच्चे रूपों में महसूस करते हैं, उनके लिए ये फिल्म जरूर है. तड़पेंगे. 5. औचक एडिटिंग, चुप्पियां, मिर्ज़ा-साहिबां की पुरानी कहानी में कोई संवाद न होना, हर्ष-सायामी का काम, म्यूजिक का लगातार-छुटकर इस्तेमाल - सब इरादतन है, दर्शक को एक विशेष काल में भेजने के लिए. 6. गुलज़ार के लिखे गीत, शंकर-एहसान-लॉय का संगीत विशेष रूप से उल्लेख करने लायक है. याद रहेंगे.
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जो जल्दी में नहीं हैं और भीतर कुछ टटोलना चाहते हैं. गुलज़ार है.
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तीन गवाह हैं इश्क़ के इक रब है, एक तू और मैं
# किन्हीं दो लोगों के बीच प्रेम पर हमें टिप्पणी करने का कोई हक नहीं है. हमें जज करने का कोई हक नहीं है. चाहे हमारी नैतिकताओं, ज़ातों, समुदायों, दूध के रिश्तों को कितनी ही आपत्ति हो. हमें कोई हक नहीं. ये उन दो और उस मालक के बीच की बात है.होता है इश्क में अकसर होता है चोट कहीं लगती है जाकर जख़्म कहीं पर होता है
# पूरा जनम कम पड़ता है ये समझने को कि प्यार शरीर के बारे में है कि आत्मा के बारे में. शायद दोनों के बारे में है, शायद उससे भी कहीं आगे की बात है. लेकिन जब होता है तभी समझ आ सकता है. जब एक के अंदर का कुछ, दूसरे के अंदर बसने लगे.वक़्त का फ़ैसला इश्क़ के हक में हुआ नहीं आशिक़ को ज़ंजीरे डाल के ले गये शहर से और कही
# लोक कथाओं में, शेक्सपीयर की कहानियों में, बीती सदियों में ठहर गए किस्सों में प्रेमी थे. आज वे हमारी बातों, फिल्मों, आर्ट का हिस्सा हैं. लेकिन उनके जितने ही महत्वपूर्ण हमारी गलियों, गांवों, कस्बों, शहरों के प्रेमी (बच्चे, युवा, बूढ़े) हैं. चाहे उनकी कहानियां कितनी ही औसत हों. अख़बारों में एक कॉलम में छपी हत्याओं, आत्म-हत्याओँ की खबरों में हों. वे भी मिर्ज़ा साहिबां हैं.सब तरकीबें करके देखीं तेल दी डिब्बियां भरके देखीं जब तक तीली लगे ना उनमें कोई रोशनी जले ना उनमें
# आप कुछ नहीं कर सकते. कबीलाई हों तब भी, औद्योगिक युग में हों तब भी. बनाना रिपब्लिक में हों तब भी, डेनमार्क में हों तब भी. प्रेम में कोई तरकीब मदद नहीं करेगी. ये किस दिशा बहा ले जाएगा, कब आपत्ति कर देगा, कब हंसा देगा, कब नाराज कर देगा, कब विरह देगा - नहीं पता.ये वादियां दूधियां कोहरे की इनमें सदियां बहती हैं मरता नहीं इश्क ओ मिर्ज़ा सदियां साहिबां रहती हैं
# वे दो प्यार करने वाले थे. हमें पसंद नहीं थे. हमने मार दिए. उनके शव पड़े हैं. अब? अब क्या कर लेंगे? उनकी कहानी भी मार देंगे? मार के दिखाइए. अब आप तो अमर हो जाएंगे? और आपकी रवायतें भी सदा ज़िंदा रह लेंगी? सोच के देखें.कन्न लम्मे ख़ुर पतले दुम्म बक्की दी सियाह बक्की तौं डरन फरिश्ते मिर्ज़े तौं डरे ख़ुदा
# बक्की मिर्ज़ा का घोड़ा था. उस सदियों पुरानी कहानी वाले मिर्ज़ा का घोड़ा. दूसरों के प्यार को एक चांस देने के लिए कई पात्र अपने जान दे गए.लहू लुहान ज़मीन हुई और तांबा हुआ आकाश सर से बहता रहा लहू और हलके हुए हवास
# लहू वैसे तो शरीर के अंदर बहने वाला पदार्थ है. लाल रक्त कणिकाओं की जगह श्वेत रक्त कणिकाएं भी होती हैं. लेकिन प्यार में मारे जाने वाले का सफेद ख़ून भी बहेगा तो उतना ही लाल, आंखों में उतर जाने वाला और उत्तेजक होगा.फा पये ना इश्क दा ऐ रस्सी लम्मी मिर्ज़या साहिबां ते ना लभणी तू फेर ना जम्मी मिर्ज़या तू फेर ना जम्मी मिर्ज़या
# जिन्होंने अंजाम देख लिए. बुरे अंजाम देख लिए. मार दिए गए. वे उस ख़ौफ में नहीं जिस ख़ौफ में हम हैं. पीछे रह गए लोग. हमारे साथ बसने वाले दूसरे इंसान आज भी मार रहे हैं. प्यार करने वालों को. वजहें उनके पास कई हैं. हम कहते हैं लेकिन ये प्यार का वायरस नष्ट नहीं होता. अंजाम देखे बग़ैर लगता जाता है. कितना ही कह लें कि तुम फिर न जनम लेना इस हत्यारी दुनिया में, लेकिन वो जन्म तो लेते हैं. लेते रहेंगे.ये भी पढ़ लीजिए:
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