RTPCR टेस्ट को कोरोना टेस्ट के लिहाज से सबसे अच्छा बताया जाता रहा है. पिछले साल से ही दुनियाभर इसके ऊपर निर्भर है.
प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स
कोरोना वायरस रैपिड टेस्ट किट को बेचने और खरीदने वालों के बीच दिल्ली हाईकोर्ट में झमेला हो गया है. इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (ICMR) को बेचे गए किट में ज्यादा दाम लिए जाने का पता चला है. कोर्ट ने कहा है कि भारत में आयात के बाद प्रति किट इसकी कीमत 245 रुपये ही है, लेकिन ICMR को 600 रुपये प्रति किट बेचा गया है. इस तरह ये करीब 2.5 गुना ज्यादा महंगा हो गया. जस्टिस नज्मी वजीरी ने कीमत 33 फीसदी कम करते हुए 600 रुपये से घटाकर 400 रुपये प्रति किट करने का निर्देश दिया.
समझौते में क्या था दोनों पक्ष 2.24 लाख किट के मामले को लेकर कोर्ट पहुंचे थे, जो चीन से भारत आने हैं. किट आयात करने वाली कंपनी मैट्रिक्स लैब्स ने तर्क दिया कि उसे 20 करोड़ रुपये (और जीएसटी) या 21 करोड़ रुपये की जगह सिर्फ 12.25 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था. समझौते के मुताबिक़, ICMR को 8.25 करोड़ रुपये पहले देने थे, उसके बाद ही मैट्रिक्स लैब्स को किट्स भेजना था. दूसरी ओर, रेयर मेटाबॉलिक्स ने दिल्ली हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि उसे बाकी बचे 2.24 लाख किट दिलाए जाएं, ताकि वह ICMR को आपूर्ति करने का अपना एग्रीमेंट पूरा कर सके. अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने आदेश में कहा कि देश को इन किट की सख्त जरूरत है. साथ ही अदालत ने ये निर्देश दिया कि भारत पहुंचते ही बाकी 2.24 लाख किट ICMR को दिए जाएं. दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आर्डर में कहा-
कोर्ट का विचार है कि 245 रुपये की खरीद पर किट को 400 रुपये पर बेचे जाने पर बहुत ज्यादा लाभ बनता है. 61 फीसदी. मौजूदा हालात को देखते हुए निजी फायदे पर ज्यादा ध्यान देने की जगह लोगों के फायदे के लिए आगे आना चाहिए. मामले में जो भी पार्टियां हैं, उन्हें लोगों की बेहतरी के लिए आगे आना चाहिए. 400 रुपये प्रति किट की कीमत से अधिक पर नहीं बेचना चाहिए. इस कीमत भी जीएसटी भी जुड़ा रहेगा.
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