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फिल्मों के वो पांच बड़े चेहरे, जो राजनीति में धड़ाम हो गए

कुछ को सियासत ऐसी भाई कि उन्होंने सिनेमा छोड़ दिया, वहीं कुछ लोग सियासत छोड़ सिनेमा की ओर लौट गए.

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फोटो - thelallantop
उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, जब भी सिनेमा के लोगों को सुपर स्टार का दर्जा मिला, उन्होंने लोकप्रियता भुनाने के लिए सियासत का सहारा लिया. उत्तर भारत की सियासत में अमिताभ बच्चन से लेकर दक्षिण भारत में एमजी रामचंद्रन और एनटी रामाराव ने अपनी इस लोकप्रियता के सहारे सियासत में उतरे. उत्तर भारत के जो अधिकांश नायक सियासत में उतरे, उन्होंने सियासत से ऐसी तौबा की कि फिर उसका मुंह नहीं देखा. वहीं दक्षिण भारत के नायकों ने राजनीति में बुलंदियों को छुआ और राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पर काबिज हुए.
उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोगों की तासीर में एक बुनियादी अंतर है. उत्तर भारत के लोगों ने सिनेमा के नायकों को सिनेमा तक ही सीमित रखा, क्योंकि उन्हें असल जिंदगी या यूं कहें कि उन्हें सियासत में नायकों की कभी कमी नहीं रही. वहीं दक्षिण भारत में सिनेमा के नायक ही जिंदगी और सियासत दोनों के ही नायक रहे. ऐसे में जब रजनीकांत ने 31 दिसंबर को अपनी पार्टी बनाने और तमिलनाडु का अगला चुनाव लड़ने का ऐलान किया, तो उसका आधार यही था कि वो सिनेमा के नायक हैं, जो अब सियासत के जरिए असल जिंदगी में भी नायक की भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे में बात उन 10 बड़े नेताओं की, जो राजनीति में सफल और असफल होते रहे.

सिनेमा से आए वो पांच बड़े नेता जो राजनीति में असफल रहे

1. अमिताभ बच्चन

Amitabh
भारत के पूर्व प्रधानमंंत्री राजीव गांधी अमिताभ बच्चन को राजनीति में लेकर आए थे.

1969 में ख्वाज़ा अहमद अब्बास के निर्देशन में बनी सात हिंदुस्तानी से अपना फिल्मी करियर का आगाज करने वाले अमिताभ बच्चन फिलहाल बॉलीवुड के सबसे बड़े नायक हैं. 70 के दशक में एंग्री यंग मैन की छवि के साथ अपनी एक अलग पहचान बना चुके अमिताभ बच्चन को राजीव गांधी सियासत में लेकर आए थे. अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद से 1984 का लोकसभा चुनाव लड़ा और उस समय के दिग्गज नेता रहे हेमवंती नंदन बहुगुणा को चुनाव में मात दी. वो दौर बोफोर्स तोप घोटाले का था, जिसमें नाम आने के बाद अमिताभ बच्चन ने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया. उसके बाद अमिताभ ने राजनीति की ओर मुड़कर नहीं देखा. हालांकि उनकी पत्नी और बॉलीवुड की स्टार रहीं जया भादुड़ी अब भी समाजवादी पार्टी के टिकट पर राज्यभा की सांसद हैं.

2.राजेश खन्ना

Rajesh Khanna
राजेश खन्ना ने भी कांग्रेस के साथ ही राजनीतिक पारी शुरू की थी, लेकिन वो कुछ खास नहीं कर पाए.

1966 में फिल्म आखिरी खत से फिल्मी करियर का आगाज करने वाले राजेश खन्ना को बॉलीवुड का पहला सुपर स्टार और ओरिजिनल सुपर स्टार कहा जाता है. 1969 से 1971 के बीच अकेले 15 सुपर हिट फिल्में देकर राजेश खन्ना बॉलीवुड पर राज करने लगे थे. फिल्म के शिखर पर पहुंचे राजेश खन्ना की लोकप्रियता को भुनाने के लिए कांग्रेस ने उन्हें अपने साथ ले लिया. 1991 में राजेश खन्ना ने दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन वो बीजेपी के बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी से चुनाव हार गए. 1992 में जब उपचुनाव हुए तो राजेश खन्ना ने इसी सीट से एक और बड़े हीरो शत्रुघ्न सिन्हा को हरा दिया. राजेश खन्ना को भी राजनीति रास नहीं आई और 1996 में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया. हालांकि शत्रुघ्न सिन्हा राजनीति में बने रहे. वो फिलहाल बिहार के पटना साहिब से सांसद हैं.

3. गोविंदा

Govinda
गोविंदा ने बीजेपी के बड़े नेता राम नाईक को चुनाव हराकर राजनीतिक पारी शुरू की, लेकिन चार साल में ही उन्होंने राजनीति से किनारा कर लिया.

1986 में इल्जाम फिल्म से सिनेमाई करियर का आगाज करने वाले गोविंदा अपनी डांस स्टाइल के लिए पूरे बॉलीवुड में मशहूर हैं. उनकी अपनी एक फैन फॉलोइंग है, जिनके नाम एक साल में सबसे अधिक फिल्में करने का रिकॉर्ड है. गोविंदा की इस लोकप्रियता को भुनाने के लिए कांग्रेस ने उन्हें अपने साथ लिया. 2004 में गोविंदा ने कांग्रेस जॉइन की और 2004 में ही मुंबई से लोकसभा का चुनाव लड़ा. नतीजे आए तो गोविंदा ने पांच बार के सांसद रहे और बीजेपी के बड़े नेता रहे राम नाईक को 50 हजार वोटों से हरा दिया. हालांकि गोविंदा सियासत में अपना स्टारडम कायम नहीं रख सके. 20 जनवरी 2008 को गोविंदा ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और उसके बाद फिर कभी मुड़कर राजनीति की ओर नहीं देखा.

4. संजय दत्त

Sanjay dutt
संजय दत्त को अमर सिंह राजनीति में लेकर आए. 2009 में चुनाव हारने के बाद संजय दत्त राजनीति से दूर हो गए.

हिंदी फिल्मों के बड़े अभिनेताओं में शुमार सुनील दत्त और बड़ी हिरोइनों में शुमार नरगिस दत्त के बेटे संजय दत्त ने 1972 में रेशमा और शेरा फिल्म से बतौर बाल कलाकार फिल्मी करियर का आगाज किया. मां और बाप दोनों ही बॉलीवुड के बड़े नाम थे, लेकिन संजय ने भी फिल्मों में अपनी खास जगह बनाई. सुनील दत्त कांग्रेस से सांसद रहे थे, लेकिन संजय दत्त ने अमर सिंह के प्रभाव में आकर समाजवादी पार्टी जॉइन कर ली. 2009 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो संजय दत्त लखनऊ से सपा के टिकट पर चुनावी मैदान में उतर गए. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. बाद में  सपा ने उन्हें ऊंचा ओहदा देते हुए जनरल सेक्रेटरी बना दिया. जब अमर सिंह सपा में किनारे लगा दिए गए, तो संजय दत्त ने भी पार्टी छोड़ दी और कहा कि ऐक्टर्स पॉलिटिक्स में फिट नहीं हो सकते.

5.जया प्रदा

Jaya prada
दक्षिण भारत और उत्तर भारत दोनों ही जगहों पर राजनीति करने के बाद जया प्रदा फिलहाल सियासत में हाशिए पर हैं.

1976 में तमिल फिल्म भूमिकोसम से अपने फिल्मी करियर का आगाज करने वाली जया प्रदा ने बॉलीवुड में भी अपनी एक खास पहचान बनाई. फिल्मों से सियासत में आए कद्दवर नेता और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने एनटी रामाराव उन्हें सियासत में लेकर आए और अपनी पार्टी तेलुगू देशम पार्टी में शामिल कर लिया. जब एनटीआर और उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू के बीच पार्टी पर वर्चस्व को लेकर खींचतान हुई तो जया प्रदा चंद्रबाबू नायडू के साथ चली गईं. चंद्रबाबू नायडू ने उन्हें 1996 में राज्य सभा भेज दिया. बाद में जया तेलगुदेशम पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो गईं. सपा में उन्हें अमर सिंह लेकर आए थे. 2004 और 2009 में चुनाव जीतने के बाद जया प्रदा सांसद बनीं. जब अमर सिंह सपा में किनारे लगा दिए गए तो जया प्रदा भी पार्टी से निकाल दी गईं. उन्होंने 2014 में बिजनौर से आरएलडी के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन हार गईं. इसके बाद से जया प्रदा ने एक तरह से सियासत से किनारा कर लिया है.

सिनेमा से आए वो पांच बड़े नेता जो राजनीति में सफल रहे

1. एमजी रामचंद्रन

MGR
तमिल फिल्मों के महानायक रहे एमजी रामचंद्रन ने AIADMK बनाई और मरते दम तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे.

साथी लीलावती फिल्म से 1936 में फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले एमजी रामचंद्रन तमिल फिल्मों के महानायक थे. कांग्रेस में शामिल होकर राजनीति की शुरुआत करने वाले एमजी रामचंद्रन 1953 में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम में शामिल हो गए. 1962 में पहली बार विधानपरिषद सदस्य बने और 1967 के चुनाव में वो विधानसभा पहुंचे. करुणानिधि से बगावत कर 1972 में उन्होंने आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पार्टी बनाई. 1977 के चुनाव में उनकी पार्टी ने राज्य की 234 में से144 सीटें जीत लीं. एमजी रामचंद्रन मुख्यमंत्री बने और 1987 में अपनी मौत तक राज्य के मुख्यमंत्री बने रहे.

2.एनटी रामाराव

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आंध्र प्रदेश के सिने प्रेमियों के नायक रहे एनटी रामाराव ने तेलगु देशम पार्टी बनाई और तीन बार मुख्यमंंत्री रहे.

1949 में मना देशम फिल्म से आगाज करने वाले एनटी रामाराव कुछ ही वक्त में आंध्र प्रदेश के सिने प्रेमियों के दिलों पर राज करने लगे.अपनी लोकप्रियता को भुनाते हुए एनटी रामाराव ने 29 मार्च 1982 को अपनी पार्टी बनाई तेलगु देशम पार्टी. 1983 के चुनावों में एनटी रामाराव ने राज्य की 284 में से 199 सीटें जीत लीं और सरकार बनाई. 1984 में राज्य में फिर से चुनाव हुए और फिर से एनटी रामाराव मुख्यमंत्री बने. 1989 के चुनाव में एनटी रामाराव हार गए और विपक्ष में बैठे, लेकिन 1994 में एक बार फिर एनटी रामाराव ने जीत हासिल की और मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के 9 महीने के बाद ही एनटी रामाराव के दामाद एन. चंद्र बाबू नायडू ने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया और खुद मुख्यमंत्री बन गए. 1996 में एनटी रामाराव की मौत हो गई.

3. करुणानिधि

Karunanidhi
तमिल सिनेमा में पटकथा लिखने वाले करुणानिधि ने डीएमके से राजनीति की शुरुआत की और पांच बार  मुख्यमंत्री रहे.

करुणानिधि तमिल फिल्मों और नाटकों के लेखक थे. सियासत में उन्हें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के मुखिया सीएन अन्नादुरई लेकर आए थे. 1957 में करुणानिधि पहली बार विधायक बने थे. 1961 में उन्हें डीएमके का कोषाध्यक्ष बनाया गया. 1969 में सीएन अन्नादुरई की मौत के बाद करुणानिधि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने. 1969 से अब तक (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011)पांच बार वो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. अपने 60 साल के राजनीतिक करियर में उन्होंने हर चुनाव जीता है. 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तमिलनाडु और पुडुचेरी में डीएमके के नेतृत्व वाली डीपीए (यूपीए और वामपंथी दल) का नेतृत्व किया और लोकसभा की सभी 40 सीटों पर जीत हासिल की. 2009 के लोकसभा चुनाव में भी डीएमके की सीटें 16 से बढ़कर 18 हो गईं.

4. जयललिता

Jaylalitha
एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद AIADMK की कमान संभालने वाली जयललिता भी पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं.

1963 में एपिसल नाम की अंग्रेजी फिल्म से शुरुआत करने वाली जयललिता को एमजी रामचंद्रन राजनीति में लेकर आए थे. 1982 में जयललिता ने सियासी पारी का आगाज किया और 1991 से 1996 , 2001 में, 2002 से 2006 तक और 2011 से 2014 तक तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं. 1982 में डीएमके में शामिल हुईं जयललिता 1983 में राज्यसभा के लिए चुनी गईं. 1984 से 1989 तक वो राज्यसभा की सदस्य रहीं. 1989 में राज्य में उपचुनाव हुए तो जयललिता विधानसभा में पहुंच गईं. 1987 में जब एमजी रामचंद्रन का निधन हुआ तो पार्टी दो हिस्सों में बंट गई. एक की कमान जयललिता के हाथ में रही, जबकि दूसरी पार्टी की कमान एमजी रामचंद्रन की पत्नी और सिनेमा की अभिनेत्री जानकी ने संभाली. 1989 में जयललिता ने 29 सीटें जीतीं और विपक्ष की नेता बनीं. 1991 में वो मुख्यमंत्री बनीं.

5. स्मृति ईरानी

Smriti
छोटे पर्दे की बहू स्मृति ईरानी भले ही 2014 में राहुल गांधी से चुनाव हार गईं, लेकिन राज्यसभा के जरिए वो केंद्रीय मंंत्री हैं.

क्योंक सास भी कभी बहू थी टीवी सीरियल की तुलसी यानि स्मृति ईरानी 2003 में सियासत में आईं. 2003 में उन्होंने बीजेपी जॉइन की और दिल्ली के चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र से 2004 का चुनाव लड़ा. हालांकि वो कपिल सिब्बल से चुनाव हार गईं. वर्ष 2004 में इन्हें महाराष्ट्र यूथ विंग का उपाध्यक्ष बनाया गया. स्मृति पांच बार केंद्रीय समिति के कार्यकारी सदस्य के रूप में रहीं और बाद में उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय सचिव बना दिया गया. 2010 में स्मृति को बीजेपी महिला मोर्चा की कमान सौंपी गई. 2011 में पार्टी ने उन्हें गुजरात से राज्यसभा भेज दिया और साथ ही हिमाचल प्रदेश में महिला मोर्चे की भी कमान दे दी गई. 2014 के लोकसभा चुनाव में स्मृति ने कांग्रेस अध्यक्ष और तब के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा, लेकिन वो हार गईं. हालांकि 2014 में बीजेपी देश में बहुमत के साथ आई थी और स्मृति राज्यसभा की सदस्य थीं, तो उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया. 2017 में पार्टी ने एक बार फिर उन्हें राज्यसभा भेजा और अब वो केंद्रीय कपड़ा मंत्री हैं.


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