अब जब होटल और रेस्टोरेंट में खाओ, और जो वेटर बित्तुइया जैसा मुंह बनाए, सेवा से संतुष्ट न हो तो सेवा शुल्क न दो. सरकार ने ये बात साफ कर दी है. माने अब जरूरी नहीं है कि वेटर कपार में करी चुआ दे, हग्गे के मघ्घे जैसा पानी का गिलास भरे और सर्विस चार्ज आप देते जाएं. ऊपर से ये टिप लेते हैं अलग. ये अच्छा है कि होटल और रेस्टोरेंट के लिए ये नियम क्लियर हो गया लेकिन अभी भी बहुत से नियम हैं जो बनने चाहिए और जनता को साफ-साफ पता होने चाहिए.
1. दोबारा पनीर नहीं खाने दिया जाए
ये नियम वेज वालों के लिए होगा. होटल में खाएंगे, पूरे परिवार को लेकर जाएंगे पर चॉइस के नाम पर सिर्फ पनीर. बोर नहीं होते पनीर से कुछ और ट्राई कर लो यार. मतलब इनको लगता है अगर पनीर नहीं खाएंगे तो ये नहीं माना जाएगा कि कुछ अच्छा खाया है. ये घर में कहते हैं, आज कुछ अच्छा बनाते हैं. क्या बनाएंगे? मटर पनीर. बाहर से कुछ मंगाते हैं. क्या मंगाएंगे, चिली पनीर. बाहर कुछ खाते हैं, क्या खाएंगे, शाही पनीर. और एक तो इस पनीर का टेस्ट भी ऐसा होता है कुछ भी खा लो. टेस्ट सबका एक जैसा लगता है. तो नियम ये होगा कि अगर एक आदमी ने होटल में दो बार लगातार जाकर पनीर मांगा तो उसे चुल्लू भर पनीर में डुबा दिया जाएगा.
2. नींबू पानी किसलिए है, पूछने वालों को छह साल की सजा
एक वो होते हैं, जो खाएंगे और फिर जब उंगलियां डिपाने को नींबू और गरम पानी आएगा तो पूछेंगे ये पीना है क्या? मतलब उनके लिए ये बेस्ट जोक होता है. कहेंगे, इसके साथ शक्कर भी दे देते हें हें हें... उनको लगता है एकदम मौके पर उन्होंने बहुत सही वाला जोक मार दिया है. पर दिक्कत ये कि ऐसा वो हर बार करते हैं. और ऐसा दस में से पांच लोग करते हैं. रेस्टोरेंट वाले भी इस जोक से चट चुके हैं. अब तो ये है कि शेफ भी खाना अधकच्चा भेज देते हैं, बगल की टेबल पर कोई ये जोक मारता है तो खाना अपने से पक जाता है. नींबू पानी का वालों को छह साल किसी रेस्टोरेंट में घुसने नहीं दिया जाएगा.
3. जान-बूझकर गांववाला बनने वालों को उठाकर बाहर कर दिया जाएगा
कुछ लोगों की आदत होती है, अच्छे से होटल में जाएंगे और जान-बूझकर गांववाले बन जाएंगे. गांववाला होने में कोई बुराई नहीं है. पर ये बेवकूफियां करेंगे, और इनको लगता है वाह मैं तो अपनी जड़ों से जुड़ा हूं. इनके दिमाग में कुछ ऐसा होता है कि वाओ! देखो हम तो ये दिखा रहे हैं कि हम गांववाले हैं. लेकिन असलियत ये होती है कि वो गांववालों की खिल्ली उड़ा रहे होते हैं. ये ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं कि गांववालों में कोई मैनर्स नहीं होते. इनको लगता है, हाथ से खाकर ये गांववाले हो जाएंगे. तेज आवाज में चिल्लाकर गांववाले बन जाएंगे, कुर्सी पर पांव मोड़कर बैठने से गांववाले कहलाएंगे लेकिन भाईसाहब गांववाले ऐसा बिल्कुल भी नहीं करते. वो तमाम नई चीजों को अपनाते हैं और कहीं बाहर तो और भी सलीके से पेश आते हैं. ऐसा करने वालों को उठाकर बाहर फेंक दिया जाना चाहिए.
4. खाने का मजाक उड़ाने वाले पैक कर घर पहुंचा दिए जाएंगे
ये वो लोग है जो ऑर्डर आने के बाद कहते हैं. अस्सी रूपये में पनीर लाते, सारा घर खाता. फालतू में आठ सौ चले गए. ये कहते हैं, भाई तुअर की ही तो दाल तो है, ऐसा क्या मिला दिया है इन लोगों ने जो पांच सौ की दे रहे हैं. ऐसा सुनते ही हम गिल्ट में भर जाते हैं. उनको भी पता है, वो गलत नहीं कह रहे हैं. लेकिन चीजें क्यों महंगी हैं ये आप जानते हैं. इसीलिए यहां खाने आए हैं. ऐसे लोगों के लिए नियम ये हो कि इनको खाने के बाद पैक करके घर भिजवा दिया जाए और दोबारा न आने दिया जाए. वो कुछ गलत नहीं कहते हैं, लेकिन उनकी बात सुनकर ऐसा लगता है कि दाल मखनी में कंकड़ फंस गया है. हमको पता है हम अपनी जेब ही कटवा रहे हैं, लेकिन रियलाइज तो न करवाओ यार!
5. होटल से तौलिया चुराने वालों को सजा-ए-मौत
होटल के कमरों से तौलिया और साबुन चुराने वालों को तो फांसी पर चढ़ा देना चाहिए. उनको दो बार फांसी और चढ़ाना चाहिए अगर वो कहें कि हमारे लगाए साबुन को फिर तो कोई इस्तेमाल करता नहीं, इसलिए लेते आए. ऐसे ही तौलिया चुराने वालों के साथ होना चाहिए. वैसे एक बात है, लोग होटल की तौलिया इस्तेमाल कैसे कर लेते हैं? मतलब मैं तो होटल के बिस्तर में भी अपनी चद्दर बिछाकर सोने वालों में से हूं इसलिए पूछ रहा हूं.
6. शोर मचाने वालों से एक्स्ट्रा चार्ज लिया जाएगा
खुशियां मनाने का हक़ सबको है. अब मानिए कि 17 साल का बच्चा है, उसका जन्मदिन है. उसके दोस्त जन्मदिन मनाने आए. और लगे हल्ला मचाने. मुंह पर केक दरकच्चने लगे. आपको उनके हल्ले-गुल्ले से समस्या तो हो सकती है लेकिन शिकायत कैसे करेंगे? किससे करेंगे? और क्यों करेंगे? तो बात ये कि सीधी सी गाइडलाइन जारी हो. ऐसा हल्ला करने का 20% खर्चा अलग लगेगा. और उनके आसपास वालों को बिल में 5% की छूट मिलेगी. ऐसे में होगा ये कि सामने वाला भी उतना ही हल्ला करेगा जितने पैसे भरने की हिम्मत होगी.
7. बहुत शूं-शा करने वालों से प्लेटें उठवाई जाएं
कुछ एलीट किस्म के भी लोग होते हैं. ओह सॉरी! एलीट कहते हैं या इलीट? माफ़ कीजिएगा. ये वो लोग हैं जो रेस्टोरेंट को रेस्त्रां न कहो तो आंख दिखाते हैं. ये वो लोग होते हैं जिनको रटा होता है किस हाथ में त्रिशूल वाला चम्मच पकड़ना है कहां पर छूरा घुसाना है. कहां छोटी वाली तौलिया रखनी है. और गलती से आपने एक चीज गड़बड़ की वो ऐसी जोर से चिल्लायेंगे कि समझो पहाड़ टूट गया. इनको समझाना चाहिए. खाना ही है, पेट में ही जाना है. कोई चीज थोड़ा गलत तरीके से हो भी गई तो पाप न पड़ेगा नरक में न तला जाएगा. इतनी रियायत तो रहने दिया करो. सामने वाले को इस तरह से बेइज्जत करते अगर कोई मिले तो उससे खाने के बाद उसकी प्लेटें उठवानी चाहिए. यू नो न दिस विल बी सो एम्बैरसिंग.
8 . सौंफ खाने वालों पर लीगल एक्शन लिया जाए
किसी भी होटल में सबसे बुरे स्वाद वाली चीज क्या होती है? सौंफ. वो मीठी वाली सौंफ जिसके ऊपर शक्कर चुपड़ी होती है. लोग उस सौंफ को भी नहीं छोड़ते. लोग गुलकंद जेब में भर लेते हैं और तो और दांत खोदने वाली लकड़ी तक तीन-तीन चार-चार उठा लेते हैं. भाई तेरे दांत के बीच कहीं फंसा टुकड़ा निकालना है या नया सोफा बनवाना है. मुझे तो लगता है ये किसी सीक्रेट मिशन में लगे होते हैं. इन लकड़ियों को जोड़कर सींक वाली कुर्सी बनाने का मिशन. ऐसे लोगों के खिलाफ घर पर नोटिस भेजना चाहिए और अगर तब भी ये अपनी आदत न छोड़ें तो कुछ दिन के लिए इन्हें किसी रेस्टोरेंट के रिसेप्शन पर ही बैठा देना चाहिए.
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