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धौरहरा ग्राउंड रिपोर्ट : ऐसा चुनाव जिसमें कांग्रेस ने शायद अपने नेता का ही साथ छोड़ दिया है

इस सीट पर एक डाकू भी चुनाव लड़ रहा है

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कांग्रेस चाहती थी जितिन प्रसाद लखनऊ से चुनाव लड़ें. धौरहरा के लोग बताते हैं कि ये जितिन प्रसाद को मंज़ूर नहीं था. (फोटो-ट्विटर)
ये लखीमपुर खीरी का गवर्नमेंट इंटर कॉलेज है. जीआईसी के नाम से ज्यादा जाना जाता है. बुधवार यानी 24 अप्रैल के दिन यहां राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की सभा हो रही है. मंच जमा है. लोग बैठे हैं. लेकिन इस मंच से एक आदमी गायब रहा. उस आदमी का नाम जितिन प्रसाद है.
वही जितिन प्रसाद जो पीवी नरसिम्हा राव और राजीव गांधी के सलाहकार रह चुके जितेन्द्र प्रसाद के बेटे हैं. जितेन्द्र प्रसाद भी अपने घर यानी शाहजहांपुर से सांसद चुने गए थे. और अपने घर यानी शाहजहांपुर से थोड़ी ही दूर पर धौरहरा लोकसभा से जितिन प्रसाद सांसद चुने गए 2009  के लोकसभा चुनावों में. मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी मिला, इस्पात और नागरिक उड्डयन मंत्रालय भी. लेकिन 2014 में देश में फिर से लोकसभा चुनाव हुए, तो जितिन प्रसाद अपनी सीट हार गए. जीतीं रेखा वर्मा. क्योंकि जितिन प्रसाद हारते भी तो गनीमत थी. आये चौथे स्थान पर.

2009 में आम चुनाव हुए तो जितिन प्रसाद ने पहला सांसद होने का खिताब दर्ज किया.
2009 में आम चुनाव हुए तो जितिन प्रसाद ने पहला सांसद होने का खिताब दर्ज किया.

जितिन प्रसाद
अब 2019 का कैम्पेन चल रहा है. जीआईसी के मैदान पर चल रही सभा में मंच पर पोस्टर लगे हुए हैं. एक बड़े पोस्टर पर प्रियंका गांधी, राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, राज बब्बर और खीरी लोकसभा से कांग्रेस प्रत्याशी ज़फर अली नकवी के पोस्टर लगे हुए हैं. मंच पर राहुल, सिंधिया और ज़फर बैठे भी हैं. मुश्किल से पंद्रह किलोमीटर बाद शुरू हो जा रही धौरहरा लोकसभा के प्रत्याशी जितिन प्रसाद का ज़िक्र कहीं नहीं है.
इसके पीछे सही कारण नहीं मालूम होते हैं. लेकिन जितिन प्रसाद को टिकट मिलने से लेकर उनके चुनाव प्रचार तक सबकुछ अंधेरे में हैं. टिकटों का बंटवारा हो रहा था और कांग्रेस के बड़े नेताओं को टिकट दिए जा रहे थे. जितिन प्रसाद का नाम धौरहरा सीट सामने नहीं आ रहा था. इसी बीच खबर उड़ी कि जितिन प्रसाद अब भाजपा में शामिल होंगे. तीन दिन तक खबरें चलती रहीं और कोई स्पष्टीकरण नहीं आया. और जब आया तो जितिन प्रसाद ने किंचित बुझे स्वर में कहा कि मैं धौरहरा और यहां के लोगों को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा. बात हुई पक्की और जितिन प्रसाद को टिकट दे दिया गया.
लेकिन इतनी फजीहत क्यों मची? कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी का मन था कि जितिन प्रसाद लखनऊ से चुनाव लड़ें. राजनाथ सिंह के खिलाफ़. धौरहरा के लोग बताते हैं कि ये जितिन प्रसाद को मंज़ूर नहीं था. वे धौरहरा में ही रहना चाहते थे. और दिल्ली में बैठे लोग बताते हैं कि इस वजह से राहुल गांधी और जितिन प्रसाद में बहुत खींचतान हुई.
धौरहरा सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद सामने आई. लखीमपुर खीरी के कुछ हिस्से और पास के सीतापुर के कुछ गांवों को शामिल करके धौरहरा सीट बनाई गई. 2009 में आम चुनाव हुए तो जितिन प्रसाद ने पहला सांसद होने का खिताब दर्ज किया. जीते भी तो 1.84 लाख वोटों के अंतर से. लोग बताते हैं कि क्षेत्र में काम भी कराया. और सुलभ-उपलब्ध रहे.
तो शायद यह राहुल गांधी और जितिन प्रसाद के बीच की खींचतान ही थी, जिसकी वजह से राहुल गांधी रूठे नज़र आते हैं. शायद यही वजह थी कि जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने की खबर उड़ी, लेकिन इस खबर के बारे में कांग्रेस की खबर रखने वाले बताते हैं कि जितिन प्रसाद ने धौरहरा से टिकट की ज़िद में यह खबर प्लांट करवाई थी.
अब इस बार जितिन प्रसाद का सामना भाजपा की मौजूदा सांसद रेखा वर्मा से है. तो वहीं दूसरी ओर बसपा के कोटे से अरशद सिद्दीकी भी चुनाव में उतर चुके हैं. ये ऐसी उन कुछ सीटों में शामिल है, जिसमें सपा से अलग हुए शिवपाल सिंह यादव की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी ने भी अपना प्रत्याशी उतारा है. उनके प्रत्याशी हैं चम्बल के मशहूर डकैत डाकू मलखान सिंह. अब समर्पण के बाद मुख्यधारा में जगह टटोल रहे हैं. लेकिन जब भी फोन मिलाओ तो धौरहरा के मैगलगंज में टहलते मिलते हैं. स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि मलखान सिंह बस लड़ने के लिए लड़ रहे हैं. उनको जीत से कोई मतलब नहीं है.
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बेहजम गांव के राजू रस्तोगी बातचीत में बताते हैं कि जितिन प्रसाद ने सड़क और दूसरी ज़रूरतें पूरी की हैं. वहीँ अपने कार्यकाल में रेखा वर्मा ने एक सड़क और एक नाली बनवाई है. बाकी कामों का क्या हिसाब है, लोग बोलते हैं पता नहीं. जिला लखीमपुर में आने वाले धौरहरा में वक़्त की ज़रुरत एक अदद सड़क की है. साथ ही साथ एक अस्पताल की भी ज़रुरत लखीमपुर के लोगों को है. लोग बताते हैं कि जितिन प्रसाद जब सांसद थे तो कोई भी उनके पास चला जाता था, वे खुलेदिल से दिल्ली में इलाज कराते थे. लेकिन पांच साल के कार्यकाल में एक सर्वसुलभ अस्पताल ला पाना एक अधूरा टास्क ही रहा.
मितौली गांव में रहने वाले पत्रकार राकेश शुक्ला बताते हैं –
“आप या कोई भी इस बात से नकार नहीं सकता कि जितिन प्रसाद ने काम से ज्यादा जनसंपर्क किया है. हर आदमी से मिलना, जानना, हाल-चाल लेना, और ज़रुरत पड़ने पर मदद कर देना, लेकिन इससे कोई मुद्दा हल नहीं होता है. रेखा वर्मा ने न तो उतना काम कराया, और न ही किसी से मिलीं. इससे भी मुद्दा हल नहीं होता.”
बकौल राकेश, जनता को वो दिया जाना चाहिए, जिसकी उन्हें ज़रुरत है. वे कहते हैं –
“जितिन प्रसाद को अगर जीतना है तो उन्हें जनता के बीच आना होगा और बताना होगा कि वे क्या कर सकते हैं. रेखा वर्मा की बात है तो मोदी के कामों की बदौलत तो वो पकड़ बना लेंगी. लेकिन इसमें ज़िद से पायी सीट पर जितिन जीत न दर्ज कर सके तो समस्या है.”
हां. पत्रकारों और स्थानीय लोगों की मानें तो जितिन प्रसाद अपने कैम्पेन को लेकर उतने मुस्तैद नहीं दीखते हैं. पूरे प्रचार के दौरान उनका रात का विश्राम सीतापुर या शाहजहांपुर में होता था. हफ्ते में एक ही रात वे लखीमपुर में गुजारते थे. बाकी का समय जनसभा या चुनाव प्रचार में. जब हम धौरहरा पहुंचे तो यहां के गांवों में उनकी पत्नी प्रचार कर रही थीं. मितौली में उनके ऑफिस से जानकारी मिली कि जितिन प्रसाद सीतापुर में गए हुए थे, वह भी तब, जब चुनाव महज़ एक हफ्ते की दूरी पर था.
धौरहरा में लोग कहते हैं कि जितिन प्रसाद का एक काम अधूरा रह गया. और शायद उस वजह से उन पर यह भी आरोप लगते हैं कि उन्होंने कुछ काम नहीं किया. स्टील मिनिस्ट्री सम्हालते समय उन्होंने यहां एक स्टील का कारखाना खोला था. लेकिन वह अभी तक शुरू नहीं किया जा सका है. लोग बताते हैं कि यह काम होता तो लोगों को रोजगार मिल जाता.
राजू रस्तोगी कहते हैं –
“जितिन प्रसाद ने स्टील का कारखाना लगाया. लेकिन कोई काम नहीं कराया.”
धौरहरा लोकसभा में मुस्लिम, ओबीसी और अनुसूचित जातियों के भी वोट हैं. सपा और बसपा के प्रत्याशी अरशद सिद्दीकी के भी हौसले इसलिए बुलंद हैं क्योंकि सपा और बसपा दोनों ने ही पिछले लोकसभा चुनाव में क्रमशः दूसरा और तीसरा स्थान पाया था. तो दोनों ही पार्टियां दो दूनी चार के समीकरण पर चल रही हैं. पिछली बार मिले वोटों को जोड़कर चुनाव को देखो तो जीत पक्की.
धौरहरा भी यूपी के हरेक जिले-गांव-लोकसभा की तरह छुट्टा जानवर की समस्या से जूझ रहा है. किसान को दिक्कत है लेकिन शहर के करीब आते ही किसान का मुद्दा कोई मुद्दा नहीं रह जाता है. गुस्सा निकालते-निकालते लोग भाजपा सरकार की मौज भी ले लेते हैं.
मितौली के शिवपूजन यादव कहते हैं –
“अमित शाह खुद को चाणक्य समझते हैं. टकले पर बाल न होने से हर कोई चाणक्य नहीं हो जाता है.”
ऐसे में सपाट-सी भंगिमा वाले जितिन प्रसाद कितनी तैयारी के साथ कैसा चुनाव लड़ने जा रहे हैं, ये देखने की बात है. वह भी तब, जब शायद पार्टी के शीर्ष नेतृत्त्व ने ऊपर से हाथ खींच लिया हो.


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