उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है. बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबले की चर्चा है. लेकिन इस सियासी लड़ाई में बहुजन समाज पार्टी भी अपनी जगह बनाने में जुटी है. इस बार बसपा के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जमीन को वापस हासिल करने की है, जिस पर कभी बसपा और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का एक दशक से भी ज्यादा का दबदबा हुआ करता था. ऐसे में 2027 का चुनाव उनके और उनकी पार्टी के लिए काफी अहम होने जा रहा है.
बसपा को फिर मजबूती देने में जुटीं मायावती, इस बार किस फॉर्मूले पर शुरू किया काम?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती ने बसपा को मजबूत करने की तैयारी तेज कर दी है. लखनऊ में बुलाई गई बैठक में संगठन की मजबूती, दलित वोट बैंक और चुनावी रणनीति पर चर्चा होगी. जानिए इस बार किस रणनीति के तहत BSP काम कर रही है.

इसी को ध्यान में रखते हुए मायावती ने गुरुवार, 5 नवंबर को लखनऊ में पार्टी की एक बड़ी बैठक बुलाई है. आजतक से जुड़े समर्थ श्रीवास्तव की रिपोर्ट के मुताबिक, सुबह 11 बजे से शुरू होने वाली इस बैठक में प्रदेश के सभी 75 जिलों के बसपा अध्यक्ष, मंडल कोऑर्डिनेटर और पार्टी के अलग-अलग स्तर के पदाधिकारी शामिल होंगे. मायावती के भतीजे और बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद भी बैठक में मौजूद रहेंगे.
बैठक का एजेंडा साफ है. मिशन-2027. यानी अगले विधानसभा चुनाव के लिए संगठन को तैयार करना, कमजोर पड़ते जनाधार को मजबूत करना और चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारना. पार्टी प्रमुख मायावती पार्टी के नेताओं से अब तक हुए संगठनात्मक कामकाज का हिसाब भी ले सकती हैं. खास तौर पर बूथ स्तर पर पार्टी की सक्रियता, नए वोटरों को जोड़ने और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच बसपा की पहुंच बढ़ाने पर चर्चा होने की उम्मीद है.
दरअसल, बसपा ने चुनावी तैयारियां काफी पहले शुरू कर दी हैं. पार्टी ने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान भी शुरू कर दिया है. आकाश आनंद और मंडल कोऑर्डिनेटर अलग-अलग इलाकों में जाकर प्रत्याशियों के नाम सामने रख रहे हैं. इसके पीछे रणनीति ये है कि उम्मीदवारों को चुनाव से पहले ही अपने क्षेत्र में काम करने और वोटरों के बीच पहुंच बनाने का ठीक-ठाक समय मिल सके.
रिपोर्ट में पार्टी में मौजूद सूत्रों के हवाले से लिखा गया है कि, बैठक में 6 दिसंबर को लखनऊ में एक बड़ी जनसभा करने का ऐलान भी हो सकता है. ये तारीख भी राजनीतिक लिहाज से अहम है. बसपा के लिए ऐसी रैली अपने समर्थकों को एकजुट करने और प्रदेश की राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का मौका होगी. लेकिन सवाल है कि मायावती के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
दलित वोट बैंक बचाने की चुनौतीअसल में, बसपा का पारंपरिक दलित वोट बैंक अब पहले की तरह एकजुट नहीं दिखता. समाजवादी पार्टी अपने पीडीए यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के जरिए इस वोट बैंक तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है. दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी दलित राजनीति में अपनी जगह बनाने में जुटी है. ऐसे में बसपा के सामने अपने पुराने समर्थकों और वोटर्स को पार्टी के साथ बनाए रखने की चुनौती है.
अब मायावती एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग के पुराने फॉर्मूले पर काम करती दिख रही हैं. इस रणनीति के तहत पार्टी दलितों के साथ ब्राह्मणों और दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश कर रही है. मायावती के लिए ये सिर्फ जातीय समीकरण साधने की कवायद नहीं, बल्कि बसपा के पुराने राजनीतिक आधार को फिर से विस्तार देने की कोशिश भी है.
ऐसे में 2027 की लड़ाई से पहले मायावती के सामने दो मोर्चे हैं. एक तरफ पार्टी के संगठन और कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरना, तो दूसरी तरफ बदलते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी जगह बनाना. अब लखनऊ की इस बैठक से निकलने वाली रणनीति बताएगी कि बसपा आने वाले चुनाव में अपनी राजनीति को किस दिशा में ले जाना चाहती है.
कैसे बदला बसपा का सियासी ग्राफ?राज्य में बहुजन समाज पार्टी के सियासी सफर में आई गिरावट को समझने के लिए पहले मायावती के मुख्यमंत्री कार्यकाल और उनके नेतृत्व में पार्टी के प्रदर्शन पर नजर डालना जरूरी है. मायावती उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनी थीं. वो अब तक चार बार इस पद पर रह चुकी हैं. पहली बार 3 जून 1995 को मुख्यमंत्री बनीं और 18 अक्टूबर 1995 तक इस पद पर रहीं. इसके बाद 21 मार्च 1997 से 21 सितंबर 1997 तक दूसरी बार मुख्यमंत्री रहीं. तीसरी बार 3 मई 2002 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला और 29 अगस्त 2003 तक इस पद पर रहीं. वहीं, 13 मई 2007 को वो चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं और 15 मार्च 2012 तक इस पद पर रहीं. उनका ये कार्यकाल सबसे लंबा रहा.
2007 का विधानसभा चुनाव मायावती और बसपा के लिए ऐतिहासिक रहा. पार्टी ने राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 206 पर जीत दर्ज की और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. इस चुनाव में समाजवादी पार्टी को 97, बीजेपी को 51 और कांग्रेस को 22 सीटें मिली थीं. लेकिन इसके बाद बसपा की सियासी जमीन लगातार खिसकती गई.
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2012 के विधानसभा चुनाव में सत्ता की तस्वीर बदल गई. अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया. वहीं, मायावती की बसपा 206 से सीधे 80 सीटों पर आ गई. इसके बाद पार्टी की गिरावट का सिलसिला जारी रहा. 2017 के चुनाव में बसपा महज 19 सीटें जीत सकी. वहीं, 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन और कमजोर हुआ और सिर्फ एक सीट पर सिमट गई. इस तरह साल 2007 में 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा अगले डेढ़ दशक में विधानसभा में महज एक विधायक वाली पार्टी बनकर रह गई.
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